राजनीति/ अपराध | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 सितंबर 2026
SIR का नाम सुनते ही अब सिर्फ मतदाता सूची में नाम जुड़ने-कटने की तकनीकी प्रक्रिया याद नहीं आती, बल्कि एक ऐसी सुनियोजित साजिश की तस्वीर उभरती है जिसमें करोड़ों पात्र नागरिकों को उनके सबसे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित करने का खेल खेला गया है। RTI के जरिए मांगी गई जानकारी के जवाब में निर्वाचन आयोग के अधिकारी ने साफ-साफ लिख दिया कि SIR से संबंधित जिस फैसले के बारे में पूछा गया था, वह फैसला आयोग ने नहीं लिया। यह एक वाक्य ही पूरे मामले को अपराध की श्रेणी में धकेल देता है। जब देश का संवैधानिक निकाय खुद कह रहा है कि उसने यह फैसला नहीं लिया, तो फिर फैसला किसने लिया? किसके इशारे पर लिया? किसके फायदे के लिए लिया? किस फाइल पर किस अधिकारी ने दस्तखत किए? किसने इसे लागू करवाया और किसने इसे चुपचाप दबाने की कोशिश की? जब यह पूरा खेल कानून के दायरे से बाहर जाकर और संविधान को रद्दी की टोकरी में फेंककर खेला गया है, तो इस अवैध, अलोकतांत्रिक और देशद्रोही गतिविधि के लिए सजा का हकदार कौन-कौन है? क्या यह सिर्फ प्रशासनिक गलती है या लोकतंत्र की जड़ों पर चोट करने वाली साजिश?
मामला इसलिए और भी भयावह है क्योंकि 1 सितंबर 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार SIR के तहत 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13.37 करोड़ नाम बाहर कर दिए गए थे। यह संख्या SIR से पहले मौजूद मतदाता सूची का करीब 14.1 प्रतिशत थी—यानी हर सात में से एक मतदाता की पहचान को ड्राफ्ट सूची से मिटा दिया गया। दिल्ली में पिछली सूची के करीब 1.45 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 47.56 लाख नाम गायब हो गए। महाराष्ट्र में 2.07 करोड़ नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर कर दिए गए। ये आंकड़े कागजी आंकड़े नहीं हैं। इनके पीछे करोड़ों परिवार हैं, जिनके वोट का अधिकार छीन लिया गया। हर वोट की कीमत होती है। चुनाव में जीत-हार कई बार हजारों नहीं, सैकड़ों और कभी-कभी बेहद कम अंतर से तय होती है। ऐसे में किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से बाहर रह जाता है और वह मतदान नहीं कर पाता, तो उसका असर पूरे लोकतंत्र पर पड़ता है। हालांकि केवल 13.37 करोड़ के आंकड़े के आधार पर यह दावा अभी प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि किसी खास निर्वाचन क्षेत्र में हारा हुआ उम्मीदवार जीत गया या जीता हुआ हार गया, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाने की प्रक्रिया का फैसला किसने लिया—यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता।
यहां एक तथ्य साफ रखना जरूरी है कि 13.37 करोड़ नामों का आंकड़ा ड्राफ्ट सूची से बाहर हुए नामों का है, अंतिम रूप से मताधिकार समाप्त होने वालों का नहीं। SIR प्रक्रिया में दावे और आपत्तियां दाखिल करने का अवसर दिया गया है और गलत तरीके से बाहर हुए मतदाताओं के लिए नाम शामिल कराने की प्रक्रिया मौजूद है। इसलिए ड्राफ्ट सूची और अंतिम मतदाता सूची को एक नहीं माना जा सकता। लेकिन यह बात सवाल की गंभीरता को कम नहीं करती—इतने विशाल पैमाने पर नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर करने की प्रक्रिया का फैसला आखिर किसने लिया? पश्चिम बंगाल के आंकड़े इस खेल की असली तस्वीर दिखाते हैं। वहां SIR के दौरान 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जबकि 22.21 लाख से अधिक लोगों ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की। कुल 38.31 लाख अपीलें दाखिल हुईं और निर्वाचन आयोग के अनुसार महज 1,607 मतदाताओं के नाम चुनाव में मतदान करने के लिए समय रहते बहाल किए गए। यानी लाखों लोगों ने संघर्ष किया, फॉर्म भरे, दफ्तरों के चक्कर काटे, फिर भी केवल मुट्ठी भर नाम ही समय पर वापस आ सके। बाकी का क्या हुआ? उनकी आवाज कहां दब गई?
अब फिर RTI के जवाब पर लौटिए। मतदाता सूची कोई सामान्य सरकारी रजिस्टर नहीं है। यह उस नागरिक की लोकतांत्रिक पहचान है जिसके हाथ में मतदान का अधिकार है। ऐसे में अगर करोड़ों नामों को प्रभावित करने वाले फैसले के बारे में आधिकारिक RTI जवाब में कहा गया है कि “आयोग ने यह फैसला नहीं लिया”, तो सवालों की पूरी श्रृंखला सामने आ जाती है—फैसला किसने लिया? प्रस्ताव किसने तैयार किया? फाइल किसने आगे बढ़ाई? मंजूरी किसने दी? आदेश किसके नाम से जारी हुआ? उसे लागू किसने कराया? और सबसे अहम—इस निर्णय की संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी किसकी है? निर्वाचन आयोग के भीतर SIR और मतदाता सूची से जुड़े कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं। Indian Express की जांच के अनुसार निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार विभिन्न फैसलों और आदेशों पर आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने, पश्चिम बंगाल की अपीलों और मतदाता सूची के IT डाटाबेस तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने कुछ कदमों पर “unauthorised” और “illegal” जैसी आपत्तियां भी दर्ज की थीं। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग ने कहा है कि अलग-अलग विचार और तकनीकी सुझाव संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं और केवल आंतरिक टिप्पणियों के आधार पर पूरी प्रक्रिया का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। लेकिन जब आंकड़ा 13.37 करोड़ तक पहुंच जाए, तो आंतरिक मतभेद को सामान्य कहकर टालना संभव नहीं।
13.37 करोड़ नाम सिर्फ एक आंकड़ा नहीं हैं। हर नाम के पीछे एक नागरिक है, एक परिवार है, एक पहचान है और मतदान का अधिकार है। अगर एक पात्र मतदाता का नाम बिना उचित प्रक्रिया के बाहर होता है, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। और जब आंकड़ा करोड़ों तक पहुंच जाए, तो सवाल भी उतना ही बड़ा होना चाहिए—किसने फैसला लिया और किसने उसकी जिम्मेदारी ली? किसी जांच में जानबूझकर कानून तोड़ने, संवैधानिक अधिकारों में हस्तक्षेप करने या चुनावी प्रक्रिया से छेड़छाड़ करने का अपराध साबित होता है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई का रास्ता खुला है। दोष तय करने का अधिकार जांच और न्यायिक प्रक्रिया का है। फिर भी RTI ने एक बेहद सीधा और खतरनाक सवाल सामने रख दिया है—जब आयोग कह रहा है कि संबंधित फैसला आयोग ने नहीं लिया, तो फिर फैसला किसने लिया और किसके लिए लिया? इससे किसको फायदा हो रहा है? उस फैसले की फाइल कहां है? निर्णय लेने वाला प्राधिकरण कौन था? कानूनी आधार क्या था? किसने उसे मंजूरी दी? और 13.37 करोड़ नामों से जुड़ी इस पूरी प्रक्रिया की संवैधानिक जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
लोकतंत्र में वोट केवल एक संख्या नहीं होता। एक वोट भी चुनाव का परिणाम बदल सकता है। इसलिए 13.37 करोड़ नामों से जुड़ा सवाल सिर्फ मतदाता सूची का सवाल नहीं है—यह पारदर्शिता, अधिकार और जवाबदेही का सवाल है। यह सवाल है कि क्या देश में कोई ऐसा शक्तिशाली तंत्र है जो निर्वाचन आयोग के नाम पर करोड़ों नागरिकों का मताधिकार छीन सकता है और फिर आयोग खुद कह दे कि “हमने फैसला नहीं लिया”? RTI का जवाब सामने है। अब उस जवाब से पैदा हुए सबसे बड़े सवाल का जवाब भी सामने आना चाहिए—अगर फैसला EC ने नहीं लिया, तो फिर किसने लिया? और जो भी इस साजिश का हिस्सा था, उसे लोकतंत्र के साथ किए गए इस देशद्रोह की सजा क्यों नहीं मिलनी चाहिए?



