राजनीति | सुमन कुमार | ABC NATIONAL NEWS | चेन्नई / नई दिल्ली | 27 मई 2026
तमिलनाडु की राजनीति में दलबदल और इस्तीफों को लेकर नया संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। राज्य विधानसभा के कई विधायकों के इस्तीफे स्वीकार किए जाने के बाद अब सवाल उठ रहा है कि क्या स्पीकर लंबित अयोग्यता याचिकाओं के बीच विधायकों के इस्तीफे स्वीकार कर सकते हैं? इसी बीच सुप्रीम कोर्ट की एक पुरानी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी फिर चर्चा में आ गई है, जिसमें अदालत ने साफ कहा था कि “दलबदल का दाग सिर्फ इस्तीफा देने से खत्म नहीं हो जाता।” अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि किसी विधायक पर दलबदल कानून के तहत कार्रवाई बनती है, तो केवल इस्तीफा देकर वह अयोग्यता से नहीं बच सकता।
पूरा मामला तब गरमा गया जब तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष J. C. D. Prabhakar ने AIADMK के टिकट पर चुने गए चार विधायकों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए। इसके तुरंत बाद इन विधायकों ने सत्तारूढ़ Tamilaga Vettri Kazhagam यानी TVK का दामन थाम लिया। ये विधायक उन 25 AIADMK सदस्यों के समूह का हिस्सा थे जिन्होंने हाल ही में विधानसभा में हुए विश्वास मत के दौरान TVK सरकार के पक्ष में मतदान किया था। पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर वोट करने पर AIADMK नेतृत्व ने पहले ही इन विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग स्पीकर से की थी।
अब सबसे बड़ा विवाद यही है कि इस्तीफे स्वीकार होने के बाद क्या दलबदल विरोधी कानून के तहत चल रही कार्रवाई स्वतः खत्म मानी जाएगी? AIADMK ने स्पीकर से मांग की है कि वे इन इस्तीफों को वापस लें और पहले अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करें। पार्टी का कहना है कि अगर इस्तीफे को दलबदल से बचने का रास्ता बना दिया गया तो संविधान की दसवीं अनुसूची का पूरा उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
सुप्रीम Court ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि दलबदल की कार्रवाई उस दिन से प्रभावी मानी जाती है जिस दिन विधायक ने पार्टी विरोधी गतिविधि की। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि “अयोग्यता का दाग इस्तीफे के साथ वाष्पित नहीं हो जाता।” कोर्ट ने यह भी माना था कि स्पीकर को स्वेच्छा और वास्तविकता के आधार पर इस्तीफा स्वीकार करने का अधिकार है, लेकिन यदि दलबदल से जुड़ी कार्रवाई लंबित हो तो केवल इस्तीफा देकर विधायक संवैधानिक जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति में यह मामला बेहद संवेदनशील बन चुका है क्योंकि TVK सरकार पर लगातार विपक्षी दल “हॉर्स ट्रेडिंग” यानी विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगा रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि सत्ता पक्ष सुनियोजित तरीके से विपक्षी विधायकों को तोड़कर अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ा रहा है। वहीं TVK समर्थक इन आरोपों को खारिज करते हुए दावा कर रहे हैं कि विधायक अपनी राजनीतिक सोच और क्षेत्रीय विकास के आधार पर पार्टी बदल रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश में दलबदल कानून की व्याख्या और स्पीकर की संवैधानिक शक्तियों पर नई बहस छेड़ सकता है। यदि इस मामले में अदालत दोबारा हस्तक्षेप करती है, तो भविष्य में इस्तीफा देकर दलबदल कानून से बचने की राजनीति पर बड़ा असर पड़ सकता है।
अब सबकी निगाहें तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष और संभावित न्यायिक हस्तक्षेप पर टिकी हुई हैं। यह मामला आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति के साथ-साथ देशभर की संवैधानिक राजनीति में भी बड़ा उदाहरण बन सकता है।




