राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 अक्टूबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, उनकी बेटी वीणा टी और अन्य लोगों से जुड़े CMRL-Exalogic मामले में आगे की जांच पर सात दिनों के लिए रोक लगा दी है। साथ ही, अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को स्पष्ट संदेश दिया कि वह अपने कानूनी अधिकारों की सीमा में रहकर काम करे और दूसरी जांच एजेंसियों के वैधानिक अधिकारों में दखल न दे।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने दशहरा अवकाश के दौरान विशेष सुनवाई करते हुए विजयन और अन्य याचिकाकर्ताओं को केरल हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील करने की अनुमति दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की खंडपीठ के 15 अक्टूबर के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया, जिसमें उनकी अपील खारिज कर दी गई थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि FIR दर्ज करने पर रोक नहीं लगाई गई है। केवल उसके आधार पर आगे की जांच सात दिनों के लिए स्थगित की गई है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका अंतरिम आदेश हाई कोर्ट द्वारा आगे दी जाने वाली राहत पर कोई अंतिम राय नहीं है।
ED को अदालत की दोटूक नसीहत
सुनवाई के दौरान ED ने हाई कोर्ट के आदेश का बचाव किया। इस पर जस्टिस बागची ने एजेंसी को उसकी वैधानिक सीमाओं की याद दिलाई।
अदालत ने कहा कि ED ने अपने अधिकार क्षेत्र के तहत जो काम करना था, वह कर चुकी है। यदि किसी अनुसूचित अपराध का मामला बनता है, तो एजेंसी शिकायत दर्ज कर अभियोजन की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है। लेकिन उसे अपने अधिकारों से आगे बढ़कर दूसरी जांच एजेंसियों की वैधानिक शक्तियों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
पीठ ने कहा, “आप (ED) ने अपना वैधानिक कर्तव्य निभाया है। अब राज्य को अपना वैधानिक कर्तव्य निभाना है। अपने अधिकारों की सीमा से आगे मत बढ़िए और दूसरी जांच एजेंसियों की शक्तियों में दखल मत दीजिए।”
अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब मामले में ED की ओर से दी गई जानकारी के आधार पर केरल पुलिस द्वारा FIR दर्ज किए जाने और जांच शुरू करने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
क्या है CMRL-Exalogic मामला?
इस मामले में आरोप है कि केरल की सरकारी कंपनी कोचीन मिनरल्स एंड रूटाइल लिमिटेड (CMRL) ने वर्ष 2017 से 2020 के बीच Exalogic Solutions Pvt Ltd को 2.78 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया, जबकि आरोप के मुताबिक, इसके बदले कोई सेवा नहीं दी गई।
Exalogic कंपनी पिनराई विजयन की बेटी वीणा टी के पूर्ण स्वामित्व में है। जनवरी 2017 में CMRL ने वीणा को आईटी और मार्केटिंग सलाहकार के रूप में रिटेनरशिप आधार पर नियुक्त किया था। बाद में कर आकलन से जुड़े दस्तावेजों में ऐसे अतिरिक्त भुगतानों का उल्लेख सामने आया, जिनके बदले सेवाएं दिए जाने का रिकॉर्ड नहीं होने का आरोप लगाया गया।
ये आरोप जांच और न्यायिक प्रक्रिया के विषय हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश को आरोपों की पुष्टि या आरोपियों को दोषमुक्त किए जाने के रूप में नहीं देखा जा सकता।
FIR और जांच की प्रक्रिया पर भी सवाल
केरल हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 9 अक्टूबर को मामले में FIR दर्ज करने और जांच करने का निर्देश दिया था। राज्य में 12 अक्टूबर को FIR दर्ज की गई और जांच आगे बढ़ने लगी। बाद में हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 15 अक्टूबर को इस आदेश के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी।
विजयन के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि उनके मुवक्किल को FIR और जांच के निर्देश देने से पहले अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिला। उन्होंने यह भी कहा कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद उनके पास प्रभावी कानूनी राहत का रास्ता सीमित हो गया था।
विजयन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा और एन. हरिहरन पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि नई FIR दर्ज होने के बाद ED ने भी इसी आरोप-समूह के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग से संबंधित नई ECIR दर्ज की है। विजयन को 23 अक्टूबर को पूछताछ के लिए ED के सामने पेश होने का समन भी दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने ED की इस कार्यवाही पर कोई रोक नहीं लगाई। अदालत ने कहा कि नई ECIR की वैधता पर वह फिलहाल कोई राय नहीं दे रही है और याचिकाकर्ता इस मुद्दे को अलग कार्यवाही में चुनौती दे सकते हैं।
भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 17A का मुद्दा
सुनवाई के दौरान अदालत ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत मिलने वाली सुरक्षा पर भी ध्यान दिया। इस प्रावधान के तहत कुछ परिस्थितियों में किसी लोक सेवक के आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े आरोपों की जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी जरूरी होती है।
पीठ ने सवाल उठाया कि ED की ओर से राज्य को भेजी गई सूचना क्या अपने आप FIR दर्ज करने और जांच आगे बढ़ाने का अनिवार्य आधार बन जाती है। अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट की खंडपीठ को इस पहलू पर कानून और तथ्यों के आधार पर विचार करना चाहिए।
केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ स्थायी अधिवक्ता रमेश बाबू ने दलील दी कि ED की सूचना से संज्ञेय अपराध का मामला सामने आया था। वहीं, विजयन के पक्ष ने जांच शुरू करने की प्रक्रिया और पूर्व अनुमति से जुड़े कानूनी सवाल उठाए।
अदालत ने इन सवालों पर अंतिम निर्णय नहीं दिया, बल्कि संबंधित पक्षों को हाई कोर्ट में अपनी अपील और अंतरिम राहत की मांग आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।
क्या आरोपियों को FIR से पहले सुनवाई का अधिकार है?
मामले में याचिकाकर्ताओं ने अधिवक्ता के. एम. शाहजहां की याचिका पर भी सवाल उठाए। शाहजहां ने राज्य सरकार से पूर्व मुख्यमंत्री और अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की थी। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया।
विजयन के पक्ष ने दलील दी कि राज्य पहले ही ED से मिली सूचना के आधार पर प्रारंभिक जांच के लिए नौ सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) बना चुका था। ऐसे में FIR दर्ज करने और जांच के निर्देश देने से पहले संबंधित पक्षों को सुना जाना चाहिए था।
दूसरी ओर, शाहजहां की ओर से कहा गया कि FIR दर्ज करने से पहले संभावित आरोपियों को सुनना कानून की अनिवार्य शर्त नहीं है। सुनवाई में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(4) का भी उल्लेख हुआ, जिसमें लोक सेवक के आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित शिकायत पर जांच का आदेश देने से पहले सुनवाई से जुड़ा प्रावधान है।
ED की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जोहेब हुसैन ने कहा कि यह सुरक्षा केवल आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े कार्यों पर लागू होती है। अदालत ने कहा कि इस मामले में आरोपित गतिविधियां उस दायरे में आती हैं या नहीं, यह तथ्यों और कानून के आधार पर तय किया जाना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या राहत दी और क्या नहीं?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दायरा सीमित है। अदालत ने FIR को रद्द नहीं किया है और न ही आरोपों के गुण-दोष पर कोई अंतिम फैसला दिया है। उसने केवल आगे की जांच सात दिनों के लिए रोकी है, ताकि याचिकाकर्ता हाई कोर्ट में अपनी अपील और अंतरिम राहत की मांग पर सुनवाई करा सकें।
ED की नई ECIR और उससे जुड़ी कार्यवाही भी फिलहाल जारी रह सकती है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक नहीं लगाई। अदालत ने गिरफ्तारी से सुरक्षा की मांग सहित अन्य राहतों के लिए याचिकाकर्ताओं को हाई कोर्ट जाने का निर्देश दिया।
विजयन ने अपनी याचिका में आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि मामले में न तो कोई मांग या स्वीकारोक्ति हुई, न कोई आधिकारिक कार्यवाही या धन के लेन-देन की ऐसी कड़ी सामने आई जो आरोपों को साबित करे। उनका दावा है कि उनकी बेटी से पारिवारिक संबंध ही उन्हें इस मामले से जोड़ने का आधार बनाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित आरोपों को 2025 में केरल हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहले खारिज कर चुके हैं। इन दावों और वर्तमान आरोपों का कानूनी मूल्यांकन संबंधित न्यायिक कार्यवाही में होना बाकी है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का संदेश स्पष्ट है: जांच एजेंसियों को कानून के दायरे में रहकर काम करना होगा और एक एजेंसी दूसरी एजेंसी के वैधानिक अधिकारों का स्थान नहीं ले सकती। लेकिन CMRL-Exalogic मामले में आरोपों की सच्चाई, FIR की प्रक्रिया और ED की कार्यवाही की वैधता पर अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।



