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गोदी मीडिया के महापाप की गाथा: रैली से पहले ही विपक्ष को ‘अराजक’ घोषित करने की कैसी पत्रकारिता?

ABP News की पोस्ट पर उठे सवाल, 1 नवंबर की विपक्षी रैली से पहले ही ‘अराजकता’ का फ्रेम क्यों? चुनावी पारदर्शिता पर सवाल पूछने वालों को बदनाम करने की कोशिश या पत्रकारिता के नाम पर पूर्वाग्रह—मीडिया की जवाबदेही पर तीखी बहस

मीडिया | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 30 अक्टूबर 2026

लोकतंत्र में रैली अभी हुई भी नहीं, सड़क पर प्रदर्शनकारियों ने कदम भी नहीं रखा, किसी घटना की जांच भी नहीं हुई—लेकिन टीवी की सुर्खियों में ‘अराजकता’ का सवाल पहले ही पहुंच गया। यही वह बिंदु है, जहां पत्रकारिता की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा होता है। विपक्ष 1 नवंबर को रैली करने जा रहा है और ABP News की सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा गया—“1 नवंबर की डेट, ‘अराजकता सेट’?” सवाल यह है कि जब कोई घटना हुई ही नहीं, तो उसे पहले से अराजकता के चश्मे से दिखाने की जरूरत क्यों पड़ी?

क्या मीडिया का काम जनता को तथ्यों से अवगत कराना है या किसी लोकतांत्रिक प्रदर्शन के प्रति पहले से संदेह पैदा करना? क्या रैली के उद्देश्य, चुनावी प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों और आयोजकों के पक्ष को सामने रखने से पहले ही नकारात्मक संकेत देना निष्पक्ष पत्रकारिता का तकाजा है?

वोट चोरी के सवाल पर बहस, जवाब देने के बजाय प्रदर्शन को शक के घेरे में क्यों?

1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली रैली का मुद्दा स्पष्ट है। कांग्रेस के नेतृत्व वाला INDIA गठबंधन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं, मतदाताओं के नाम हटाए जाने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही को लेकर विरोध प्रदर्शन करने जा रहा है। दिल्ली पुलिस ने रैली के लिए निर्धारित शर्तों के साथ अनुमति दी है। NDTV +1

राहुल गांधी ने छात्रों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं, युवाओं और व्यापारियों से रैली में शामिल होने की अपील की है। विपक्ष इसे वोट के अधिकार और संविधान की रक्षा से जुड़ा आंदोलन बता रहा है। दूसरी ओर, बीजेपी ने रैली की तारीख और विपक्ष के अभियान पर सवाल उठाए हैं। ऐसे राजनीतिक टकराव में मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सभी पक्षों को सामने रखे और दर्शकों को तथ्यों के आधार पर राय बनाने का अवसर दे। India News +1

पत्रकारिता का काम चेतावनी देना है या पहले ही फैसला सुना देना?

किसी बड़े प्रदर्शन में भीड़, यातायात और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियां हो सकती हैं। इन पर सवाल उठाना मीडिया का अधिकार ही नहीं, जिम्मेदारी भी है। लेकिन संभावित अव्यवस्था पर सवाल पूछने और पूरे आयोजन को पहले से ‘अराजकता’ के फ्रेम में रखने के बीच फर्क है।

अगर चैनल को किसी गड़बड़ी की आशंका है, तो उसे बताना चाहिए कि आशंका का आधार क्या है, प्रशासन ने क्या तैयारी की है और आयोजकों ने क्या आश्वासन दिया है। केवल एक उत्तेजक शीर्षक से दर्शकों के मन में किसी रैली के प्रति धारणा बन सकती है, जबकि वास्तविक घटनाक्रम अभी सामने आया ही नहीं है।

यही वजह है कि ABP News की पोस्ट की भाषा पर सवाल उठ रहे हैं। निष्पक्ष पत्रकारिता का पैमाना यह नहीं कि किसी चैनल ने कितनी तीखी बहस की, बल्कि यह है कि उसने कितने तथ्य सामने रखे और कितनी ईमानदारी से अलग-अलग पक्षों को सुना।

मतदाता सूची पर सवालों का जवाब तथ्यों से दीजिए

विपक्ष का आरोप है कि SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए और पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। निर्वाचन आयोग की ओर से SIR का उद्देश्य मृत, स्थानांतरित और दोहराव वाले मतदाताओं की प्रविष्टियों को ठीक करना बताया गया है। इसलिए जरूरी है कि नाम हटाने और जोड़ने के आंकड़ों, आपत्तियों और सुधार की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच हो। विपक्ष के आरोपों को बिना जांच सच मानना उचित नहीं, लेकिन उन्हें बिना पड़ताल खारिज करना भी नहीं। India News +1

यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसे न्याय मिलना चाहिए। यदि किसी राजनीतिक दल का दावा गलत है, तो उसका खंडन प्रमाणों के साथ होना चाहिए। यही वह काम है जिसकी जनता मीडिया से अपेक्षा करती है।

लोकतंत्र में विपक्ष दुश्मन नहीं, सवाल पूछने वाला पक्ष है

सरकार की आलोचना करना, चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना और शांतिपूर्ण रैली करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। इसी तरह मीडिया को किसी भी राजनीतिक दल से कठिन सवाल पूछने का अधिकार है। लेकिन सवाल पूछने का अधिकार तभी विश्वसनीय बनता है, जब भाषा तथ्यों से आगे निकलकर फैसला सुनाने न लगे।

यदि 1 नवंबर की रैली में कोई कानून तोड़ता है, तो उसकी रिपोर्टिंग होनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों पर कानून के मुताबिक कार्रवाई भी। लेकिन यदि रैली शांतिपूर्ण रहती है, तो मीडिया को उतनी ही स्पष्टता से यह तथ्य भी दिखाना चाहिए।

सत्ता से सवाल पूछना पत्रकारिता है, जनता को पहले से निष्कर्ष थमाना नहीं।

गोदी मीडिया कहकर आलोचना करना आसान है, लेकिन असली कसौटी हर चैनल की रिपोर्टिंग, उसके तथ्यों और उसके सवालों में दिखनी चाहिए। ABP News की पोस्ट पर उठे सवालों का जवाब भी इसी कसौटी पर होना चाहिए।

लोकतंत्र में न विपक्ष को कानून से ऊपर रखा जा सकता है और न मीडिया को सवालों से। जनता को डर, पूर्वाग्रह या राजनीतिक प्रचार नहीं—पूरी जानकारी चाहिए। 1 नवंबर की रैली की असली तस्वीर उसके वास्तविक घटनाक्रम से सामने आएगी, किसी टीवी शीर्षक से नहीं।

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