राष्ट्रीय | महेंद्र सिंह | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 12 जून 2026
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव के बीच भारतीय मीडिया की रिपोर्टिंग एक नए विवाद के केंद्र में आ गई है। भारत स्थित इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के दूतावास ने एक सार्वजनिक बयान जारी कर उन रिपोर्टों का कड़ा खंडन किया है जिनमें दावा किया गया था कि ईरान में आवश्यक वस्तुओं और रोजमर्रा की जरूरतों का संकट पैदा हो गया है। दूतावास ने न केवल इन दावों को निराधार बताया, बल्कि भारतीय मीडिया संस्थानों से अपील भी की कि वे ईरान से जुड़ी खबरें प्रकाशित करने से पहले विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोतों से सत्यापन करें।
विवाद का केंद्र टीवी टुडे समूह का प्रमुख समाचार चैनल “आज तक” और उसकी चर्चित एंकर अंजना ओम कश्यप हैं। हाल के दिनों में चैनल पर प्रसारित कुछ रिपोर्टों में ईरान की आंतरिक स्थिति और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता को लेकर गंभीर दावे किए गए थे। लेकिन ईरानी दूतावास ने आधिकारिक रूप से इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेज़ेश्कियन के नेतृत्व में देश में आवश्यक वस्तुओं की खरीद, आपूर्ति और वितरण सामान्य, स्थिर और निर्बाध रूप से जारी है तथा किसी प्रकार की कमी नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि दूतावास ने अपने बयान में भारतीय मीडिया को सीधे संबोधित करते हुए कहा कि ईरान संबंधी खबरों के लिए “विश्वसनीय, आधिकारिक और सत्यापित स्रोतों” का उपयोग किया जाना चाहिए। दूतावास ने विशेष रूप से “ईरान इंटरनेशनल” का उल्लेख करते हुए उसे ईरान विरोधी राजनीतिक समूहों से जुड़ा मंच बताया और कहा कि उसे ईरान की वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष स्रोत नहीं माना जा सकता।
यहीं से सवाल उठने शुरू होते हैं। यदि किसी विदेशी देश का आधिकारिक दूतावास सार्वजनिक रूप से किसी रिपोर्टिंग पर आपत्ति दर्ज कर रहा है, तो क्या संबंधित मीडिया संस्थान का दायित्व नहीं बनता कि वह अपना पक्ष भी सामने रखे? क्या खबर प्रसारित करने से पहले आधिकारिक प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया गया था? और यदि किया गया था तो उसे दर्शकों के सामने क्यों नहीं रखा गया?
पत्रकारिता का मूल आधार तथ्य, सत्यापन और संतुलन है। किसी भी विवादित अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर एकतरफा स्रोतों के आधार पर निष्कर्ष प्रस्तुत करना हमेशा जोखिम भरा माना जाता है। विशेष रूप से तब, जब मामला युद्ध, प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक संघर्ष से जुड़ा हो, जहां सूचना युद्ध भी वास्तविक युद्ध जितना ही प्रभावशाली होता है।
ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया मंच X पर अपना विरोध दर्ज कराते हुए आज तक को टैग भी किया। लेकिन खबर लिखे जाने तक चैनल की ओर से कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी। इस चुप्पी ने बहस को और तेज कर दिया है। आलोचकों का कहना है कि यदि मीडिया संस्थान दूसरों से जवाबदेही की अपेक्षा करते हैं तो उन्हें स्वयं भी अपने पत्रकारिता मानकों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।
यह मामला केवल ईरान या आज तक तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न से जुड़ा है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों की रिपोर्टिंग में भारतीय मीडिया किस हद तक स्वतंत्र सत्यापन करता है और किस हद तक बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहता है। यदि किसी रिपोर्ट पर संबंधित देश का आधिकारिक दूतावास ही सवाल उठा दे, तो उस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर चर्चा होना स्वाभाविक है।
इतना स्पष्ट है कि ईरान ने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी दर्ज करा दी है। दूतावास का संदेश केवल एक खंडन नहीं बल्कि भारतीय मीडिया के लिए चेतावनी भी है कि संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय विषयों पर रिपोर्टिंग करते समय तथ्यों की दोबारा जांच की जाए।



