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इस बार मुकाबला उस पीढ़ी से है, जिसे पुराने नैरेटिव की भाषा ही नहीं आती

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 जुलाई 2026

भारतीय राजनीति में लंबे समय से एक बात कही जाती रही है—सत्ता केवल चुनाव से नहीं चलती, परसेप्शन से भी चलती है। कौन मुद्दा जनता के सामने कितना बड़ा दिखाई देगा, किस सवाल पर बहस होगी और किस सवाल को दूसरी बहस के नीचे दबा दिया जाएगा, इसमें नैरेटिव की बड़ी भूमिका होती है। भाजपा ने पिछले एक दशक में इस कला पर असाधारण पकड़ बनाई है। लेकिन NEET, पेपर लीक और छात्र आंदोलन के मौजूदा दौर में उसके सामने शायद पहली बार एक ऐसा वर्ग खड़ा है, जिसकी राजनीतिक भाषा ही अलग है। यह वह युवा है जिसे हिन्दू-मुसलमान की रोजमर्रा की राजनीतिक बहस में खास दिलचस्पी नहीं, जिसे भारत-पाकिस्तान के नाम पर हर घरेलू सवाल से ध्यान हटाना स्वीकार नहीं और जिसके लिए प्राइम टाइम का टीवी एंकर सूचना का अंतिम स्रोत नहीं है। उसकी दुनिया इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स, मीम्स, रील्स, पॉडकास्ट और अपने नेटवर्क से बनती है। वह खबर केवल देखता नहीं, उस पर अपना कंटेंट बनाता है; क्लिप काटता है, तथ्य खोजता है, व्यंग्य करता है और कुछ ही घंटों में किसी सरकारी या राजनीतिक दावे का जवाब लाखों लोगों तक पहुंचा देता है। इस पीढ़ी से लड़ने की मुश्किल यही है—इसे पुराने राजनीतिक खांचों में आसानी से फिट नहीं किया जा सकता।

और इसी आंदोलन के बीच एक पुराना सवाल नए रूप में लौट आया है—“कौन राहुल?” कभी राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक साबित करने के लिए यह सवाल व्यंग्य में पूछा जाता था। लेकिन अब राहुल खुद अपने राजनीतिक कदमों से उसका जवाब देने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में उनकी रणनीति पर गौर कीजिए। पहले प्रदर्शनकारी छात्रों के मुद्दे को लेकर सरकार पर दबाव बनाया गया, फिर परीक्षा व्यवस्था और पेपर लीक के सवालों को तथ्यों और प्रस्तुतियों के जरिए सामने रखने की कोशिश हुई, उसके बाद विपक्षी सांसद गांधी स्मृति पहुंचे और अब राहुल गांधी घायल प्रदर्शनकारियों को कैमरे के सामने लाकर पुलिस कार्रवाई पर सीधे सवाल उठा रहे हैं। शुक्रवार को उन्होंने एक घायल युवक को मीडिया के सामने पेश करते हुए आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ और युवक की एक आंख की रोशनी चली गई। दिल्ली पुलिस पैलेट या रबर गन के इस्तेमाल से इनकार कर चुकी है, जबकि सामने आई कुछ मेडिकल रिपोर्टों में ‘suspected gunshot injury’ और ‘pellet injury marks’ जैसे उल्लेख होने की खबरें हैं। अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। यानी राजनीतिक आरोप से शुरू हुआ सवाल अब न्यायिक जांच और जवाबदेही के दायरे में प्रवेश कर रहा है।

यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि पूरा आंदोलन राहुल गांधी ने खड़ा किया। आंदोलन उनसे पहले से चल रहा था और इसकी अपनी छात्र-युवा ऊर्जा है। लेकिन यह भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के सक्रिय रूप से मैदान में उतरने के बाद इस मुद्दे का राजनीतिक वजन बढ़ा है। यही वह बिंदु है जहां राहुल की मौजूदा रणनीति उनकी पुरानी राजनीति से अलग दिखाई देती है। वह आंदोलन को अपने नाम से चलाने की कोशिश करने के बजाय उसके मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक मंच पर उठा रहे हैं। इससे आंदोलन की स्वायत्तता भी बनी रहती है और सरकार पर विपक्ष का संस्थागत दबाव भी बढ़ता है। राहुल के अगले कदम को लेकर अटकलें इसलिए भी बढ़ रही हैं क्योंकि उनकी गतिविधियां किसी एक तय राजनीतिक फॉर्मूले में बंधी दिखाई नहीं देतीं। सड़क, संसद, गांधी स्मृति, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया—हर मंच को अलग तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है।

सरकार की प्रतिक्रिया भी कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो पेपर लीक विवाद पर लंबे समय तक सीधे सार्वजनिक हस्तक्षेप से दूर रहे, आखिरकार युवाओं को संबोधित करते दिखाई दिए और कठोर कार्रवाई का भरोसा दिया। केंद्र ने आंदोलनकारी प्रतिनिधियों से बातचीत शुरू की। सरकार और CJP के प्रतिनिधियों के बीच करीब दो घंटे बैठक हुई। NTA में 47 अधिकारियों की सेवाएं समाप्त करने की कार्रवाई सामने आई और केंद्रीय मंत्रिमंडल ने Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024 को और कठोर बनाने के लिए संशोधनों को मंजूरी दी। इन घटनाओं को केवल राहुल गांधी के दबाव का परिणाम कहना तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी, क्योंकि इसके पीछे महीने भर का छात्र आंदोलन, विपक्ष का दबाव, मीडिया कवरेज और व्यापक जन-असंतोष सभी कारक हैं। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि सरकार अब इस संकट को उस तरह नजरअंदाज नहीं कर पा रही, जैसा शायद शुरुआती दौर में संभव समझा गया था।

असल संकट धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कहीं बड़ा है। शिक्षा मंत्री रहें या जाएं, उससे तत्काल राजनीतिक संदेश जरूर जाएगा, लेकिन छात्रों का मूल सवाल उससे खत्म नहीं होता। सवाल है कि एक विद्यार्थी वर्षों तक मेहनत करे, परिवार अपनी बचत उसकी पढ़ाई और कोचिंग में लगाए और अंत में उसे पता चले कि परीक्षा की निष्पक्षता ही संदिग्ध है, तो उस व्यवस्था पर उसका भरोसा कैसे बचेगा? परीक्षा केवल प्रश्नपत्र नहीं होती; उसके साथ लाखों परिवारों का पैसा, समय, उम्मीद और भविष्य जुड़ा होता है। इसलिए पेपर लीक को सामान्य प्रशासनिक गड़बड़ी मानना सरकार के लिए राजनीतिक भूल साबित हो सकती है। यह भ्रष्टाचार का ऐसा रूप है जिसे युवा सीधे अपने जीवन पर हमला मानता है।

भाजपा के लिए दूसरी मुश्किल और गहरी है। वर्षों में तैयार हुआ उसका मजबूत सोशल मीडिया और आईटी नेटवर्क राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने में बेहद सफल रहा है। लेकिन Gen Z की डिजिटल दुनिया अलग तरह से काम करती है। यहां पार्टी कार्यालय से निकला संदेश अंतिम सत्य नहीं बनता। कोई छात्र मोबाइल पर दस सेकंड की क्लिप डाल सकता है और वह शाम तक राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन सकती है। सरकार दावा करती है, तो स्क्रीनशॉट निकलता है; नेता बयान देता है, तो पुराना वीडियो सामने आ जाता है; पुलिस अपना पक्ष रखती है, तो प्रदर्शनकारी दूसरी तरफ से फुटेज डाल देते हैं। यहां सूचना का नियंत्रण लगभग असंभव है। सबसे बड़ी बात यह कि हास्य और मीम की भाषा में सत्ता की गंभीर से गंभीर रणनीति भी कुछ घंटों में राजनीतिक व्यंग्य बन सकती है। पारंपरिक आईटी सेल के लिए यह एक बिल्कुल अलग युद्धभूमि है।

यही कारण है कि आंदोलनकारी युवाओं को ‘किसके इशारे पर’, ‘किस विचारधारा से’ या ‘किस विदेशी ताकत के समर्थन से’ जैसे पुराने सवालों के जरिए परिभाषित करने की कोशिश उलटी भी पड़ सकती है। CJP आंदोलन में कथित विदेशी फंडिंग और पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल विदेश मंत्रालय तक पहुंचा, लेकिन MEA का जवाब था कि उसके पास इस विषय पर साझा करने के लिए कोई जानकारी नहीं है। जब तक किसी आरोप के ठोस प्रमाण सामने नहीं आते, असहमति को विदेशी साजिश बताने की राजनीति युवा मतदाता को समझाने के बजाय और संदेह पैदा कर सकती है।

राहुल गांधी के लिए भी यह आसान राजनीतिक जीत नहीं है। यदि वह इस आंदोलन को केवल मोदी-विरोध या कांग्रेस के राजनीतिक विस्तार का माध्यम बना देते हैं तो वही युवा उनसे भी दूरी बना सकता है। इस पीढ़ी की खासियत यही है कि इसकी निष्ठा स्थायी नहीं है। आज वह सरकार से सवाल पूछ रही है, कल विपक्ष से भी पूछ सकती है। इसलिए राहुल के लिए सबसे प्रभावी रणनीति शायद आंदोलन पर कब्जा करना नहीं, बल्कि उसके सवालों को लोकतांत्रिक जगह दिलाना है।

और भाजपा के लिए असली चेतावनी भी यही है। उसका सामना इस बार केवल कांग्रेस, राहुल गांधी या किसी छात्र संगठन से नहीं है। सामने एक ऐसी पीढ़ी है जिसके हाथ में कैमरा है, इंटरनेट है, हास्य है, तथ्य खोजने की क्षमता है और सबसे बढ़कर—अपना नैरेटिव खुद बनाने की ताकत है। उसे यह बताना मुश्किल है कि उसका मुद्दा क्या होना चाहिए, क्योंकि वह अपना मुद्दा खुद चुन रही है।

राजनीति में सरकारें विपक्ष से कम, बदलते हुए समाज को समय पर न समझ पाने से ज्यादा संकट में पड़ती हैं। यदि भाजपा इस युवा असंतोष को केवल सोशल मीडिया अभियान, विपक्षी साजिश या क्षणिक आंदोलन समझती है तो वह शायद समस्या की प्रकृति ही गलत पढ़ रही होगी। और यदि राहुल गांधी इस बेचैनी को समझते हुए लगातार तथ्य, जवाबदेही और युवाओं के सवालों पर टिके रहते हैं, तो वर्षों पहले पूछा गया वह व्यंग्यात्मक सवाल—“कौन राहुल?”—आने वाले समय में भारतीय राजनीति का कहीं ज्यादा गंभीर सवाल बन सकता है।

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