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हॉस्टल में सो रही थीं छह छात्राएं, सांप ने डसा; तीन आदिवासी बच्चियों की मौत, NHRC ने लिया संज्ञान

गढ़चिरौली के आदिवासी छात्रावास में फर्श पर सो रही छह छात्राओं को सांप ने डस लिया, जिसमें तीन बच्चियों की मौत हो गई और तीन का इलाज जारी है। घटना पर NHRC ने स्वतः संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है। यह हादसा सिर्फ सांप के डसने की त्रासदी नहीं, बल्कि छात्रावासों में बुनियादी सुविधाओं, सुरक्षा और जवाबदेही पर गंभीर सवाल है। बच्चों को शिक्षा के साथ सुरक्षित आवास देना भी सरकार की जिम्मेदारी है।

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 अगस्त 2026

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने आदिवासी छात्रावासों में बच्चों की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक आवासीय विद्यालय के हॉस्टल में फर्श पर सो रही छह छात्राओं को सांप ने डस लिया, जिनमें से तीन आदिवासी बच्चियों की मौत हो गई। घटना के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्वतः संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है। आयोग ने इस घटना को केवल एक दुखद हादसा मानने के बजाय विद्यार्थियों के मानवाधिकारों और छात्रावास में उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं से जोड़कर देखा है। खास तौर पर यह सवाल सामने आया है कि आखिर छात्राओं को बिस्तर उपलब्ध क्यों नहीं थे और उन्हें फर्श पर सोने की स्थिति में क्यों रहना पड़ा।

घटना 10 अगस्त की सुबह गढ़चिरौली जिले के एक आदिवासी आवासीय विद्यालय के छात्रावास में हुई। बताया गया है कि छात्राएं रात में फर्श पर सो रही थीं, तभी सांप ने उन्हें डस लिया। छह छात्राओं में से तीन की जान चली गई, जबकि तीन अन्य छात्राओं का अस्पताल में इलाज चल रहा है। तीन बच्चियों की मौत ने पूरे इलाके को झकझोर दिया है। जिस उम्र में इन बच्चियों को किताबों, पढ़ाई और अपने भविष्य के सपनों के बीच होना चाहिए था, उसी उम्र में उनकी जिंदगी एक ऐसी घटना ने छीन ली, जिसे बेहतर बुनियादी सुरक्षा और सावधानी से शायद टाला जा सकता था।

इस घटना में सबसे गंभीर सवाल सांप के छात्रावास में पहुंचने से भी आगे का है। अगर छात्राएं पर्याप्त संख्या में खाट या बिस्तर के अभाव में फर्श पर सो रही थीं, तो यह केवल एक आकस्मिक घटना नहीं रह जाती, बल्कि छात्रावास की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करती है। फर्श पर सोने से जहरीले जीव-जंतुओं के संपर्क का खतरा बढ़ सकता है, खासकर ऐसे इलाकों में जहां सांपों की मौजूदगी आम है। NHRC ने भी इसी पहलू को गंभीरता से लेते हुए छात्रावास में उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं और बच्चों के अधिकारों पर चिंता जताई है।

NHRC ने मीडिया रिपोर्टों के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है। आयोग ने गढ़चिरौली में हर वर्ष सामने आने वाले सांप के काटने के मामलों का भी उल्लेख किया है। ऐसे क्षेत्र में आदिवासी आवासीय विद्यालयों और छात्रावासों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पहले से अधिक सतर्कता की जरूरत महसूस होती है। सवाल यह है कि क्या ऐसे छात्रावासों में नियमित रूप से भवन की जांच होती है, क्या जहरीले जीव-जंतुओं से बचाव की पर्याप्त व्यवस्था है, क्या विद्यार्थियों को पर्याप्त बिस्तर उपलब्ध हैं और आपात स्थिति में तत्काल चिकित्सा सहायता पहुंचाने की व्यवस्था कितनी मजबूत है।

इस घटना ने एक और बड़ी सच्चाई सामने रखी है—देश के दूरदराज और आदिवासी इलाकों में शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ सुरक्षित शिक्षा का अधिकार भी उतना ही जरूरी है। किसी बच्चे को स्कूल तक पहुंचा देना पर्याप्त नहीं है। उसके लिए सुरक्षित भवन, स्वच्छ वातावरण, पर्याप्त भोजन, पीने का पानी, बिस्तर, शौचालय, स्वास्थ्य सुविधा और आपातकालीन सहायता जैसी बुनियादी जरूरतें भी सुनिश्चित करनी होंगी। खासकर आवासीय विद्यालयों में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, क्योंकि वहां बच्चे अपने परिवार से दूर सरकारी या संस्थागत व्यवस्था की निगरानी में रहते हैं।

तीन बच्चियों की मौत का दुख केवल उनके परिवारों तक सीमित नहीं है। यह उस व्यवस्था के सामने भी एक कठिन सवाल है जो दूर-दराज के इलाकों में बच्चों को शिक्षा और बेहतर भविष्य देने का दावा करती है। जब किसी छात्रावास में रहने वाली बच्चियों की सुरक्षा के लिए जरूरी बुनियादी इंतजाम ही पर्याप्त नहीं हों, तो शिक्षा की पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। गरीब और आदिवासी परिवार अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा की उम्मीद में ऐसे आवासीय विद्यालयों में भेजते हैं। उनके लिए यह केवल स्कूल नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य का सहारा होता है।

अब NHRC के नोटिस के बाद सरकार के सामने सिर्फ घटना की जांच करना ही पर्याप्त नहीं होगा। यह पता लगाना जरूरी है कि छात्रावास में बिस्तरों की कमी क्यों थी, सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी, सांप छात्रावास तक कैसे पहुंचा, घटना के समय निगरानी और आपातकालीन प्रतिक्रिया कैसी रही और घायल छात्राओं को कितनी जल्दी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई। यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। साथ ही, राज्य के दूसरे आदिवासी और आवासीय विद्यालयों में भी सुरक्षा ऑडिट कराया जाना चाहिए, ताकि किसी दूसरी बच्ची को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े।

गढ़चिरौली की यह घटना एक कड़वा सवाल छोड़ जाती है—क्या हम बच्चों को सिर्फ स्कूल की चारदीवारी तक पहुंचाने को शिक्षा मान सकते हैं, या उनकी सुरक्षित जिंदगी की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है? तीन बच्चियों की मौत का जवाब केवल मुआवजे या जांच रिपोर्ट से पूरा नहीं होगा। असली जवाब तब मिलेगा जब ऐसे छात्रावासों में बुनियादी सुविधाएं, सुरक्षा और जवाबदेही जमीन पर दिखाई देगी। क्योंकि किसी भी बच्चे के लिए शिक्षा का सपना तभी सार्थक है, जब वह सुरक्षित होकर स्कूल जाए और सुरक्षित ही अपने घर लौटे।

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