राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 जुलाई 2026
लद्दाख के पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक इन दिनों अपने 18वें दिन के अनशन को लेकर सुर्खियों में हैं, लेकिन उनकी रणनीति अब धीरे-धीरे नंगी होती जा रही है। एक तरफ वे अपने आंदोलन को लगातार “अराजनीतिक” बताते हुए खुद को तटस्थ बुद्धिजीवी के रूप में पेश कर रहे हैं, विपक्षी नेताओं को मंच से दूर रखने की वकालत कर रहे हैं और छात्र-समाज को केंद्र में रखने का नाटक रच रहे हैं। दूसरी तरफ, जब मंच सूना पड़ गया तो खुद ही राजनीतिक नेताओं की उम्मीद जताते हुए बयान दे रहे हैं — “राहुल गांधी आएंगे, नहीं आए तो उनका छोटापन होगा।”
यह कैसा विरोधाभास है? जब आंदोलन “अराजनीतिक” था, तब राजनीति से दूरी बनाए रखने का इतना स्वांग क्यों रचा गया? और अब जब अकेले लड़ने की कीमत चुकानी पड़ रही है, तो उसी राजनीति के द्वार पर हाथ क्यों फैलाए जा रहे हैं?
दोहरी नीति का खेल
सोनम वांगचुक साफ तौर पर दोहरी नीति अपना रहे हैं। खुद को तटस्थ बुद्धिजीवी का चोला पहनाकर नई पीढ़ी को भी यही सबक दे रहे हैं कि दोनों तरफ से सबको निशाना बनाओ, लेकिन जब जरूरत पड़े तो उसी सिस्टम से समर्थन मांग लो।
पॉलिटिकल पार्टी जनता का माध्यम होती है, न कि गाली देने और फिर उसी से मदद मांगने का साधन। अगर मुद्दे पर अडिग थे, तो जो पार्टी मुद्दे पर खड़ी दिखती हो, उसके साथ खड़े होते। लेकिन “तटस्थ बुद्धिजीवी” बनकर न स्टैंड स्पष्ट करते हैं, न अपनी राजनीतिक पसंद बताते हैं। भक्तों पर स्टैंड बदलने का आरोप लगाने वाले खुद स्टैंड छिपाने और पार्टी बदलने का खेल खेल रहे हैं।
आंदोलन स्वयं एक राजनीतिक कृत्य है। इसे बिना किसी पार्टी के समन्वय के लड़ने का दावा करते हुए उन्होंने “अकेले लड़ेंगे” का बड़ा बड़प्पन दिखाया। अब जब अकेले लड़ने की सीमा सामने आ रही है, तो रील्स, लाइक्स और सोशल मीडिया सपोर्ट पर निर्भर रहते हुए विपक्ष से अपील कर रहे हैं।
अनशन शुरू करने से पहले क्या सत्ता की निष्ठुरता, मीडिया की भूमिका और सरकारी नीति का आकलन नहीं किया गया था? अगर पता था, तो अनशन क्यों? और अगर पता नहीं था, तो इतनी बड़ी लड़ाई शुरू करने का आधार क्या था?
समाज को दोष देना आसान, संगठन कठिन
समाज को “मरा हुआ” बताने वाले सोनम वांगचुक को इतिहास याद रखना चाहिए। चंपारण सत्याग्रह या नील की खेती जैसी लड़ाइयाँ एक रात में या सोशल मीडिया पर वायरल होने से नहीं जीती गईं। उनमें घर-घर जाकर लोगों को जागृत करने की मेहनत की गई थी।
सत्ता जन्म से ही संगठित और निष्ठुर होती है। उसके खिलाफ लड़ाई में चुम्बकत्व पैदा करने की रणनीति चाहिए, न कि निरंतर समाज को कोसना। अनशन शुरू करने से पहले अगर इस तैयारी का आकलन नहीं किया गया, तो अब “त्राहि-त्राहि” मचाना और राहुल गांधी पर “छोटापन” का ठप्पा लगाना अपने ही उसूलों से समझौता है।
सुझाव और निष्कर्ष
सोनम वांगचुक की जीवटता और साहस निश्चित रूप से सराहनीय है। लेकिन उनका यह दोहरा चरित्र, ढोंग भरा अराजनीतिक स्वांग और राजनीतिक समर्थन की बेचैनी पूरे अभियान की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है।
– अगर अराजनीतिक रहना था, तो पूरी तरह रहिए। संवेदनशील लोग खुद जुड़ जाते।
– धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर अनशन खत्म करने या नितिन गडकरी-जेपी नड्डा जैसे नेताओं को निमंत्रण देने का अधिकार है, लेकिन “राहुल आएंगे नहीं तो छोटे होंगे” वाली बयानबाजी बंद कीजिए।
– लड़ाई सत्ता से है तो सत्ता से लड़ें, विपक्ष से शिकायत करके आंदोलन को कमजोर न करें।
मुद्दा जितना पवित्र हो, तरीका भी उतना ही पवित्र होना चाहिए। रोना-धोना, दोहरे मापदंड और ढोंग छोड़कर अगर सोनम वांगचुक मूल मुद्दे — लद्दाख की पर्यावरणीय सुरक्षा और जनजातीय अधिकार — पर अडिग रहें, तो समाज स्वतः उनके साथ खड़ा होगा।
अराजनीतिक होने का दावा कर राजनीति की राह तकना — यह न सिर्फ अविश्वसनीय है, बल्कि आंदोलन को दीर्घकालिक नुकसान भी पहुंचाता है।




