राष्ट्रीय/ अर्थव्यवस्था/ व्यापार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अक्टूबर 2026
भारत की निवेश नीति पर सुरजीत भल्ला ने उठाए बड़े सवाल
भारत की विदेशी निवेश नीति और Bilateral Investment Treaty (BIT) व्यवस्था को लेकर अर्थशास्त्री सुरजीत एस. भल्ला ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि भारत लंबे समय से यह जानता है कि निवेश और आर्थिक विकास को गति देने के लिए किन नीतिगत सुधारों की जरूरत है, लेकिन सही नीतियों को लागू करने में लगातार देरी होती रही है। उनके मुताबिक, 2016 में अपनाई गई Model BIT और उसके बाद की निवेश नीति भारत के लिए विदेशी पूंजी आकर्षित करने में बाधा बन सकती है।
भल्ला के सवाल का केंद्र केवल विदेशी निवेश नहीं, बल्कि नीति बनाने और उसे लागू करने के बीच का अंतर है। उनका कहना है कि भारत के सामने घरेलू deregulation, नई Model BIT और बड़े व्यापार समझौतों जैसे कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर निर्णय लेने के लिए किसी बाहरी देश की अनुमति की जरूरत नहीं है। फिर भी इन क्षेत्रों में सुधार की गति धीमी क्यों है, यह बड़ा आर्थिक सवाल है।
2016 की Model BIT बनी बहस का केंद्र
भारत ने 2016 में अपनी Model Bilateral Investment Treaty अपनाई थी। इसका उद्देश्य विदेशी निवेशकों के अधिकारों और सरकार के नियामकीय अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के साथ-साथ निवेश विवादों से जुड़े जोखिम को नियंत्रित करना था। लेकिन बाद के कई कानूनी और आर्थिक अध्ययनों में इस मॉडल की आलोचना हुई।
विशेषज्ञ अध्ययनों में कहा गया कि इस मॉडल में निवेश की परिभाषा अपेक्षाकृत संकीर्ण है, Most-Favoured-Nation यानी MFN प्रावधान शामिल नहीं है और अंतरराष्ट्रीय arbitration तक पहुंचने से पहले स्थानीय कानूनी उपायों को पूरा करने जैसी शर्तें निवेशकों के लिए कठिनाई पैदा कर सकती हैं। कुछ अध्ययनों ने यह भी कहा कि सरकार और निवेशक के अधिकारों के बीच संतुलन पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया।
यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें सुरजीत भल्ला मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत पर जोर देते हैं।
विदेशी निवेशक को अंतरराष्ट्रीय arbitration तक पहुंच में लंबा इंतजार
भारत की पुरानी निवेश नीति में सबसे महत्वपूर्ण विवादों में से एक Investor-State Dispute Settlement (ISDS) से जुड़ा है। सामान्य तौर पर BIT विदेशी निवेशक को यह सुरक्षा देता है कि यदि मेजबान देश की सरकारी कार्रवाई से उसके निवेश के अधिकार प्रभावित होते हैं तो कुछ परिस्थितियों में वह अंतरराष्ट्रीय arbitration का रास्ता अपना सकता है।
भारत की 2016 Model BIT में अंतरराष्ट्रीय arbitration से पहले स्थानीय न्यायिक उपायों को आजमाने की शर्त रखी गई थी। आलोचकों का कहना रहा है कि भारत जैसे बड़े और लंबित मुकदमों वाले न्यायिक तंत्र में लंबी स्थानीय प्रक्रिया निवेशकों के लिए अतिरिक्त जोखिम और लागत पैदा कर सकती है।
UAE और Israel के साथ व्यवस्था में बदलाव
हालांकि भारत ने बाद के वर्षों में अपनी निवेश संधियों में कुछ बदलाव किए हैं। भारत-UAE BIT पर 13 फरवरी 2024 को हस्ताक्षर हुए और यह 31 अगस्त 2024 से लागू हुआ। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जून 2024 तक भारत में UAE का संचयी निवेश करीब 19 अरब डॉलर था और UAE भारत में कुल FDI का लगभग 3% हिस्सा रखता था।
इस संधि में निवेशक को अंतरराष्ट्रीय arbitration से पहले तीन वर्ष तक स्थानीय उपाय अपनाने की शर्त रखी गई। इसके साथ ही संधि में taxation, government procurement, subsidies और कुछ अन्य क्षेत्रों को दायरे से बाहर रखने तथा सरकार के regulatory अधिकार को सुरक्षित रखने के प्रावधान भी हैं।
इसके बाद भारत-इजरायल Bilateral Investment Agreement पर सितंबर 2025 में हस्ताक्षर हुए और यह 4 जुलाई 2026 से लागू हुआ। सरकार ने इसे निवेशकों को मजबूत सुरक्षा देने और साथ ही सरकार की legitimate public-policy space को बनाए रखने वाला समझौता बताया है।
फिर भी सवाल—तीन साल क्यों?
सुरजीत भल्ला की आपत्ति का एक अहम हिस्सा इसी अवधि को लेकर है। उनका तर्क है कि तीन साल की local-remedy requirement भी अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में लंबी हो सकती है और भारत को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसी अवधि तय करने के पीछे आर्थिक और कानूनी तर्क क्या है।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि निवेशक किसी देश में पूंजी लगाने से पहले केवल बाजार का आकार नहीं देखता। वह यह भी देखता है कि यदि सरकार और निवेशक के बीच विवाद हो जाए तो विवाद का समाधान कितनी जल्दी, कितनी निष्पक्षता और कितनी निश्चितता के साथ हो सकता है।
भारत को निवेश चाहिए, लेकिन निवेश सुरक्षा भी जरूरी
भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और विशाल घरेलू बाजार, युवा आबादी तथा तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारण विदेशी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण बाजार है। लेकिन बड़े बाजार का होना अपने आप में पर्याप्त नहीं है।
निवेशक के लिए नीतिगत स्थिरता, कर व्यवस्था, नियामकीय स्पष्टता, अनुबंधों का पालन, न्यायिक प्रक्रिया और विवाद समाधान भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। हालिया अमेरिकी सरकारी आकलन में भी भारत में विदेशी निवेश के सामने regulatory challenges, economic nationalism और corruption से जुड़ी चिंताओं का उल्लेख किया गया है, हालांकि RBI के आंकड़ों में जुलाई 2026 में net FDI inflow बढ़कर 7.35 अरब डॉलर के पांच साल के उच्च स्तर पर पहुंचा।
इसलिए निवेश नीति को लेकर तस्वीर एकतरफा नहीं है। भारत में विदेशी निवेश आ रहा है, लेकिन बहस इस बात पर है कि बेहतर नीतिगत वातावरण के जरिए इससे कहीं अधिक निवेश आकर्षित किया जा सकता है या नहीं।
नई Model BIT की जरूरत पर सरकार भी काम कर रही है
यह भी महत्वपूर्ण है कि Model BIT में बदलाव की चर्चा केवल आलोचकों तक सीमित नहीं है। सरकार ने पहले ही मौजूदा Model BIT को बदलने के लिए संशोधित मॉडल तैयार करने की दिशा में कदम उठाए हैं। हाल की रिपोर्टों के मुताबिक नया मॉडल Australia, Canada और भविष्य में UK तथा European Union जैसे साझेदारों के साथ निवेश समझौतों के लिए आधार बन सकता है।
सरकार की मौजूदा सोच में निवेशक सुरक्षा और सरकार के regulatory अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर है। वित्त मंत्रालय ने भी अलग-अलग नए निवेश समझौतों में इस संतुलन को महत्वपूर्ण बताया है।
यानी असली बहस यह नहीं है कि निवेशकों को सुरक्षा दी जाए या सरकार को नियमन का अधिकार मिले। सवाल यह है कि दोनों के बीच ऐसा संतुलन कैसे बनाया जाए जिससे भारत निवेश के लिए आकर्षक भी रहे और सरकार की नीतिगत स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे।
भारत की पुरानी BIT व्यवस्था का बड़ा असर
भारत ने पिछले वर्षों में कई पुराने BIT समाप्त किए या उनकी जगह नई व्यवस्था बनाने की कोशिश की। अंतरराष्ट्रीय निवेश समझौतों के आंकड़ों में भारत के कई पुराने BIT समाप्त दिखते हैं, जबकि UAE और Israel जैसे नए समझौते अब लागू हैं।
इस बदलाव का मतलब है कि भारत अपनी निवेश संधि व्यवस्था को धीरे-धीरे पुनर्गठित कर रहा है। लेकिन आलोचना यही है कि यह प्रक्रिया जितनी तेज और स्पष्ट होनी चाहिए थी, उतनी नहीं हुई।
सवाल ‘Deep State’ पर भी, लेकिन आरोप का आधार अलग रखना जरूरी
सुरजीत भल्ला ने अपनी टिप्पणी में भारत की आर्थिक नीति में लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक जड़ता को राजनीतिक सरकारों से आगे की समस्या बताते हुए “Deep State” शब्द का इस्तेमाल किया है। यह उनका विश्लेषण और आरोप है, स्थापित तथ्य नहीं।
उनका तर्क है कि अलग-अलग राजनीतिक सरकारें आने के बावजूद कई नीतिगत समस्याएं बनी रहती हैं। इसलिए केवल राजनीतिक नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराने के बजाय उन संस्थागत और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को भी देखना चाहिए जो नीति को लागू करने की गति निर्धारित करती हैं।
असली आर्थिक सवाल—भारत कितना निवेश खो रहा है?
भारत के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि बेहतर निवेश समझौते, सरल घरेलू नियम और अधिक निश्चित विवाद समाधान व्यवस्था बनाई जाए तो क्या विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ सकता है?
किसी एक नीति को भारत के संभावित निवेश नुकसान का अकेला कारण मानना आर्थिक रूप से उचित नहीं होगा। विदेशी निवेश पर वैश्विक ब्याज दरें, भू-राजनीति, बाजार की मांग, विनिमय दर, कर नीति, श्रम लागत और बुनियादी ढांचा समेत अनेक कारक असर डालते हैं। लेकिन BIT जैसी व्यवस्था निवेशकों के जोखिम आकलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इसीलिए सुरजीत भल्ला की बहस का मूल प्रश्न सरकार के सामने बना हुआ है—जब भारत को विदेशी पूंजी, निजी निवेश और वैश्विक कंपनियों की जरूरत है, तो निवेश नीति को अधिक स्पष्ट, प्रतिस्पर्धी और भरोसेमंद बनाने में देरी क्यों हो?
अब नीति में स्पष्टता और तेजी की जरूरत
भारत के सामने आर्थिक विकास को तेज करने के लिए कई मोर्चे खुले हैं। घरेलू deregulation, विदेशी निवेश नीति, व्यापार समझौते और निवेश विवादों के समाधान का ढांचा इनमें प्रमुख हैं।
2016 Model BIT ने सरकार को निवेशक सुरक्षा और राज्य के regulatory अधिकार के बीच एक नया संतुलन देने की कोशिश की थी। लेकिन लगभग एक दशक बाद अनुभवों ने उस मॉडल की समीक्षा की जरूरत को फिर सामने ला दिया है। UAE और Israel के साथ हुए नए समझौते बताते हैं कि भारत बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जबकि प्रस्तावित नई Model BIT इस प्रक्रिया को और व्यापक बना सकती है। सुरजीत भल्ला का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि भारत के पास आर्थिक सुधारों के लिए विकल्प मौजूद हैं—अब चुनौती यह है कि उन विकल्पों को कितनी तेजी, स्पष्टता और प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है।



