अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली / अबू धाबी | 4 जून 2026
पश्चिम एशिया युद्ध के बीच बदला तेल आपूर्ति का समीकरण
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में लगातार व्यवधान के बीच भारत के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। मई 2026 में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भारत का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है और उसने सऊदी अरब को पीछे छोड़ दिया है। रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा व्यापार के पुराने मार्गों को प्रभावित किया है, जिसके कारण नए आपूर्ति मार्गों का महत्व बढ़ गया है।
रूस बना रहा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता
कमोडिटी विश्लेषण संस्था क्लेपर (Kpler) के आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में भारत ने रूस से प्रतिदिन लगभग 19 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात किया। यह अप्रैल की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक है। जनवरी 2026 के मुकाबले रूसी आयात में लगभग 73 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अमेरिकी प्रतिबंधों में मिली कुछ छूट और रियायती दरों पर उपलब्ध तेल ने भारत के लिए रूस को सबसे आकर्षक आपूर्तिकर्ता बनाए रखा है।
UAE ने सऊदी अरब को छोड़ा पीछे
मई महीने में भारत ने UAE से प्रतिदिन लगभग 5.4 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया। हालांकि यह अप्रैल की तुलना में 5 प्रतिशत कम था, लेकिन मार्च के स्तर से लगभग 166 प्रतिशत अधिक रहा। इसके साथ ही UAE भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। इसके विपरीत सऊदी अरब से आयात घटकर 3.98 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जो अप्रैल के मुकाबले 41 प्रतिशत कम है।
होर्मुज संकट का सीधा असर
फरवरी 2026 के अंत में ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के सैन्य हमलों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता बढ़ गई थी। यह मार्ग पहले भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आयात का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता था। युद्ध और सुरक्षा जोखिमों के कारण इस समुद्री मार्ग पर तेल परिवहन लगातार प्रभावित हो रहा है, जिससे भारत सहित कई देशों को वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग तलाशने पड़े हैं।
फुजैराह और यानबू बने नए ऊर्जा कॉरिडोर
UAE और सऊदी अरब ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बायपास करने वाले पाइपलाइन नेटवर्क का उपयोग बढ़ा दिया है। UAE का हबशन-फुजैराह पाइपलाइन नेटवर्क प्रतिदिन लगभग 15 लाख बैरल तेल सीधे ओमान की खाड़ी तक पहुंचाने में सक्षम है। वहीं सऊदी अरामको की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन अबकैक से यानबू बंदरगाह तक प्रतिदिन लगभग 50 लाख बैरल तेल पहुंचाती है। वर्तमान संकट के दौरान दोनों पाइपलाइनें लगभग पूर्ण क्षमता पर संचालित हो रही हैं।
भारत खोज रहा दीर्घकालिक समाधान
ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंतित भारत अब UAE के साथ प्रत्यक्ष ऊर्जा पाइपलाइन व्यवस्था की संभावनाओं का भी अध्ययन कर रहा है। सूत्रों के अनुसार नई दिल्ली भविष्य में होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक ऊर्जा गलियारों पर गंभीरता से विचार कर रही है। युद्ध से पहले भारत की लगभग 50 प्रतिशत तेल आपूर्ति होर्मुज मार्ग से होकर आती थी।
तेल स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति
पश्चिम एशिया में बढ़ते जोखिमों के बीच भारत ने अपने आयात स्रोतों का दायरा भी बढ़ाया है। मई 2026 में वेनेजुएला भारत का चौथा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता रहा, जहां से लगभग 3.03 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया गया। इसके अलावा ब्राजील, अमेरिका, ओमान और अंगोला से भी खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। अमेरिका से आयात 107 प्रतिशत बढ़कर 2.09 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया।
भारत का कुल तेल आयात बढ़ा
क्लेपर के आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में भारत का कुल कच्चा तेल आयात बढ़कर 50 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया। यह अप्रैल की तुलना में 11 प्रतिशत और पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 4.17 प्रतिशत अधिक है। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता के रूप में भारत ने वैश्विक आपूर्ति संकट के बीच अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात बढ़ाया है।
ऊर्जा सुरक्षा बनी राष्ट्रीय प्राथमिकता
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान भू-राजनीतिक संकट ने भारत को यह अहसास कराया है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न है। इसलिए सरकार अब ऐसे विकल्पों पर काम कर रही है जो किसी एक क्षेत्र या समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता को कम कर सकें। रूस, UAE, अमेरिका, ब्राजील और वेनेजुएला जैसे विभिन्न स्रोतों से आयात बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
बदलते वैश्विक संकट में नई ऊर्जा रणनीति
मई 2026 के आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा व्यापार का स्वरूप बदल दिया है। UAE का भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बनना इसी बदलाव का परिणाम है। रूस अभी भी शीर्ष स्थान पर बना हुआ है, जबकि सऊदी अरब की हिस्सेदारी घटी है। आने वाले समय में भारत की ऊर्जा नीति अधिक विविध, सुरक्षित और रणनीतिक रूप से संतुलित होती दिखाई दे सकती है, ताकि वैश्विक संकटों का असर देश की ऊर्जा जरूरतों पर न्यूनतम रहे।




