अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | ब्रासीलिया/नई दिल्ली | 26 मई 2026
ईरान युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़ते संकट ने पूरी दुनिया की तेल राजनीति को हिला दिया है। जहां एक तरफ पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस संकट के बीच ब्राज़ील दुनिया के बड़े “ऑयल विनर” के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। खासकर भारत और चीन अब तेजी से ब्राज़ील से कच्चा तेल खरीद रहे हैं ताकि खाड़ी देशों पर अपनी निर्भरता कम की जा सके।
दरअसल, होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक माना जाता है। दुनिया का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से तेल सप्लाई पर निर्भर है। लेकिन ईरान युद्ध और समुद्री तनाव के कारण यहां तेल सप्लाई और जहाजों की आवाजाही पर बड़ा असर पड़ा है। ऐसे में एशियाई देश अब ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जहां से बिना युद्ध और प्रतिबंधों के खतरे के तेल मिल सके। इसी वजह से ब्राज़ील अचानक दुनिया के लिए बेहद अहम बन गया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन और भारत ने 2026 में ब्राज़ील से तेल खरीद में रिकॉर्ड बढ़ोतरी की है। पिछले साल जहां एशियाई देश ब्राज़ील से करीब 12 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीद रहे थे, वहीं इस साल यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 18 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया है। चीन सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है, जबकि भारत भी तेजी से ब्राज़ील की ओर झुक रहा है।
ब्राज़ील का तेल इसलिए भी आकर्षक माना जा रहा है क्योंकि यह “मीडियम स्वीट क्रूड” श्रेणी का तेल है। आसान शब्दों में कहें तो इसमें सल्फर कम होता है और इसे डीजल, पेट्रोल और जेट फ्यूल में बदलना अपेाकृत आसान होता है। भारत और चीन की कई रिफाइनरियां इसी तरह के तेल के लिए डिजाइन की गई हैं। इसके मुकाबले वेनेजुएला का तेल काफी भारी और ज्यादा सल्फर वाला माना जाता है, जिसे प्रोसेस करना महंगा पड़ता है।
ब्राज़ील की सरकारी तेल कंपनी Petrobras ने भी अब अपना बड़ा फोकस एशिया की तरफ कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उसकी 60 प्रतिशत से ज्यादा तेल सप्लाई अब चीन जा रही है। वहीं अमेरिका को होने वाला निर्यात लगभग शून्य तक पहुंच गया है। इसका सीधा फायदा ब्राज़ील की अर्थव्यवस्था को भी मिल रहा है। बढ़ती तेल कीमतों और निर्यात के कारण देश की आय और विदेशी मुद्रा भंडार में तेजी से इजाफा हो रहा है।
भारत के लिए भी यह बदलाव बेहद अहम माना जा रहा है। देश में पेट्रोल-डीजल की मांग लगातार बढ़ रही है और सरकार लंबे समय से तेल सप्लाई के लिए नए विकल्प तलाश रही है। रूस पर प्रतिबंध और पश्चिम एशिया संकट के बीच ब्राज़ील भारत के लिए एक “सुरक्षित तेल पार्टनर” बनकर सामने आ रहा है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ब्राज़ील पूरी तरह खाड़ी देशों की जगह नहीं ले सकता। सबसे बड़ी समस्या दूरी है। ब्राज़ील से चीन या भारत तक तेल पहुंचने में करीब 45 से 50 दिन लग जाते हैं, जबकि खाड़ी देशों से यह सफर काफी छोटा होता है। इससे शिपिंग लागत बढ़ जाती है और सप्लाई धीमी पड़ सकती है।
इसके बावजूद मौजूदा वैश्विक हालात में ब्राज़ील की अहमियत तेजी से बढ़ रही है। राष्ट्रपति Lula da Silva की सरकार इसे आर्थिक और कूटनीतिक मौके के रूप में देख रही है। ब्राज़ील अब खुद को सिर्फ लैटिन अमेरिका की ताकत नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
दुनिया में युद्ध, प्रतिबंध और ऊर्जा संकट के इस दौर में एक बात साफ दिखाई दे रही है — तेल की राजनीति अब सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रही। ब्राज़ील जैसे देश अब नए ऊर्जा केंद्र बनते जा रहे हैं, और आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।




