ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 जून 2026
अयोध्या का राम मंदिर सिर्फ पत्थरों से बना एक भव्य धार्मिक स्थल नहीं है। इसे करोड़ों लोगों की आस्था, भावनाओं, त्याग और विश्वास का प्रतीक बताया गया। देश के कोने-कोने से लोगों ने अपनी श्रद्धा के अनुसार दान दिया। किसी ने 11 रुपये दिए, किसी ने लाखों रुपये, तो किसी ने अपनी जीवन भर की बचत तक समर्पित कर दी।
यही कारण है कि जब राम मंदिर से जुड़े दान और धन के प्रबंधन को लेकर सवाल उठते हैं, तो मामला केवल पैसों का नहीं रह जाता। यह करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का प्रश्न बन जाता है।
हाल के दिनों में राम मंदिर के दान संग्रह और कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर जो विवाद सामने आया है, उसने एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श को जन्म दिया है—क्या धार्मिक संस्थाओं द्वारा एकत्र किए जाने वाले विशाल दान पर अधिक पारदर्शिता होनी चाहिए? क्या श्रद्धालुओं को यह जानने का अधिकार नहीं है कि उनका दिया हुआ धन कहां और कैसे खर्च हो रहा है?
राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुसार मंदिर निर्माण और अयोध्या के विकास के लिए देशभर से लगभग 5,500 से 6,000 करोड़ रुपये का दान प्राप्त हुआ। यह राशि केवल मंदिर निर्माण ही नहीं बल्कि तीर्थ क्षेत्र के व्यापक विकास के लिए भी जुटाई गई थी।
आज राम मंदिर देश के सबसे बड़े धार्मिक केंद्रों में शामिल है। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन करने पहुंचते हैं। विशेष अवसरों पर यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। मंदिर के दानपात्रों में हर दिन लाखों रुपये जमा होते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी राशि की निगरानी और लेखा-जोखा किस स्तर तक पारदर्शी है?
विवाद का केंद्र दानपात्रों से निकलने वाली नकदी की गिनती और उसके प्रबंधन को लेकर है। आरोप है कि नोटों की गिनती के दौरान कुछ राशि गायब की गई। जांच एजेंसियां इस मामले की पड़ताल कर रही हैं। आरोप सही हैं या गलत, इसका अंतिम निर्णय जांच के बाद ही होगा, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय पारदर्शिता की आवश्यकता को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
दरअसल यह समस्या केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है। भारत में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च और अन्य धार्मिक संस्थाएं हर साल हजारों करोड़ रुपये का दान प्राप्त करती हैं। अनुमान है कि देश की धार्मिक अर्थव्यवस्था लाखों करोड़ रुपये की है। अकेले मंदिरों की संपत्ति का मूल्य तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक माना जाता है।
तिरुपति बालाजी मंदिर की संपत्ति लगभग ढाई लाख करोड़ रुपये बताई जाती है। केरल का पद्मनाभस्वामी मंदिर भी विशाल संपत्ति का मालिक है। गुरुद्वारे, चर्च और अन्य धार्मिक संस्थान भी शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में बड़ी आर्थिक भूमिका निभाते हैं।
धार्मिक दान भारतीय समाज की सबसे बड़ी परोपकारी परंपराओं में से एक है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार देश में होने वाले कुल घरेलू दान का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा धार्मिक संस्थाओं को जाता है। इसका अर्थ यह है कि आम मध्यमवर्गीय परिवारों का सबसे बड़ा भरोसा आज भी धार्मिक संस्थाओं पर है।
लेकिन जहां धन होता है, वहां जवाबदेही की आवश्यकता भी होती है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक संस्थाओं में नकद दान की जगह डिजिटल दान को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इससे धन के प्रवाह को ट्रैक करना आसान होगा। कुछ लोगों ने तो यहां तक सुझाव दिया है कि प्रतीकात्मक रूप से एक रुपये के दान मॉडल को अपनाया जाए, ताकि श्रद्धालुओं की संख्या और दान की पारदर्शिता दोनों सुनिश्चित हो सकें। हालांकि इस सुझाव से सभी सहमत नहीं हैं।
असल मुद्दा दान की सीमा तय करना नहीं, बल्कि दान के उपयोग का स्पष्ट और सार्वजनिक लेखा-जोखा है।
आज कॉरपोरेट कंपनियों, गैर सरकारी संगठनों और सरकारी संस्थाओं को नियमित ऑडिट और पारदर्शिता के कठोर नियमों का पालन करना पड़ता है। ऐसे में करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े धार्मिक संस्थानों के लिए भी उच्च स्तर की जवाबदेही स्वाभाविक अपेक्षा है।
यह भी सच है कि भारत के अधिकांश धार्मिक संस्थान समाज सेवा, शिक्षा, चिकित्सा और जनकल्याण के अनेक कार्य करते हैं। लेकिन कुछ मामलों में उठे सवाल पूरे तंत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं।
अयोध्या का मामला इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर आस्था और पहचान का प्रतीक बन चुका है। इसलिए यहां पारदर्शिता की मांग भी स्वाभाविक रूप से अधिक होगी।
आखिरकार सवाल मंदिर, ट्रस्ट या किसी विशेष संस्था का नहीं है। सवाल उस विश्वास का है जो करोड़ों लोग अपनी श्रद्धा के साथ दानपात्र में डालते हैं। आस्था का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा जब उसके साथ जवाबदेही और पारदर्शिता भी जुड़ी होगी।
धर्म लोगों को जोड़ता है, विश्वास पैदा करता है और समाज को नैतिक शक्ति देता है। इसलिए धार्मिक संस्थाओं की सबसे बड़ी पूंजी केवल उनका धन नहीं, बल्कि जनता का भरोसा है। और भरोसा तभी मजबूत होता है जब हर प्रश्न का उत्तर खुलेपन और पारदर्शिता के साथ दिया जाए।यह लेख विवाद नहीं, बल्कि “आस्था, दान और पारदर्शिता” के बड़े प्रश्न को केंद्र में रखता है, जो इसे एक संतुलित लेकिन प्रभावशाली ओपिनियन बनाता है।




