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परिसीमन का गणित और जनसंख्या की हकीकत: क्यों इतना आसान नहीं है यह फैसला?

राजनीति / विज्ञान एवं समाज / शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 अप्रैल 2026

भारत में “परिसीमन” यानी चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं तय करने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। सुनने में यह एक सीधी-सी प्रक्रिया लगती है—जहां ज्यादा लोग, वहां ज्यादा सीटें। लेकिन असल कहानी इससे कहीं ज्यादा पेचीदा है। जनसंख्या, जन्म दर और समाज के बदलते हालात मिलकर ऐसा गणित बनाते हैं, जिसे समझना इतना आसान नहीं है।

सीधी भाषा में समझें तो परिसीमन का मतलब है कि देश में हर क्षेत्र से बराबर लोगों का प्रतिनिधित्व हो। यानी एक सांसद के पीछे लगभग बराबर आबादी होनी चाहिए। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या सिर्फ जनसंख्या गिन लेना ही काफी है?

पिछले कुछ सालों में भारत के अलग-अलग राज्यों में जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार अलग रही है। दक्षिण भारत के राज्यों में लोग कम बच्चे पैदा कर रहे हैं, क्योंकि वहां शिक्षा, स्वास्थ्य और जागरूकता बेहतर है। वहीं उत्तर भारत के कई राज्यों में अभी भी जन्म दर ज्यादा है। अब अगर केवल आबादी के हिसाब से सीटें बांटी जाएं, तो ज्यादा आबादी वाले राज्यों को ज्यादा ताकत मिल जाएगी।

यहीं से मामला दिलचस्प भी हो जाता है और थोड़ा विवादित भी। सोचिए, जिन राज्यों ने परिवार नियोजन को अपनाया, शिक्षा और स्वास्थ्य पर काम किया, क्या उन्हें “सजा” मिलनी चाहिए कम सीटों के रूप में? और जिन राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी, क्या उन्हें “इनाम” मिलना चाहिए ज्यादा सीटों के तौर पर? यही वह सवाल है, जो इस पूरे मुद्दे को सिर्फ गणित नहीं रहने देता, बल्कि भावनाओं और राजनीति से जोड़ देता है।

विज्ञान भी इस सवाल का सीधा जवाब नहीं दे पाता। वैज्ञानिक “टोटल फर्टिलिटी रेट” यानी औसत जन्म दर का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह केवल एक औसत संख्या है। यह नहीं बताती कि किस समाज में, किस वर्ग में या किस इलाके में कितनी तेजी से बदलाव हो रहा है। यानी आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं दिखाते।

इसके अलावा एक और बड़ी बात है—देश के अलग-अलग हिस्सों की जरूरतें भी अलग हैं। जहां युवा आबादी ज्यादा है, वहां नौकरियों और शिक्षा की जरूरत ज्यादा होगी। वहीं जहां बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है, वहां स्वास्थ्य सेवाओं पर ज्यादा ध्यान देना होगा। लेकिन परिसीमन में इन बातों का सीधा हिसाब नहीं रखा जाता।

इस पूरे मुद्दे में एक डर भी छिपा है। अगर केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें तय की गईं, तो कुछ राज्यों का प्रभाव बहुत बढ़ सकता है और बाकी राज्यों को लगेगा कि उनकी आवाज कमजोर हो रही है। इससे देश के संघीय ढांचे पर भी असर पड़ सकता है।

कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इसका एक रास्ता यह हो सकता है कि संसद की कुल सीटें बढ़ा दी जाएं। इससे किसी राज्य की सीटें कम नहीं होंगी और नए संतुलन के साथ प्रतिनिधित्व तय किया जा सकेगा। यानी “केक” को बड़ा कर दिया जाए, ताकि हिस्सेदारी पर झगड़ा कम हो।

आखिर में बात इतनी है कि परिसीमन सिर्फ नक्शे पर लाइन खींचने का काम नहीं है। यह तय करता है कि देश में किसकी आवाज कितनी सुनी जाएगी। इसलिए इसे केवल आंकड़ों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

आसान शब्दों में कहें तो—परिसीमन का सवाल सिर्फ “कितने लोग” का नहीं, बल्कि “कैसे लोग और किन हालात में” का भी है। और जब तक इन दोनों बातों को साथ में नहीं समझा जाएगा, तब तक यह गणित उलझा ही रहेगा।

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