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मां की याचिका खारिज, पिता के पास कस्टडी अवैध नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट

राष्ट्रीय / विमेन / कानूनी खबर | ABC NATIONAL NEWS | प्रयागराज | 19 अप्रैल 2026

प्रयागराज से एक अहम फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पिता द्वारा बच्चे की कस्टडी लेना अपने आप में अवैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने एक महिला की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जब तक किसी अदालत के आदेश का उल्लंघन नहीं होता, तब तक पिता को “अवैध हिरासत” का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह मामला एक मां द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसके पति ने बच्चों को जबरन अपने पास रख लिया है और उन्हें अवैध रूप से रोके हुए है। महिला ने अदालत से बच्चों की तत्काल कस्टडी दिलाने की मांग की थी। हालांकि अदालत ने इस याचिका को सुनवाई योग्य (maintainable) नहीं माना और खारिज कर दिया।

अदालत की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू कानून के तहत पिता को नाबालिग बच्चे का “प्राकृतिक संरक्षक” (natural guardian) माना जाता है। ऐसे में यदि पिता बच्चे को अपने पास रखता है, तो इसे सामान्य परिस्थितियों में अवैध हिरासत नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी सक्षम अदालत द्वारा पहले से कोई आदेश पारित हो और उसका उल्लंघन किया जाए, तभी ऐसी स्थिति को गैरकानूनी माना जा सकता है।

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि पति ने वर्ष 2022 में कथित तौर पर बच्चों को जबरन अपने साथ ले लिया था और तब से उन्हें वापस नहीं किया। महिला ने यह भी दलील दी कि उसने बच्चों की कस्टडी के लिए कई मंचों पर गुहार लगाई, लेकिन उसे राहत नहीं मिली।

इसके जवाब में अदालत ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उद्देश्य केवल यह देखना होता है कि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी रूप से रोका गया है या नहीं। यदि कस्टडी किसी ऐसे व्यक्ति के पास है जो कानूनन संरक्षक है, तो यह याचिका स्वतः ही कमजोर हो जाती है। अदालत ने यह भी माना कि पारिवारिक विवादों में कस्टडी का मुद्दा अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत तय किया जाना चाहिए, न कि हैबियस कॉर्पस के जरिए।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का भी हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि बच्चे की कस्टडी के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू “बच्चे का हित” (welfare of the child) होता है। हालांकि इस मामले में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केवल यह कहना कि पिता ने बच्चों को अपने पास रखा है, इसे अवैध नहीं बनाता।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि मां को कस्टडी चाहिए तो उसे पारिवारिक अदालत (family court) या संबंधित सिविल अदालत का रुख करना चाहिए, जहां विस्तृत सुनवाई के बाद बच्चे के हित को देखते हुए निर्णय लिया जाता है।

इस फैसले को पारिवारिक कानून के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह साफ हो गया है कि माता-पिता के बीच कस्टडी विवाद में सीधे आपराधिक या असाधारण उपायों का सहारा लेने के बजाय उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाना जरूरी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पिता द्वारा बच्चे को अपने पास रखना, भले ही विवादित परिस्थितियों में क्यों न हो, तब तक अवैध नहीं माना जाएगा जब तक किसी न्यायालय के आदेश का उल्लंघन न हो। साथ ही, अदालत ने यह भी दोहराया कि ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय का आधार हमेशा बच्चे का सर्वोत्तम हित ही होगा।

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