राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 6 अगस्त 2026
संसद का मानसून सत्र लगातार गतिरोध की गिरफ्त में है और केंद्र सरकार एक साथ कई मोर्चों पर घिरी दिखाई दे रही है। एक तरफ NEET पेपर लीक के खिलाफ सड़कों पर उतरे युवाओं पर 20 जुलाई की कार्रवाई को लेकर लाठीचार्ज, हिरासत, उत्पीड़न और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बदसलूकी के गंभीर सवाल सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहे, दूसरी तरफ अयोध्या राम मंदिर के करोड़ों रुपए के चंदे से जुड़ी भारी गड़बड़ी को लेकर विपक्ष संसद में हिसाब मांग रहा है। विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की सदन में मौजूदगी तथा इन मुद्दों पर जवाब की मांग कर रहा है। दोनों नेता सदन से गायब हैं। लेकिन इन सवालों के बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और CPI को ही ‘राम विरोधी’ बता दिया। इसके बाद सवाल और बड़ा हो गया है—मुद्दा राम का था या राम के नाम पर आए धन के हिसाब का? और यदि विपक्ष हिसाब मांग रहा है तो यह भगवान राम का विरोध कैसे हो गया?
20 जुलाई की घटना सरकार के लिए लगातार राजनीतिक सिरदर्द बनी हुई है। NEET आंदोलन में शामिल युवाओं ने सार्वजनिक रूप से पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर बातें कही हैं। किसी ने लाठीचार्ज की कहानी सुनाई, किसी ने हिरासत और उत्पीड़न की, तो महिला प्रदर्शनकारियों ने RAF कर्मियों के व्यवहार को लेकर बेहद गंभीर सवाल उठाए। आंदोलनकारी नूतन टोप्पो ने राहुल गांधी के सामने पैलेट गन से चोट लगने का दावा किया। प्रदर्शन के दौरान हथियारों की मौजूदगी और इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठे हैं। सिविल ड्रेस में मौजूद लोगों की भूमिका, हेलमेट लगाकर पहचान छिपाने और मौके पर तैनात सुरक्षाकर्मियों की वर्दी पर नेम प्लेट न दिखाई देने को लेकर आंदोलनकारियों ने सवाल उठाए हैं। यदि पुलिस कार्रवाई पूरी तरह नियमों के तहत थी तो सरकार के लिए सबसे आसान रास्ता यही है कि पूरी कार्रवाई का रिकॉर्ड, आदेश और जवाबदेही देश के सामने रख दे। लेकिन सवाल यह है कि शांतिपूर्वक आंदोलन करने पर अत्याचार को कोई सरकार किस तरह डिफेंड कर सकती है?
सबसे असहज तस्वीर यह है कि जिन युवाओं के साथ ज्यादती हुई, वे मीडिया के कैमरों के सामने आकर अपना नाम, चेहरा और अनुभव सार्वजनिक कर रहे हैं। मुस्कान शर्मा पूछ रही हैं कि शांतिपूर्वक चलते हुए उन्हें क्यों मारा गया और एक पुरुष RAF अधिकारी ने उनके साथ आपत्तिजनक व्यवहार कैसे किया? फराह नाज़ कह रही हैं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बाद उन्हें हिरासत में लिया गया और ‘देशद्रोही’ कहा गया। रिया अहीर का आरोप है कि शिकायत देने के बावजूद FIR दर्ज नहीं हुई। नूतन टोप्पो पैलेट गन से घायल होने की बात कह रही हैं। इन आरोपों की गंभीरता इतनी है कि सरकार से स्पष्ट जवाब अपेक्षित है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसी बिंदु पर गृह मंत्री अमित शाह को राजनीतिक रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि दो ही स्थितियां हो सकती हैं—या तो गृह मंत्री को पता नहीं था कि क्या हो रहा है, या उन्हें जानकारी थी; दोनों परिस्थितियों में जवाबदेही का प्रश्न उठता है। विपक्ष का सवाल चुभता हुआ है—जब ये युवा प्रेस के सामने खड़े होने का साहस दिखा सकते हैं, तो प्रधानमंत्री और गृह मंत्री संसद में खड़े होकर इन सवालों का सामना क्यों नहीं कर सकते?
सरकार अभी NEET आंदोलन की राजनीतिक आग से निकलने की कोशिश ही कर रही थी कि अयोध्या राम मंदिर के चंदे से जुड़ा विवाद उसके सामने दूसरी बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया। राम मंदिर के लिए देशभर के करोड़ों लोगों ने अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार दान दिया। भारी वित्तीय अनियमितताओं और चोरी का मुद्दा उठा रहा है तथा विपक्ष संसद में चर्चा चाहता है। चंदे में सैकड़ों करोड़ रुपए की चोरी का सवाल अपने-आप में बेहद गंभीर है। यह किसी सामान्य सरकारी योजना का पैसा नहीं, बल्कि भगवान राम के नाम पर श्रद्धालुओं द्वारा दिया गया धन है। इसलिए इसकी एक-एक पाई की पारदर्शिता की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से और अधिक है।
लेकिन यहीं राजनीति ने ऐसी करवट ली कि सवाल चंदे से हटकर आस्था पर पहुंच गया। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और CPI को ‘राम विरोधी’ बताते हुए उनसे माफी मांगने को कहा। अब विपक्ष पूछ रहा है—हम पूछ रहे थे राम मंदिर के चंदे में कथित गड़बड़ी किसने की, सरकार बता रही है कि सवाल पूछने वाला ही राम विरोधी है! यही वह बिंदु है जहां ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत राजनीतिक रूप से सटीक बैठती दिखाई देती है। यदि विपक्ष के आरोप झूठे हैं तो संसद में दस्तावेज रखिए, पूरा हिसाब बताइए, जांच रिपोर्ट सामने लाइए और आरोप लगाने वालों को तथ्यों से बेनकाब कर दीजिए। लेकिन यह संभव ही नहीं है। तथ्यों के अनुसार 42 दिन में 70 बार चोरी तो सीसीटीवी में दिखाई दी है तो फिर रक्षक बताएं कि वो भक्षक कैसे बन गए? राम के नाम पर सरकार में आई सरकार राम का पैसा खाने की दोषी मानी जा रही है। अब ऐसे में रामधन का हिसाब मांगने वाले की धार्मिक आस्था पर हमला करना किस सवाल का जवाब है?
RSS और बीजेपी के सामने सबसे बड़ी वैचारिक असुविधा भी यहीं खड़ी होती है। जिस राम मंदिर आंदोलन को संघ परिवार ने दशकों तक हिंदू अस्मिता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राजनीतिक लामबंदी के केंद्र में रखा, उसी मंदिर के लिए जनता से आए पैसे की पारदर्शिता पूछना ‘राम विरोध’ कैसे हो गया? राम के नाम पर आंदोलन करना राष्ट्रभक्ति, राम के नाम पर वोट मांगना आस्था, राम मंदिर को राजनीतिक उपलब्धि बताना गौरव—लेकिन राम के नाम पर आए चंदे का हिसाब मांगना अचानक राम-विरोध? यह राजनीतिक गणित जितना सुविधाजनक है, लोकतांत्रिक कसौटी पर उतना ही कमजोर है। भगवान राम किसी दल, संगठन या विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं हैं। कोई राजनीतिक दल यह तय नहीं कर सकता कि सरकार से सवाल पूछने वाला राम भक्त है या राम विरोधी।
दरअसल विपक्ष लंबे समय से BJP और RSS पर यही आरोप लगाता आया है कि जब सत्ता के सामने बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था, संस्थागत जवाबदेही या भ्रष्टाचार जैसे असुविधाजनक सवाल खड़े होते हैं तो राजनीतिक विमर्श को धर्म, राष्ट्रवाद और पहचान की तरफ मोड़ दिया जाता है। मौजूदा घटनाक्रम ने इस आरोप को फिर धार दे दी है। NEET पर सवाल पूछो तो आंदोलनकारियों की नीयत पर सवाल; पुलिस कार्रवाई का हिसाब मांगो तो आंदोलन की राजनीति खोजो; राम मंदिर के चंदे पर सवाल उठाओ तो ‘राम विरोधी’ का ठप्पा लगा दो। सवाल बदलते रहते हैं, लेकिन राजनीतिक जवाब का ढांचा वही रहता है—मूल मुद्दे से ध्यान हटाओ और सवाल पूछने वाले को ही कठघरे में खड़ा कर दो।
यही वजह है कि संसद का गतिरोध अब महज सरकार बनाम विपक्ष की रोजमर्रा की लड़ाई नहीं रह गया है। राहुल गांधी गृह मंत्री से 20 जुलाई की कार्रवाई पर जवाब चाहते हैं। अखिलेश यादव ‘राम धन’ की चोरी को लेकर बीजेपी पर हमला कर रहे हैं। विपक्ष राम मंदिर चंदे पर चर्चा चाहता है। दूसरी ओर सरकार विपक्ष पर भगवान राम के अपमान और राम-विरोध का आरोप लगा रही है। सदन बार-बार बाधित हो रहा है। लेकिन इस पूरे राजनीतिक शोर में देश को जिस चीज की सबसे अधिक जरूरत है, वही सबसे कम दिखाई दे रही है—सीधा जवाब। संसद सरकार की गोदी मीडिया नहीं है जहां सवाल चुनने की सुविधा सत्ता के पास हो; संसद की असली परीक्षा ही तब होती है जब सरकार को वह सवाल सुनना और उसका जवाब देना पड़े जिसे वह सुनना नहीं चाहती।
RSS-BJP की राजनीति के लिए यह परिस्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि सामने अब केवल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी या दूसरे पारंपरिक विपक्षी दल नहीं हैं। सामने वह युवा पीढ़ी भी खड़ी है जो परीक्षा, नौकरी, पेपर लीक और अपने भविष्य के सवाल लेकर सड़क पर उतरी है। यह पीढ़ी टीवी के पुराने राजनीतिक नारों से कहीं अधिक सीधे सवाल पूछ रही है—परीक्षा का पेपर क्यों लीक हुआ? जिम्मेदार कौन है? विरोध किया तो लाठी क्यों चली? महिलाओं के साथ बदसलूकी किसके आदेश पर हुई? पैलेट गन और AK 47 से जुड़े आरोपों का सच क्या है? AK 47 चलाने वाला सस्पेंड भी हो चुका है, यानी सरकार की मुहर लग चुकी है कि फायरिंग AK 47 से भी हुई थी। यदि सरकार युवाओं को देश का भविष्य बताती है तो उन्हीं युवाओं की शिकायत सुनने में इतनी परेशानी क्यों है? इन सवालों का जवाब ‘राष्ट्रवाद’ या ‘राम विरोधी’ नहीं हो सकता।
राम मंदिर के मामले में भी सवाल उतना ही सीधा है। यदि चंदे में एक रुपये की भी चोरी नहीं हुई तो सरकार, ट्रस्ट और संबंधित संस्थाएं पूरा रिकॉर्ड सामने रखकर विवाद हमेशा के लिए समाप्त कर सकती हैं। यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो दोषी की राजनीतिक, धार्मिक या संस्थागत पहचान देखे बिना कार्रवाई होनी चाहिए। क्योंकि राम के नाम पर दिया गया पैसा किसी पार्टी का चुनावी फंड नहीं, श्रद्धालुओं की आस्था का धन है। उस धन की रक्षा करना राम का सम्मान है; उसका हिसाब मांगना राम का अपमान नहीं। उलटे, यदि भगवान राम के नाम का इस्तेमाल हिसाब मांगने वालों को चुप कराने के लिए किया जाता है तो सवाल उठेगा कि आस्था की रक्षा हो रही है या आस्था को राजनीतिक ढाल बनाया जा रहा है।
विडंबना इससे बड़ी क्या होगी कि बीजेपी भगवान राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहकर अपनी राजनीति के नैतिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती रही है, लेकिन उसी राम के नाम पर आए धन की पारदर्शिता का सवाल उठते ही बहस ‘कौन राम भक्त और कौन राम विरोधी’ में बदलने लगती है। राम का अर्थ मर्यादा है तो सत्ता में भी मर्यादा चाहिए। राम का अर्थ न्याय है तो श्रद्धालुओं के पैसे के साथ भी न्याय चाहिए। राम का अर्थ सत्य है तो जवाब नारे से नहीं, सत्य और दस्तावेज से आना चाहिए। और रामराज्य का दावा है तो सबसे पहले राजसत्ता को जनता के सवालों का जवाब देना होगा। भगवान राम का नाम किसी सरकार को संसदीय जवाबदेही से छूट देने वाला राजनीतिक कवच नहीं हो सकता।
चारों तरफ से सवालों में घिरी बीजेपी के लिए इस समय सबसे आसान राजनीतिक रास्ता शायद वही पुराना रास्ता है—मूल प्रश्न से बहस हटाओ, विपक्ष को खलनायक बनाओ और विवाद को ‘राम बनाम राम विरोधी’ में बदल दो। लेकिन इस बार दांव उल्टा भी पड़ सकता है, क्योंकि सवाल पूछने वाला विपक्ष अकेला नहीं है। सड़क पर छात्र हैं, परीक्षा देने वाले लाखों युवा हैं, रोजगार की प्रतीक्षा कर रही पीढ़ी है और राम मंदिर के लिए अपनी जेब से पैसा देने वाला सामान्य श्रद्धालु भी है। इनमें से हर व्यक्ति सरकार से हिसाब मांगने का अधिकार रखता है और किसी राजनीतिक दल से उसे रामभक्ति, राष्ट्रभक्ति या नागरिकता का प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के सामने इसलिए विपक्ष का सवाल बिल्कुल स्पष्ट है—संसद में आइए और जवाब दीजिए। गृह मंत्री 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई पर स्थिति स्पष्ट करें। हथियारों और पैलेट गन से जुड़े आरोपों का रिकॉर्ड सामने आए। महिला आंदोलनकारियों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो। जिन लोगों ने सिविल ड्रेस में प्रदर्शनकारियों पर हमला किया, उनकी पहचान स्पष्ट की जाए। राम मंदिर चंदे से जुड़े आरोपों पर खुली चर्चा हो और पूरा वित्तीय रिकॉर्ड देश के सामने रखा जाए।
आज सवाल यह नहीं है कि सबसे ऊंची आवाज में ‘जय श्रीराम’ कौन बोल सकता है। सवाल यह है कि राम के नाम पर आए धन का हिसाब कौन देगा। सवाल यह नहीं है कि मंचों से युवाओं को ‘अमृत पीढ़ी’ या देश का भविष्य कौन बताता है; सवाल यह है कि सड़क पर न्याय मांगते उन्हीं युवाओं पर कार्रवाई हुई तो जवाब कौन देगा? सवाल यह नहीं है कि संसद में किसके पास ज्यादा सांसद हैं; सवाल यह है कि सत्ता के पास जनता के सवालों के जवाब हैं या नहीं?
और यदि हर कठिन सवाल का जवाब कभी ‘देशद्रोही’, कभी हिंदू मुसलमान पाकिस्तान और कब्रिस्तान.. कभी ‘अराजक’, कभी ‘टुकड़े-टुकड़े’ और अब ‘राम विरोधी’ बताकर दिया जाएगा, तो सवाल खत्म नहीं होंगे। वे और बड़े होकर लौटेंगे। यही वह राजनीति है जहां पुरानी कहावत फिर जीवित होती दिखाई देती है—“उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।” और जब सत्ता से हिसाब मांगने वाले को ही कटघरे में खड़ा किया जाने लगे, सवाल पूछने वाले की आस्था पर फैसला सुनाया जाने लगे और जवाब के बदले नया नैरेटिव परोसा जाने लगे, तो जनता के सामने एक और पुरानी पंक्ति खुद-ब-खुद चली आती है—“अंधेर नगरी, चौपट राजा।”




