[the_ad id="179"]
Home » National » वोट चोर के खिलाफ मुंबई में CJP का बड़ा मोर्चा, कई बड़ी हस्तियां शामिल; अभिजीत डिपके बोले—“सरकार इतनी निकम्मी कि दो महीने में फिर सड़क पर उतरना पड़ा”

वोट चोर के खिलाफ मुंबई में CJP का बड़ा मोर्चा, कई बड़ी हस्तियां शामिल; अभिजीत डिपके बोले—“सरकार इतनी निकम्मी कि दो महीने में फिर सड़क पर उतरना पड़ा”

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई/दिल्ली | 2 अक्टूबर 2026

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मुंबई के शिवाजी पार्क में शुक्रवार को Cockroach Janta Party (CJP) ने बड़ा ‘जेल भरो’ प्रदर्शन किया। CJP संस्थापक अभिजीत डिपके के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन में पुलिस के अनुसार करीब 4,000 लोग जुटे। प्रदर्शन में डिपके के साथ कई चर्चित चेहरे भी नजर आए, जबकि दिल्ली में भी विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने SIR तथा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ मोर्चा खोला।

प्रदर्शनकारियों के हाथों में चुनावी पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों से जुड़े नारे थे। मांग सीधी थी—ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें और चुनाव प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब दिया जाए।

अभिजीत डिपके का सरकार पर सीधा हमला

मुंबई में CJP नेता अभिजीत डिपके ने सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा, “सरकार इतनी निकम्मी है कि हमें दो महीने में फिर सड़क पर उतरना पड़ रहा है।”

डिपके ने कहा कि आंदोलन मुंबई से शुरू होकर देश के दूसरे हिस्सों तक जाएगा। CJP के मुताबिक आगे गोवा, कोलकाता, बेंगलुरु और रांची जैसे शहरों में प्रदर्शन होंगे और अंततः आंदोलन को दिल्ली के जंतर-मंतर तक ले जाया जाएगा। संगठन ने कहा है कि उसका आंदोलन ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तक जारी रहेगा।

मुंबई को आंदोलन की शुरुआत का केंद्र बनाने के पीछे डिपके ने महाराष्ट्र के चुनावी घटनाक्रम का हवाला दिया। उनका सवाल है कि 2024 के लोकसभा चुनाव और उसके कुछ महीनों बाद हुए विधानसभा चुनाव में महाराष्ट्र के चुनावी परिणामों में इतना बड़ा बदलाव कैसे आया।

चुनाव आयोग के भीतर उठे सवालों ने बढ़ाया दबाव

CJP के आंदोलन को उस रिपोर्ट के बाद और हवा मिली जिसमें चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े फैसलों पर कथित मतभेद सामने आने की बात कही गई।

रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम-से-कम 14 मौकों पर आयोग के नाम से लिए गए कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की थी। इनमें Form 6 में बदलाव और ECINet के केंद्रीकृत नियंत्रण जैसे मुद्दे भी शामिल थे।

यहीं से सवाल और गंभीर हो गया—अगर मतदाता सूची तैयार करने वाली व्यवस्था में ही वरिष्ठ चुनाव आयुक्तों ने आपत्तियां दर्ज कीं, तो उन आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई? किसके पास मतदाता सूची के डेटा और सॉफ्टवेयर का नियंत्रण था? और क्या हर स्तर पर कानून में निर्धारित अधिकारियों को पर्याप्त अधिकार मिले?

ये वे सवाल हैं जिनका जवाब विपक्ष और प्रदर्शनकारी मांग रहे हैं।

हालांकि, इन आरोपों और उनके राजनीतिक निष्कर्षों पर चुनाव आयोग का अपना पक्ष है। इसलिए कथित अनियमितताओं और सिद्ध तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

13 करोड़ नामों का मुद्दा बना आंदोलन का केंद्र

SIR को लेकर सबसे बड़ा विवाद ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से करीब 13 करोड़ नाम हटाए जाने को लेकर है। यह संख्या 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ड्राफ्ट रोल से हटाए गए नामों की है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी 13 करोड़ लोग पात्र मतदाता थे जिन्हें गलत तरीके से हटाया गया।

लेकिन विवाद इसलिए गहरा गया है क्योंकि अब चुनाव आयोग ने खुद उन 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों, जहां SIR पूरा हो चुका है, में ‘left-out’ मतदाताओं को जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने का आदेश दिया है।

राज्य के CEO, जिला निर्वाचन अधिकारी और Electoral Registration Officers को ऐसे लोगों की पहचान करने और उन्हें मतदाता सूची में वापस शामिल करने की प्रक्रिया आसान बनाने को कहा गया है। पात्र मतदाता इसके लिए सामान्य Form 6 के जरिए आवेदन कर सकते हैं।

BLO घर-घर जाएंगे, पुराने और नए रोल का मिलान होगा

निर्वाचन अधिकारियों को SIR से पहले और बाद की मतदाता सूचियों की तुलना करने और यह पहचानने के लिए कहा गया है कि किन लोगों के नाम हटे हैं और उनमें कौन पात्र मतदाता हो सकते हैं।

कुछ मामलों में Booth Level Officers (BLOs) को घर जाकर दस्तावेज जुटाने और पात्र लोगों को Form 6 भरने में मदद करने के निर्देश दिए गए हैं। चुनाव अधिकारियों से राजनीतिक दलों और उनके बूथ स्तर के प्रतिनिधियों की सहायता लेने को भी कहा गया है।

यानी जिस SIR को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा था, उसके बाद अब आयोग को खुद यह सुनिश्चित करने के लिए विशेष अभियान चलाना पड़ रहा है कि कोई पात्र मतदाता सूची से बाहर न रह जाए।

दिल्ली में भी गरजा विरोध

मुंबई के साथ दिल्ली का जंतर-मंतर भी शुक्रवार को राजनीतिक टकराव का केंद्र बना। दिल्ली पुलिस ने 500 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, जिनमें AAP नेता आतिशी, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज, संजीव झा और अनुराग ढांडा शामिल थे। वाम दलों और छात्र संगठनों के कई कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई।

RJD नेता मनोज झा, CPI(M) नेता बृंदा करात, CPI नेता पी. संदोश कुमार, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और निखिल डे भी प्रदर्शन में शामिल हुए।

दिल्ली में प्रदर्शनकारियों ने SIR पर रोक और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाई।

ममता बनर्जी का भी हमला

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उनके तत्काल हटाए जाने की मांग की। उन्होंने SIR के दौरान मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर गंभीर आरोप लगाए।

ममता के आरोप राजनीतिक दावे हैं और उनके तथ्यात्मक निष्कर्ष के लिए आधिकारिक चुनावी रिकॉर्ड तथा संबंधित जांच को आधार बनाना होगा।

महाराष्ट्र में भी सावधानी के निर्देश

इस बीच महाराष्ट्र में SIR अभी जारी है। चुनाव आयोग के निर्देशों के बाद अधिकारियों को स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी मतदाता का नाम जल्दबाजी में न हटाया जाए। पर्याप्त अवसर, दस्तावेजों की जांच और आवश्यक प्रक्रिया के बाद ही निर्णय लेने की बात कही गई है। महाराष्ट्र के ड्राफ्ट रोल में 1.22 करोड़ रिकॉर्ड सत्यापन के लिए चिन्हित किए गए हैं—इनमें 62.48 लाख मामलों में रिश्तेदारों के विवरण से जुड़ी विसंगतियां और 59.75 लाख मामले ऐसे बताए गए हैं जिन्हें पिछली सूची में किसी रिश्तेदार से मैप नहीं किया जा सका।

मुंबई से दिल्ली तक बढ़ता टकराव

गांधी जयंती के दिन मुंबई और दिल्ली में हुए प्रदर्शन ने चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर चल रही बहस को और तीखा कर दिया है।

CJP ने इसे केवल एक दिन का प्रदर्शन नहीं बताया है। अभिजीत डिपके का कहना है कि आंदोलन मुंबई से निकलकर देश के अलग-अलग हिस्सों में जाएगा और अंततः जंतर-मंतर पहुंचेगा।

अब बहस केवल इस बात पर नहीं है कि कितने नाम मतदाता सूची से हटे। असली सवाल यह है कि कौन-सा नाम क्यों हटाया गया, किस अधिकारी के पास उसे हटाने का अधिकार था, सॉफ्टवेयर पर किसका नियंत्रण था और अगर कोई पात्र नागरिक बाहर रह गया तो उसे वापस लाने की जिम्मेदारी किसकी है।

मुंबई का CJP प्रदर्शन इसी जवाबदेही की लड़ाई का अगला बड़ा पड़ाव बन गया है। और सड़क पर उठ रहा सवाल साफ है—वोटर की पहचान और वोट का अधिकार किसी भी राजनीतिक बहस से ऊपर है; मतदाता सूची में एक भी पात्र नागरिक के अधिकार पर सवाल उठे तो उसका जवाब रिकॉर्ड और पारदर्शिता के साथ देना होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *