राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | भुवनेश्वर | 18 सितंबर 2026
ओडिशा से सरकारी कल्याण योजना में कथित बड़े फर्जीवाड़े का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। एक ड्राफ्ट ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले 2,487 मजदूरों को सरकारी रिकॉर्ड में मृत दिखाया गया, जबकि वे वास्तव में जीवित थे। हैरानी की बात यह है कि इन मजदूरों के नाम पर उनके कथित नामित परिजनों को मृत्यु सहायता की राशि भी दे दी गई।
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, इन मजदूरों को ओडिशा की निर्माण श्रमिक कल्याण योजना (Nirman Shramik Scheme) के तहत मृत घोषित किया गया। इसके बाद उनके नामित लोगों को कथित तौर पर 15 करोड़ रुपये से ज्यादा की सहायता का भुगतान हुआ। लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में मृत बताए गए यही मजदूर बाद में राशन लेने के लिए आधार प्रमाणीकरण कराते पाए गए।
यानी सरकारी रिकॉर्ड में जिस व्यक्ति की मौत हो चुकी थी, वही व्यक्ति बाद में सरकारी राशन व्यवस्था में जीवित नागरिक के तौर पर सामने आया। रिपोर्ट के मुताबिक इन 2,487 मजदूरों ने अपनी कथित मौत की तारीख के बाद भी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (NFSA) और राज्य की खाद्य सुरक्षा योजना के तहत सब्सिडी वाला अनाज हासिल किया।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह सिर्फ किसी एक रिकॉर्ड की गलती का मामला नहीं दिखता। ऑडिट में सामने आए आंकड़े सरकारी योजनाओं में लाभार्थियों के रिकॉर्ड की जांच और अलग-अलग सरकारी डेटाबेस के बीच तालमेल पर सवाल खड़े करते हैं। अगर किसी व्यक्ति को मृत्यु प्रमाणपत्र जारी हो चुका था, उसके नाम पर मृत्यु सहायता भी मिल चुकी थी और फिर उसी व्यक्ति का आधार प्रमाणीकरण राशन लेने के लिए हुआ, तो इन रिकॉर्डों के बीच जांच की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
ड्राफ्ट ऑडिट रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मेडिकल अधिकारियों ने ऐसे निर्माण श्रमिकों के मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किए जो वास्तव में जीवित थे। इन प्रमाणपत्रों के आधार पर उनके नामित लोगों को योजना की मृत्यु सहायता मिली। हालांकि, अंतिम ऑडिट रिपोर्ट और आगे की जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि इन मामलों में किस स्तर पर गड़बड़ी हुई, कितने लोगों ने जानबूझकर गलत जानकारी दी और अधिकारियों की भूमिका क्या रही।
मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी सिस्टम में किसी व्यक्ति की मृत्यु दर्ज होने के बाद भी उसका आधार प्रमाणीकरण कैसे होता रहा और राशन कैसे मिलता रहा। अलग-अलग सरकारी योजनाओं में लाभार्थियों के रिकॉर्ड मौजूद होने के बावजूद अगर यह विसंगति लंबे समय तक पकड़ में नहीं आई, तो इससे सरकारी निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठते हैं।
अब इस मामले में आगे की जांच महत्वपूर्ण होगी। यह पता लगाना होगा कि मृत घोषित किए गए सभी 2,487 मजदूरों के मामले एक जैसी प्रक्रिया से जुड़े थे या इनमें अलग-अलग तरह की अनियमितताएं थीं। साथ ही यह भी जांच का विषय होगा कि 15 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता किस प्रक्रिया के तहत जारी हुई और इसमें सरकारी अधिकारियों, बिचौलियों या अन्य लोगों की कोई भूमिका थी या नहीं।
यह मामला सरकारी योजनाओं में सही लाभार्थियों तक पैसा और सुविधाएं पहुंचाने की चुनौती को भी सामने लाता है। गरीब और निर्माण श्रमिकों के लिए बनाई गई कल्याण योजनाओं में अगर फर्जी लाभार्थी या गलत रिकॉर्ड के जरिए सरकारी धन निकलता है, तो उसका असर वास्तविक जरूरतमंदों पर भी पड़ सकता है। अब निगाहें अंतिम ऑडिट रिपोर्ट और सरकार की ओर से होने वाली कार्रवाई पर रहेंगी।



