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मातृत्व से बड़ी शक्ति दुनिया में कुछ नहीं

लाइफस्टाइल | सतीश कुमार, प्रोफेसर, इग्नू | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 जुलाई 2026

ठीक बीस वर्ष पहले की बात है। सुबह के करीब साढ़े चार बजे थे। पटना के कुर्जी अस्पताल में माँ पिछले चौदह दिनों से वेंटिलेटर पर थीं। बड़ी बहन माँ के पास बैठकर उन्हें भजन सुना रही थीं और हम सब—मैं, पत्नी, भाभी और भैया—कमरे के ठीक बाहर थे। पिछले पंद्रह दिनों से किसी की नींद पूरी नहीं हुई थी। अस्पताल के बाहर मच्छरों से बचने के लिए शरीर पर ओडोमॉस लगाकर हम चंद मिनटों के लिए वहीं सो गए थे। डॉक्टरों की बातों और माँ की हालत को देखते हुए वेंटिलेटर से उनके लौट आने की उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी थी, लेकिन मन ऐसी चीज है जो आखिरी क्षण तक चमत्कार की उम्मीद नहीं छोड़ता। अचानक दीदी की चीत्कार सुनाई दी और हम सबकी आंखें खुल गईं। डर और सच, दोनों एक साथ दिमाग में दौड़ पड़े। जिस अनहोनी को पंद्रह दिनों से स्वीकार नहीं करना चाहते थे, वह हमारे सामने खड़ी थी। उस एक चीत्कार ने जैसे भीतर बहुत कुछ तोड़ दिया। आज उस सुबह को बीस वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन कुछ आवाजें समय के साथ धुंधली नहीं होतीं। वे स्मृति में उसी तीव्रता से दर्ज रहती हैं।

आज, बीस वर्ष बाद, जब माँ की छवि और उनके प्यार को समझने की कोशिश करता हूं तो लगता है कि जीवन की कई बड़ी सच्चाइयां हमारे बिल्कुल सामने, बहुत सामान्य और सहज रूप में मौजूद होती हैं। हम स्त्री-विमर्श करते हैं, स्त्री की शक्ति और उसकी कमजोरियों पर साहित्यिक और सामाजिक बहस करते हैं। स्त्री को कभी मजबूत कहा जाता है और कभी अबला। इन बहसों के अपने संदर्भ हो सकते हैं, लेकिन मैं इतना जरूर मानता हूं कि माँ भी एक स्त्री होती है और मातृत्व में स्त्री के साहस का शायद सबसे विराट रूप दिखाई देता है। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा कि मेरी माँ कोई असाधारण स्त्री थीं। मेरी समझ में लगभग हर माँ अपने बच्चों के लिए असाधारण हो जाती है। मातृत्व में एक ऐसी शक्ति है जो भय के सामान्य नियमों को भी तोड़ देती है।

सत्तर के दशक की एक घटना आज भी मेरे भीतर जीवित है। पूरा परिवार गांव में था। स्कूल की छुट्टियां थीं। मेरी उम्र सात-आठ वर्ष रही होगी और बड़े भाई मुझसे करीब तीन वर्ष बड़े थे। एक रात गांव में नक्सली हमले की खबर फैल गई। गोलियों की आवाज और अफरा-तफरी ने पूरे गांव को भय से भर दिया था। लोगों ने अपने घरों की ढिबरियां तक बुझा दी थीं ताकि अंधेरे में घरों का पता न चले। पुरुष हथियार लेकर घरों के सुरक्षित कोनों में तैनात थे और बाहर निकलने की हिम्मत शायद ही किसी में थी। तभी माँ को पता चला कि उनका बड़ा बेटा घर से बाहर है। उस क्षण उनके लिए गोलियों का डर, रात का अंधेरा और बाहर मंडराता खतरा सब गौण हो गया। माँ ने टॉर्च उठाई और अकेली गांव में बेटे को खोजने निकल पड़ीं। वह आवाज लगाती हुई अंधेरे में आगे बढ़ती रहीं और बेटे को खोजकर ही वापस लौटीं। आज जब उस घटना को याद करता हूं तो मन में एक ही प्रश्न उठता है—ऐसी निडरता को आखिर किस पैमाने पर मापा जाए? जो लोग स्त्री को सहज रूप से ‘अबला’ कह देते हैं, उन्हें शायद मातृत्व के इस रूप को समझना चाहिए। अपने बच्चे पर संकट आते ही माँ के भीतर से जो साहस निकलता है, उसके सामने कई बार बड़े से बड़ा भय छोटा पड़ जाता है।

माँ से मिली दूसरी बड़ी सीख प्रेम और संवाद की है। आज विश्वविद्यालयों और मीडिया संस्थानों में कम्युनिकेशन के सिद्धांत पढ़ाए जाते हैं। संवाद कैसे स्थापित किया जाए, भाषा की बाधाएं कैसे तोड़ी जाएं, अलग सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों के बीच विश्वास कैसे पैदा किया जाए—इन विषयों पर किताबें लिखी जाती हैं। माँ को अक्षर ज्ञान था, लेकिन आज की औपचारिक परिभाषा में शायद उन्हें बहुत शिक्षित नहीं माना जाता। वह भोजपुरी मिश्रित हिंदी बोलती थीं। बाबूजी का बिहार सरकार की सेवा के दौरान काठमांडू स्थानांतरण हुआ तो हम लोग भी कुछ समय माँ के साथ वहां रहे। हमारे पड़ोस में अत्यंत संभ्रांत और अभिजात परिवार रहते थे। कोई नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में जज था, कोई सेना या राजशाही से जुड़े उच्च पद पर था। कुछ परिवार भारतीय मूल के नेपाली थे। सामाजिक हैसियत, भाषा और जीवनशैली के स्तर पर उनके और माँ के बीच बहुत अंतर था, लेकिन माँ के पास एक ऐसी भाषा थी जिसके लिए किसी डिग्री, व्याकरण या शब्दकोश की जरूरत नहीं थी—वह थी प्रेम की भाषा। उन्होंने अपने सहज व्यवहार और अपनत्व से संवाद की सारी दीवारें तोड़ दीं। धीरे-धीरे हर पड़ोसी उनका अपना हो गया। आज जब कम्युनिकेशन के सिद्धांतों पर चर्चा होती है तो कबीर की वह पंक्ति बार-बार याद आती है—“ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।” माँ ने शायद संचार का कोई आधुनिक सिद्धांत नहीं पढ़ा था, लेकिन मनुष्य से मनुष्य को जोड़ने का सबसे बड़ा सिद्धांत उन्हें आता था।

जिस वर्ष माँ हमें छोड़कर गईं, उस वर्ष पटना में असाधारण बारिश हुई थी। शहर की कई सड़कें पानी में डूबी हुई थीं। हमारा घर फुलवारी शरीफ में था और अस्पताल तक पहुंचना आसान नहीं था। परिवार ने अस्पताल में रहने की ड्यूटियां बांट रखी थीं, लेकिन रात होते-होते हम भाई-बहन कोई न कोई बहाना बनाकर अस्पताल पहुंच ही जाते। बनाए हुए सारे नियम टूट जाते थे। घर पर केवल बच्चे और बाबूजी रह जाते और पत्नी तथा भाभी भी अस्पताल में हमारे साथ होतीं। उन पंद्रह दिनों में किसी को याद नहीं रहा कि ठीक से खाना कब खाया, कितनी नींद ली या अस्पताल पहुंचने के लिए कितनी दूर पानी में चलना पड़ा। सबकी एक ही चिंता थी—माँ। शायद परिवार की वास्तविक परिभाषा भी संकट के ऐसे ही दिनों में समझ आती है। जिस एक व्यक्ति ने जीवन भर पूरे परिवार को बांधकर रखा हो, जब वही जिंदगी और मौत के बीच खड़ा हो तो पूरा परिवार अनायास उसके चारों ओर सिमट आता है।

आज माँ को गए ठीक दो दशक हो चुके हैं। इस बीच एक पूरी नई पीढ़ी तैयार हो गई। समय का चक्र देखिए कि जिस उम्र में माँ इस दुनिया से विदा हुई थीं, आज हम भाई-बहन स्वयं उस उम्र के आसपास दस्तक दे रहे हैं। बाल सफेद होने लगते हैं, बच्चे बड़े हो जाते हैं, जीवन जिम्मेदारियों की नई परिभाषाएं लिख देता है, लेकिन माँ की अनुपस्थिति पुरानी नहीं होती। उनकी कमी आज भी कभी-कभी उतनी ही तीखी लगती है जितनी उस सुबह दीदी की चीत्कार सुनते हुए लगी थी। समय दुख के साथ जीना जरूर सिखा देता है, लेकिन कुछ रिश्तों की जगह नहीं भरता।

शायद इसलिए माँ केवल एक रिश्ता नहीं, एक अनुभूति है। माँ प्रेम का वह स्रोत है जहां अधिकार के साथ त्याग है, चिंता के साथ साहस है और बिना किसी अपेक्षा के देने की स्वाभाविक इच्छा है। हम जीवन भर दुनिया को समझने की कोशिश करते रहते हैं—किताबों से, अनुभवों से, दर्शन से और समाज से। लेकिन संभव है कि जीवन के कुछ सबसे बड़े पाठ हमें बचपन में ही माँ ने बिना बताए पढ़ा दिए हों। यदि हम माँ की उस सहज भाषा, करुणा, साहस और प्रेम को थोड़ा भी अपने जीवन में उतार सकें तो शायद हम बेहतर पेशेवर बनने से पहले बेहतर मनुष्य बन सकेंगे।

माँ को गए बीस वर्ष हो गए, मगर मेरी कोशिश आज भी उन्हें समझने की है। उनके साहस को समझने की, उनके प्रेम को समझने की और उनकी आंखों से जीवन को देखने की। उम्र बढ़ने के साथ शायद एक बात और साफ होती जाती है—माँ चली जाती है, लेकिन मातृत्व की छाया नहीं जाती। वह स्मृतियों में, संस्कारों में, हमारे व्यवहार में और जीवन को देखने की हमारी दृष्टि में कहीं न कहीं बनी रहती है। और इसीलिए मुझे आज भी लगता है—मातृत्व से बड़ी शक्ति दुनिया में शायद कुछ नहीं।

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