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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कानून के छात्रों को सजा देने का BCI को अधिकार नहीं

नालसार के छात्रों के मामले में शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणी; कोर्ट ने कहा—छात्रों पर कार्रवाई का अधिकार उनकी यूनिवर्सिटी के पास

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 सितंबर 2026

बीसीआई कानून के छात्रों को दंड नहीं दे सकता

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कानून के छात्रों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में साफ कर दिया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी बीसीआई के पास कानून के छात्रों को सजा देने या उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने कहा कि कानून के छात्रों पर कार्रवाई करने का अधिकार उस विश्वविद्यालय के पास है, जहां वे पढ़ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी नालसार कानून विश्वविद्यालय के छात्रों से जुड़े मामले में आई, जहां छात्रों ने अपने दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश को मुख्य अतिथि बनाए जाने के फैसले का विरोध किया था।

छात्रों ने विरोध किया तो बीसीआई ने भेजे थे पत्र

मामला तब गंभीर हो गया जब नालसार के कुछ छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश को मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया। इसके बाद बीसीआई की ओर से विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्रों के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए पत्र भेजे गए थे। राज्य बार काउंसिलों को भी ऐसे छात्रों का पेशेवर पंजीकरण रोकने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी कदम पर बीसीआई के अधिकार क्षेत्र को लेकर सवाल उठाया और स्पष्ट किया कि नियामक संस्था होने का मतलब यह नहीं है कि वह कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों को अपनी ओर से सजा दे सकती है।

विरोध करना छात्रों का संवैधानिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के विरोध के अधिकार को भी महत्वपूर्ण माना। लोकतंत्र में किसी फैसले से सहमत होना जरूरी नहीं है। अगर कोई छात्र शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखता है या किसी फैसले का विरोध करता है तो केवल असहमति के कारण उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती। इसी संदर्भ में अदालत ने बीसीआई के कदम को लेकर सख्त रुख अपनाया। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कानून के छात्र आगे चलकर न्याय व्यवस्था और संविधान से जुड़े पेशे में प्रवेश करते हैं।

बीसीआई ने अपने पुराने पत्र वापस ले लिए थे

मामले की सुनवाई के दौरान बीसीआई ने अपने पहले भेजे गए पत्र वापस ले लिए थे। 13 अगस्त को नालसार प्रशासन से छात्रों के खिलाफ जांच करने और राज्य बार काउंसिलों से उनके पेशेवर पंजीकरण को रोकने को कहा गया था। बाद में बीसीआई ने इन पत्रों को वापस ले लिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसके बावजूद यह स्पष्ट करना जरूरी समझा कि भविष्य में बीसीआई अपनी शक्तियों की सीमा से बाहर जाकर कानून के छात्रों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं कर सकता।

विश्वविद्यालय और बीसीआई की जिम्मेदारी अलग-अलग

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे आसान मतलब यह है कि कानून की पढ़ाई कर रहे छात्र और कानून की प्रैक्टिस कर रहे वकील एक ही श्रेणी में नहीं आते। बीसीआई का काम वकीलों और कानूनी पेशे से जुड़े नियमन से है, लेकिन किसी विश्वविद्यालय में पढ़ रहे छात्र के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार उस शैक्षणिक संस्था के नियमों के अनुसार तय होगा। अगर कोई छात्र विश्वविद्यालय के नियम तोड़ता है तो विश्वविद्यालय अपने नियमों के तहत कार्रवाई कर सकता है, लेकिन बीसीआई अपनी ओर से उसे दंडित नहीं कर सकता।

फैसले का व्यापक संदेश

यह फैसला केवल नालसार के छात्रों तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसका बड़ा संदेश यह है कि किसी भी नियामक संस्था को अपनी कानूनी सीमा के भीतर ही काम करना होगा। छात्र अगर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखते हैं तो केवल उनकी असहमति के कारण उनके भविष्य पर असर डालने वाली कार्रवाई नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बीसीआई के अधिकार की सीमा स्पष्ट करके यह भी संदेश दिया है कि संस्था की ताकत चाहे कितनी भी बड़ी हो, वह कानून से ऊपर नहीं हो सकती।

छात्रों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

कानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उनके विरोध और अपनी बात रखने के अधिकार को लेकर एक स्पष्ट कानूनी संदेश सामने आया है। विश्वविद्यालय के किसी फैसले या किसी व्यक्ति को लेकर असहमति जताना अपने आप में ऐसा आधार नहीं बन सकता, जिसके कारण कोई बाहरी नियामक संस्था छात्र के करियर पर कार्रवाई करने लगे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसके पास किसके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है, इसकी भी एक कानूनी सीमा होती है।

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