राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 अगस्त 2026
अमेरिका और चीन के बीच चल रही व्यापारिक तनातनी की आंच एक बार फिर भारत तक पहुंचती दिख रही है। व्हाइट हाउस की नई रिपोर्ट ‘द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम’ में भारत समेत 40 से अधिक देशों को ऐसे देशों की सूची में रखा गया है, जहां से चीन कथित तौर पर अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए अपने सामान को दूसरे रास्ते से अमेरिकी बाजार तक पहुंचा रहा है। अमेरिकी आरोपों में भारत के पुणे-गुजरात-चेन्नई औद्योगिक बेल्ट का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट का दावा है कि कुछ देशों के जरिए चीन से आने वाले सामान की वास्तविक उत्पत्ति छिपाकर या उसकी पैकेजिंग और कागजी दस्तावेज बदलकर कम शुल्क वाले रास्ते का इस्तेमाल किया गया। अमेरिका इसे केवल व्यापारिक चाल नहीं, बल्कि अपने उद्योग, रोजगार और राजस्व को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधि के रूप में देख रहा है।
व्हाइट हाउस के अनुसार, दुनिया के 40 से अधिक देश ऐसे क्षेत्रों के रूप में सामने आए हैं जहां ‘अवैध ट्रांसशिपमेंट का जोखिम’ अधिक है। अमेरिका का आरोप है कि चीन ने तीसरे देशों को रास्ते के रूप में इस्तेमाल करते हुए अपने उत्पादों को अमेरिकी बाजार तक पहुंचाया और इस तरह सीधे चीनी आयात पर लगाए गए ऊंचे शुल्क से बचने की कोशिश की। अमेरिकी व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने इसे अमेरिकी नौकरियों और अरबों डॉलर के राजस्व को नुकसान पहुंचाने वाला बताया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने कुछ मामलों में सामान को तीसरे देश में भेजकर दोबारा पैक किया या दस्तावेजों के जरिए उसकी वास्तविक उत्पत्ति छिपाई। अमेरिका ने इस पूरी प्रक्रिया को बेहद गंभीर शब्दों में ‘कागजी कार्रवाई में छिपी धोखाधड़ी’ करार दिया है।
भारत के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आरोप ऐसे समय आया है जब भारत-अमेरिका व्यापार संबंध पहले ही कई संवेदनशील मुद्दों से गुजर रहे हैं। अमेरिकी रिपोर्ट में भारत के साथ कनाडा, मैक्सिको, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों का भी नाम लिया गया है। इसका मतलब यह है कि अमेरिकी चिंता केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक सप्लाई चेन के उन हिस्सों की जांच कर रहा है जहां चीन से आने वाले सामान किसी तीसरे देश में पहुंचकर अमेरिकी बाजार में प्रवेश कर सकते हैं। हालांकि, किसी देश का सूची में होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसकी सरकार ने जानबूझकर चीन को अमेरिकी शुल्क से बचने में मदद की है। असली सवाल यह होगा कि किन कंपनियों, उत्पादों और व्यापारिक मार्गों पर अमेरिका ने ठोस आपत्तियां दर्ज की हैं।
भारत के लिए पुणे-गुजरात-चेन्नई बेल्ट का उल्लेख विशेष रूप से अहम है। यह क्षेत्र देश के महत्वपूर्ण औद्योगिक और विनिर्माण नेटवर्क का हिस्सा है, जहां ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग, मशीनरी और अन्य उद्योगों से जुड़ी बड़ी सप्लाई चेन मौजूद हैं। चीन के साथ भारत का व्यापक व्यापारिक जुड़ाव भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में यदि अमेरिकी एजेंसियां भारतीय कंपनियों और बंदरगाहों के जरिए आने-जाने वाले सामान की जांच और कड़ी करती हैं, तो भारतीय निर्यातकों और निर्माताओं के लिए कागजी दस्तावेज, मूल देश की पुष्टि और सप्लाई चेन की पारदर्शिता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।
इस विवाद का एक दूसरा पहलू भी है। चीन से जुड़ी वैश्विक सप्लाई चेन पिछले कई वर्षों में इतनी गहरी हो चुकी है कि किसी उत्पाद में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल, पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक घटक और अंतिम असेंबली अलग-अलग देशों में हो सकती है। इसलिए हर तीसरे देश से गुजरने वाले चीनी सामान को अवैध ट्रांसशिपमेंट मानना भी सही नहीं होगा। कई कंपनियां वास्तविक उत्पादन लागत, बाजार की जरूरत, लॉजिस्टिक्स और व्यापारिक समझौतों के कारण अपनी सप्लाई चेन को अलग-अलग देशों में बांटती हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका के सामने अब यह चुनौती होगी कि वह वैध सप्लाई चेन पुनर्गठन और जानबूझकर टैरिफ चोरी के बीच स्पष्ट अंतर कैसे करता है।
अमेरिका ने इस कथित ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क की पहचान के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अन्य तकनीकी साधनों के इस्तेमाल की बात भी कही है। इसका संकेत साफ है—आने वाले समय में केवल सीमा शुल्क दस्तावेजों की जांच पर्याप्त नहीं होगी। अमेरिका अलग-अलग देशों से आने वाले सामान की कीमत, मात्रा, उत्पाद की उत्पत्ति, शिपिंग मार्ग और कंपनियों के कारोबारी रिकॉर्ड को आपस में जोड़कर यह पता लगाने की कोशिश कर सकता है कि कहीं चीन से आने वाले माल का रास्ता जानबूझकर बदला तो नहीं गया। इससे भारत जैसे देशों की कंपनियों पर अपने सप्लाई चेन रिकॉर्ड को और अधिक व्यवस्थित तथा पारदर्शी रखने का दबाव बढ़ सकता है।
यह विवाद ऐसे समय भी सामने आया है जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। दोनों देशों के बीच टैरिफ, तकनीक, ड्रोन, औद्योगिक उत्पादों और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों को लेकर लगातार मतभेद बने हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच प्रस्तावित बैठक से पहले यह रिपोर्ट अमेरिका को बातचीत की मेज पर अतिरिक्त दबाव और सौदेबाजी की ताकत दे सकती है। अमेरिकी पक्ष यह तर्क रख सकता है कि केवल चीन से सीधे आने वाले सामान पर शुल्क लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि तीसरे देशों के जरिए अमेरिकी बाजार तक पहुंचने वाले माल को भी उसी नजर से देखना होगा।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब संतुलन की है। एक ओर भारत को अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत रखना है, दूसरी ओर चीन के साथ मौजूद विशाल व्यापारिक और औद्योगिक संबंधों के कारण भारतीय उद्योग को व्यावहारिक जरूरतों के मुताबिक सप्लाई चेन बनाए रखना है। यदि अमेरिका भारतीय कंपनियों पर चीन के माल को गलत तरीके से अमेरिकी बाजार तक पहुंचाने का आरोप लगाता है, तो इसका असर केवल कुछ कंपनियों तक सीमित नहीं रह सकता; इससे भारतीय निर्यातकों की जांच, कस्टम प्रक्रिया और अमेरिकी बाजार में भरोसे पर भी असर पड़ सकता है।
इस पूरे विवाद में भारत के लिए सबसे जरूरी संदेश यही है कि वैश्विक व्यापार के बदलते दौर में पारदर्शी सप्लाई चेन अब सिर्फ कारोबारी सुविधा नहीं, रणनीतिक जरूरत बन चुकी है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके उद्योग और निर्यातक अंतरराष्ट्रीय नियमों का पूरी तरह पालन करें और किसी भी तरह के गलत दस्तावेज, फर्जी मूल-देश प्रमाण या संदिग्ध ट्रांसशिपमेंट की गुंजाइश न रहे। साथ ही, यदि अमेरिकी आरोपों में कोई तथ्यात्मक भ्रम है तो भारत को आंकड़ों और ठोस तथ्यों के साथ अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
कुल मिलाकर, अमेरिका की यह रिपोर्ट भारत के लिए एक व्यापारिक चेतावनी के साथ-साथ एक अवसर भी है। यदि भारत अपनी सप्लाई चेन को अधिक पारदर्शी बनाता है, चीन पर अत्यधिक निर्भरता वाले क्षेत्रों में वैकल्पिक स्रोत विकसित करता है और अपने विनिर्माण तथा निर्यात तंत्र की विश्वसनीयता बढ़ाता है, तो वह इस दबाव को अपनी आर्थिक ताकत में बदल सकता है। अमेरिका-चीन की टैरिफ लड़ाई भले ही दो महाशक्तियों के बीच हो, लेकिन उसकी लहरें अब भारत जैसे देशों की फैक्ट्रियों, बंदरगाहों और वैश्विक बाजार तक साफ दिखाई दे रही हैं।




