खेल | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 अक्टूबर 2026
दिल्ली के धूल भरे मैदानों पर टेनिस बॉल से गेंदबाजी करने वाला एक लड़का आज भारतीय क्रिकेट में डेथ ओवर्स का भरोसेमंद हथियार बन रहा है। नजफगढ़ के 24 वर्षीय तेज गेंदबाज प्रिंस यादव की कहानी उन खिलाड़ियों की है, जिनकी प्रतिभा बड़े स्टेडियमों की चमक-दमक में नहीं, बल्कि गलियों और खुले मैदानों में पसीना बहाते हुए निखरती है। कभी गीली टेनिस बॉल से यॉर्कर डालने का अभ्यास करने वाले प्रिंस अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपनी गेंदबाजी से पहचान बना रहे हैं।
प्रिंस अपनी गेंदबाजी की रफ्तार और हाथ की तेजी का श्रेय टेनिस बॉल क्रिकेट को देते हैं। लखनऊ सुपर जायंट्स (LSG) की वेबसाइट पर उन्होंने बताया कि टेनिस बॉल क्रिकेट ने उनकी आर्म स्पीड विकसित करने में अहम भूमिका निभाई।
गीली टेनिस बॉल ने सिखाई तेज गेंदबाजी
दिल्ली की सर्द और ओस भरी शामों में गीली टेनिस बॉल से अभ्यास करना प्रिंस के लिए आसान नहीं था। गीली गेंद सामान्य टेनिस बॉल से भारी हो जाती थी। उसे तेज गति से फेंकने के लिए अधिक ताकत, बेहतर नियंत्रण और लगातार अभ्यास की जरूरत पड़ती थी।
प्रिंस के मुताबिक, टेनिस बॉल या टेप बॉल क्रिकेट में गेंदबाज को बल्लेबाज को चकमा देने के लिए गति और यॉर्कर पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है। ऐसी गेंद सामान्य क्रिकेट बॉल की तरह हवा में स्विंग नहीं करती और न ही पिच से उसी तरह मूवमेंट हासिल करती है। इसलिए बल्लेबाज को रोकने के लिए गेंद की रफ्तार और सटीकता बेहद महत्वपूर्ण होती है।
प्रिंस ने बताया कि उनका लक्ष्य गेंद को जितनी तेजी से संभव हो, यॉर्कर की तरह बल्लेबाज के पैरों के पास डालना था। इस अभ्यास ने उन्हें मैच जैसी परिस्थितियों से निपटना सिखाया।
डेथ ओवर्स में गेंदबाज की असली परीक्षा
टी20 क्रिकेट में डेथ ओवर्स यानी पारी के आखिरी ओवर गेंदबाज के लिए सबसे मुश्किल समय माना जाता है। बल्लेबाज तेजी से रन बनाने के लिए हर गेंद पर बड़ा शॉट खेलने की कोशिश करते हैं। ऐसे में छोटी-सी गलती भी छक्का या चौका बन सकती है।
यॉर्कर इस स्थिति में गेंदबाज का सबसे प्रभावी हथियार होती है। यदि गेंद बल्लेबाज के पैरों के पास सही जगह पर गिरे, तो उसके लिए खुलकर शॉट खेलना मुश्किल हो जाता है। लेकिन लगातार सही यॉर्कर डालना आसान नहीं है। दबाव में गेंद की लंबाई और लाइन पर नियंत्रण बनाए रखना पड़ता है।
प्रिंस की खासियत यही बताई जा रही है कि वह मुश्किल समय में अपनी योजना पर टिके रहते हैं। लखनऊ सुपर जायंट्स के गेंदबाजी कोच मोर्ने मोर्कल के मुताबिक, प्रिंस का शांत रहना टीम प्रबंधन के भरोसे की बड़ी वजह है।
अपनी फील्डिंग, अपनी रणनीति
प्रिंस की गेंदबाजी की एक और दिलचस्प बात यह है कि वह केवल गेंद की गति पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि बल्लेबाज के सामने किस तरह की फील्ड लगनी चाहिए, इस पर भी ध्यान देते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वह अपनी गेंदबाजी के लिए खुद फील्ड तय करने की जिम्मेदारी लेते हैं।
डेथ ओवर्स में यह समझ काफी मायने रखती है। गेंदबाज को यह अंदाजा लगाना होता है कि बल्लेबाज किस दिशा में शॉट खेल सकता है और किस तरह की गेंद से उसे उस शॉट के लिए मजबूर किया जा सकता है। यॉर्कर, गति में बदलाव और सही फील्डिंग का तालमेल बल्लेबाज के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।
नजफगढ़ के मैदानों से बड़ा मंच
प्रिंस यादव की कहानी बताती है कि क्रिकेट में सफलता का रास्ता हमेशा बड़े कोचिंग सेंटरों या चमकदार अकादमियों से होकर नहीं गुजरता। स्थानीय मैदानों पर सीखा गया हुनर भी सही मौके और मेहनत के साथ बड़े स्तर पर काम आ सकता है।
टेनिस बॉल से गेंदबाजी करते हुए जो गति, नियंत्रण और आत्मविश्वास उन्होंने हासिल किया, वही अब उनके क्रिकेट करियर की पहचान बन रहे हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतरता बनाए रखना किसी भी गेंदबाज के लिए बड़ी चुनौती होती है। बल्लेबाज हर मैच के साथ उनकी गेंदबाजी का अध्ययन करेंगे और नई रणनीतियां अपनाएंगे।
प्रिंस के सामने भी यही परीक्षा है—अपनी यॉर्कर की धार बनाए रखना, दबाव में शांत रहना और हर मैच में टीम के भरोसे पर खरा उतरना।
दिल्ली के धूल भरे मैदानों से निकले इस तेज गेंदबाज की कहानी युवा क्रिकेटरों के लिए एक संदेश है: साधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन मेहनत, अभ्यास और खेल की समझ किसी खिलाड़ी को बड़े मंच तक पहुंचा सकती है।



