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जब चुनाव आयोग में मतभेद भी लोकतंत्र की ताकत माने जाते थे! शेषन से लवासा तक टकराती रही राय

राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 सितंबर 2026

 

भारत की चुनावी व्यवस्था में चुनाव आयोग की भूमिका हमेशा बेहद महत्वपूर्ण रही है। लेकिन चुनाव आयोग के भीतर हर दौर में एक जैसी राय रही हो, ऐसा नहीं है। 1993 में आयोग के स्थायी रूप से 3 सदस्यीय संस्था बनने के बाद कई ऐसे मौके आए, जब मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच गंभीर मतभेद सामने आए। फर्क यह रहा कि इन मतभेदों को संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा माना गया और कई मामलों में असहमति सार्वजनिक बहस का विषय भी बनी। टी. एन. शेषन, एन. गोपालस्वामी और अशोक लवासा के कार्यकाल ऐसे ही उदाहरणों में गिने जाते हैं।

चुनाव आयोग की शक्तियां संविधान के अनुच्छेद 324 से आती हैं। संसद, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की निगरानी, मतदाता सूची की तैयारी और चुनाव प्रक्रिया पर नियंत्रण आयोग के संवैधानिक दायित्वों में शामिल है। 3 सदस्यीय आयोग की व्यवस्था का मतलब ही यह है कि महत्वपूर्ण फैसलों पर सदस्यों के बीच चर्चा और अलग-अलग राय की गुंजाइश बनी रहे। किसी सदस्य की असहमति अपने आप में चुनाव में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं होती, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में बहस और जवाबदेही की व्यवस्था का हिस्सा हो सकती है।

टी. एन. शेषन का दौर चुनाव आयोग की ताकत और स्वतंत्रता की बहस में सबसे ज्यादा याद किया जाता है। शेषन 1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। 1993 में जब चुनाव आयोग में 2 और चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए तो शेषन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और 1995 में अदालत ने 3 सदस्यीय चुनाव आयोग की व्यवस्था को बरकरार रखा। इसके बाद आयोग में फैसलों को लेकर अलग-अलग राय की स्थिति बनी रही, लेकिन संस्थागत ढांचा कायम रहा।

एन. गोपालस्वामी के कार्यकाल में भी आयोग के भीतर असहमति खुलकर सामने आई। 2009 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश को लेकर गोपालस्वामी और आयोग के अन्य सदस्यों के बीच मतभेद सामने आया। गोपालस्वामी ने तत्कालीन राष्ट्रपति को चावला को हटाने की सिफारिश भेजी थी, जबकि आयोग के दूसरे सदस्यों ने इस राय का समर्थन नहीं किया। यह मामला भी लंबे समय तक चुनाव आयोग की आंतरिक स्वतंत्रता और सदस्यों के बीच मतभेद की मिसाल के रूप में चर्चा में रहा।

फिर आया 2019 का दौर, जब अशोक लवासा की असहमति राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनी। लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह से जुड़ी आदर्श आचार संहिता की शिकायतों पर आयोग के फैसलों में लवासा ने कई मामलों में अलग राय रखी। उन्होंने अपनी असहमति को रिकॉर्ड पर रखने की मांग की। यह विवाद केवल किसी एक फैसले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस सवाल तक पहुंचा कि चुनाव आयोग के भीतर दर्ज होने वाली असहमति को जनता के सामने किस हद तक रखा जाना चाहिए।

अब 2026 में चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों की चर्चा एक बार फिर तेज है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर अलग-अलग मुद्दों पर अपनी आपत्तियां या टिप्पणियां रिकॉर्ड पर रखीं। इनमें मतदाता पंजीकरण, नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया, पश्चिम बंगाल से जुड़ी अपील तथा चुनावी आंकड़ों और IT व्यवस्था जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं। कुछ टिप्पणियों में फैसलों की प्रक्रिया और अधिकारों को लेकर भी सवाल उठाए गए।

यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। चुनाव आयोग के भीतर असहमति होना अपने आप में कोई नई या असाधारण बात नहीं है। आयोग का कहना है कि अलग-अलग टिप्पणियां, सुझाव और तकनीकी आपत्तियां संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और अंतिम निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं। लेकिन जब असहमति लगातार सामने आए और उसका संबंध मतदाता सूची, मतदाता के नाम जोड़ने या हटाने तथा चुनावी आंकड़ों जैसे सीधे नागरिक अधिकारों से जुड़े विषयों से हो, तब उन आपत्तियों और अंतिम फैसलों के बीच की पूरी प्रक्रिया को समझना सार्वजनिक हित का विषय बन जाता है।

यही वह जगह है जहां आज की बहस को शेषन, गोपालस्वामी और लवासा के दौर से जोड़कर देखा जा रहा है। पुराने उदाहरण बताते हैं कि चुनाव आयोग में अलग राय पहले भी रही है। इसलिए आज का सवाल केवल यह नहीं है कि आयोग के सदस्यों में मतभेद क्यों हैं। बड़ा सवाल यह है कि असहमति किस तरह दर्ज होती है, अंतिम फैसला कैसे लिया जाता है और मतदाता को उस पूरी प्रक्रिया की कितनी जानकारी मिलती है।

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल अंतिम चुनाव परिणाम से नहीं बनती, बल्कि उस प्रक्रिया से बनती है जिसके जरिए मतदाता सूची तैयार होती है, नाम जुड़ते या हटते हैं और चुनाव कराया जाता है। इतिहास में आयोग के भीतर मतभेदों के बावजूद संस्थागत प्रक्रिया चलती रही है। 2026 में SIR को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर उसी पुराने सवाल को सामने ला दिया है—क्या चुनाव आयोग के भीतर असहमति को मजबूती से दर्ज करने और जनता के सामने पारदर्शी तरीके से रखने की व्यवस्था उतनी ही मजबूत है, जितनी एक निष्पक्ष चुनावी व्यवस्था के लिए जरूरी है?

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