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समझिए बंगाल में ज्ञानेश कुमार SIR के नाम पर कैसा गुल खिला रहे हैं…संविधान के चित्रकार के पोते का नाम वोटर लिस्ट से गायब !!

राष्ट्रीय / राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता/नई दिल्ली | 6 अप्रैल 2026

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान सामने आया एक मामला अब पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। संविधान को कलात्मक स्वरूप देने वाले महान चित्रकार नंदलाल बोस के पोते सुप्रबुद्ध सेन और उनकी पत्नी का नाम ही मतदाता सूची से गायब हो गया है। यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करती है, बल्कि उस व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है जो लोकतंत्र की सबसे बुनियादी प्रक्रिया—मताधिकार—को सुनिश्चित करने का दावा करती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पहले उनका नाम “पेंडिंग” स्थिति में दिखाया गया, लेकिन बाद में बिना किसी स्पष्ट कारण या पूर्व सूचना के सूची से हटा दिया गया, जिससे परिवार और स्थानीय लोगों में गहरी नाराजगी है।

इस पूरे घटनाक्रम ने SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर बहस को तेज कर दिया है। राज्य भर से लगातार ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि कई वैध मतदाताओं के नाम अचानक सूची से गायब हो रहे हैं, जबकि उन्हें न तो कोई स्पष्ट कारण बताया जा रहा है और न ही समय पर सुधार का अवसर मिल रहा है। कई लोगों का आरोप है कि दस्तावेज जमा करने के बावजूद उनकी सुनवाई नहीं हो रही, और शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया भी जटिल और अस्पष्ट बनी हुई है। यही वजह है कि आम नागरिकों के साथ-साथ प्रतिष्ठित और शिक्षित परिवार भी इस प्रक्रिया के सामने खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।

यह विवाद तब और गहरा गया जब यह सामने आया कि कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश तक इस प्रक्रिया से अछूते नहीं रहे। उनके परिवार के नाम भी सूची से हटाए जाने की खबर सामने आई थी, जिसे बाद में आपत्ति दर्ज कराने के बाद बहाल किया गया। इस तरह की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि समस्या केवल आम नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवस्था के भीतर कहीं न कहीं गंभीर खामी मौजूद है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब एक पूर्व न्यायाधीश और संविधान से जुड़े परिवार तक इस तरह की स्थिति का सामना कर रहे हैं, तो आम आदमी के लिए न्याय और पारदर्शिता की उम्मीद और भी कमजोर हो जाती है।

राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा तेजी से तूल पकड़ रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही इस प्रक्रिया को लेकर चिंता जता चुकी हैं और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए खतरा बताया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, जिससे चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है, जहां विपक्ष और सत्तारूढ़ दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं, लेकिन असली सवाल अब भी अनुत्तरित है—क्या मतदाता सूची वास्तव में निष्पक्ष और सटीक है?

इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को प्रभावित करने वाला मुद्दा बनता जा रहा है। जब लोगों का नाम बिना स्पष्ट कारण के मतदाता सूची से गायब होता है, तो यह उनके संवैधानिक अधिकारों का सीधा हनन है। सुप्रबुद्ध सेन और उनकी पत्नी का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह उस विरासत से जुड़ा है जिसने भारत के संविधान को पहचान दी। ऐसे में यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि अगर संविधान के रचनात्मक आधार से जुड़े परिवार को ही अपने अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़े, तो आम नागरिक की स्थिति क्या होगी।

बढ़ते विवाद और जनाक्रोश के बीच अब जरूरत इस बात की है कि SIR प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए, हर हटाए गए नाम के पीछे स्पष्ट कारण बताया जाए और समयबद्ध तरीके से शिकायतों का निपटारा किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह मामला केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है।

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