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रुपया दबाव में, 40 अरब डॉलर स्वाहा —अब कूटनीति बदलना मजबूरी

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ओपिनियन / व्यापार | प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | नई दिल्ली | 24 अप्रैल 2026

ईरान से जुड़ा युद्ध भारत को जितना सोचा गया था, उससे कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। इसका असर गैस की सप्लाई, विदेशों में काम करने वाले भारतीयों (NRI) के पैसे, विदेशी निवेश (FDI) और देश के केंद्रीय बैंक Reserve Bank of India (RBI) पर साफ दिख रहा है। ऐसे हालात में भारत को अपनी कूटनीति यानी विदेश नीति को नए सिरे से तय करने की जरूरत है।अप्रैल 2026 तक RBI को रुपये को गिरने से बचाने के लिए लगभग 40 अरब डॉलर खर्च करने पड़े। 30 मार्च को रुपया डॉलर के मुकाबले 95 रुपये से भी नीचे चला गया था। इसकी वजह थी महंगा कच्चा तेल (100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर), विदेश से पैसा निकलना और बाजार में बड़े पैमाने पर सट्टेबाजी।

RBI ने फरवरी से अब तक स्पॉट और फॉरवर्ड बाजार दोनों में करीब 40 अरब डॉलर खर्च किए ताकि बाजार में उतार-चढ़ाव को काबू किया जा सके। बैंकों पर सख्ती करते हुए उन्हें 30-40 अरब डॉलर के उन सौदों से बाहर निकलने को मजबूर किया गया, जिनमें वे रुपये के गिरने पर दांव लगा रहे थे।

RBI ने विदेशी (ऑफशोर) बाजार पर भी रोक लगाई और बैंकों को ग्राहकों को NDF (नॉन-डिलीवेरेबल फॉरवर्ड) कॉन्ट्रैक्ट देने से मना किया, ताकि सट्टेबाजी रोकी जा सके। तेल कंपनियों को भी कहा गया कि वे खुले बाजार से डॉलर खरीदने की बजाय खास क्रेडिट लाइन (जैसे SBI से) का इस्तेमाल करें, ताकि रुपये पर और दबाव न पड़े।

इन कदमों के बाद रुपया कुछ संभला और 16 अप्रैल तक करीब 93.20 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गया। लेकिन अचानक और तेजी से इन सौदों को बंद करने के कारण बैंकों को 3,000 से 4,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक तनाव आगे भी रुपये पर दबाव बनाए रख सकते हैं, इसलिए RBI सख्ती जारी रख सकता है।

कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि RBI ने 40 अरब डॉलर खर्च किए, जबकि Kotak Mahindra Bank जैसे संस्थानों का अनुमान है कि यह खर्च 45 अरब डॉलर तक हो सकता है।

असल में रुपये की कमजोरी कोई छोटी या अस्थायी समस्या नहीं है, बल्कि यह भारत की अर्थव्यवस्था की गहरी कमजोरी को दिखाती है। भारत ऊर्जा के लिए—खासकर तेल और गैस—विदेशों पर बहुत ज्यादा निर्भर है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने इस कमजोरी को और बढ़ा दिया है। Strait of Hormuz जैसे महत्वपूर्ण रास्तों पर असर पड़ने से तेल महंगा हो गया है और भारत का आयात बिल बढ़ गया है। इससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपये की मांग कमजोर हुई।

FDI कमजोर पड़ा

दूसरी तरफ, विदेशी निवेश की स्थिति भी खराब हो गई है। वैश्विक अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेशक जोखिम लेने से बच रहे हैं और भारत से पैसा निकाल रहे हैं। शेयर बाजार और बॉन्ड बाजार दोनों से लगातार पैसा बाहर जा रहा है।

युद्ध से पहले भी भारत में विदेशी निवेश की रफ्तार धीमी थी। FDI ठहराव में था और पोर्टफोलियो निवेश भी कमजोर पड़ रहा था। इससे भारत के लिए अपने खर्च (करंट अकाउंट डेफिसिट) को संभालना मुश्किल हो गया है और यह दिखाता है कि भारतीय बाजार निवेशकों के लिए कम आकर्षक होते जा रहे हैं।

इस स्थिति में RBI ने डॉलर बेचकर रुपये को संभालने की कोशिश और तेज कर दी है। साथ ही, कुछ असामान्य कदम भी उठाए गए—जैसे बैंकों के विदेशी मुद्रा सौदों पर रोक और विदेशी बाजार से जुड़ाव सीमित करना।

हालांकि, इन कदमों को आधिकारिक तौर पर “बाजार स्थिर करने” के लिए बताया गया है, लेकिन इनके स्तर और तरीके से लगता है कि RBI सीधे रुपये की कीमत को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।

ऐसे कदमों में जोखिम भी है। इससे बाजार में सही कीमत तय होने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। नीतियों में अचानक बदलाव निवेशकों का भरोसा तोड़ सकते हैं, हेजिंग (जोखिम से बचाव) महंगी हो सकती है और निवेशक बाजार से दूर जा सकते हैं। बाजार पर ज्यादा रोक लगाने से तरलता (liquidity) भी कम हो सकती है और उतार-चढ़ाव और बढ़ सकता है।

असल बात यह है कि रुपये का गिरना अर्थव्यवस्था के दबाव को दिखाता है, जिसे सिर्फ हस्तक्षेप से नहीं रोका जा सकता। कमजोर रुपया भले असुविधाजनक लगे, लेकिन इससे आयात कम होता है, निर्यात बढ़ता है और देश में निवेश के मौके बेहतर बनते हैं। अगर इसे जबरदस्ती रोका गया, तो जरूरी आर्थिक सुधारों में देरी होगी और नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

अंत में, भारत के सामने चुनौती है—रुपये को संभालना और बाजार को स्वतंत्र रखना। जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप से थोड़े समय के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन इससे भरोसा और व्यवस्था दोनों को नुकसान हो सकता है। बेहतर रास्ता यह है कि देश अपनी आर्थिक कमजोरियों को दूर करे, निवेशकों का भरोसा वापस लाए और बाजार को अपनी भूमिका निभाने दे।

रेमिटेंस बेहद अहम

विदेशों में काम कर रहे भारतीयों ने 2024-25 में रिकॉर्ड 135.46 अरब डॉलर भारत भेजे, जो 14% ज्यादा है। यह पैसा 1.88 करोड़ भारतीयों ने भेजा। 2024 में भी 129.4 अरब डॉलर का रिकॉर्ड बना था। RBI के अनुसार, यह रकम “प्राइवेट ट्रांसफर” के तहत आती है और कुल में 10% से ज्यादा हिस्सा रखती है।

भारत इस मामले में दुनिया में नंबर एक है। दूसरे नंबर पर मेक्सिको (68 अरब डॉलर), तीसरे पर चीन (48 अरब डॉलर), फिर फिलीपींस (40 अरब डॉलर) और पाकिस्तान (33 अरब डॉलर) हैं, जैसा कि World Bank के आंकड़े बताते हैं।

विदेशों में काम करने वाले भारतीयों की संख्या 1990 में 66 लाख थी, जो 2024 में बढ़कर 1.85 करोड़ हो गई। दुनिया में प्रवासियों में भारत की हिस्सेदारी भी 4.3% से बढ़कर 6% से ज्यादा हो गई है।

इनमें से लगभग आधे भारतीय खाड़ी देशों में काम करते हैं। लेकिन वहां की धीमी अर्थव्यवस्था और निर्माण कार्यों में गिरावट के कारण यह संख्या और उनसे आने वाला पैसा घट सकता है।

रूस-चीन बन सकते हैं शांति के केंद्र

भविष्य में अगर शांति की कोशिश होती है, तो संभव है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों की बजाय रूस और चीन इसमें बड़ी भूमिका निभाएं। इससे दुनिया का संतुलन बदलता दिख रहा है।

ऐसे में भारत के सामने बड़ा सवाल है—वह इस नई वैश्विक स्थिति में खुद को कैसे स्थापित करे, खासकर अगर रूस-चीन-ईरान का गठजोड़ मजबूत होता है।

अगर भारत ने इन बदलावों को नजरअंदाज किया, तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं। सीमाओं पर अस्थिरता बढ़ सकती है और देश के अंदर भी सामाजिक और राजनीतिक तनाव बढ़ सकते हैं। खासकर कामगारों का आना-जाना और समाज की संरचना प्रभावित हो सकती है।

भारत अब सिर्फ हालात पर प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं रह सकता। उसे तेजी और साफ सोच के साथ अपनी रणनीति तय करनी होगी—ताकि वह अपने राष्ट्रीय हित, आर्थिक मजबूती और सामाजिक संतुलन को बनाए रख सके।

यह चुनौती सिर्फ छोटे फैसलों से हल नहीं होगी। इसके लिए नीतियों, संस्थाओं और प्राथमिकताओं पर गहराई से सोचने और बड़े बदलाव करने की जरूरत है।

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