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समृद्धि का विरोधाभास: दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था, फिर भी ‘लोअर-मिडिल इनकम’ क्यों?

ओपिनियन/ बिजनेस | शिवाजी सरकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 जुलाई 2026

दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था, लेकिन आम भारतीय कहां खड़ा है?

भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। करीब 4.15 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ भारत का दुनिया में छठे स्थान पर पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। भारत की विकास दर भी दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले तेज बनी हुई है और लगभग 6.5 प्रतिशत की वास्तविक GDP वृद्धि का अनुमान देश की आर्थिक ताकत को दिखाता है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के ठीक पीछे एक दूसरा आंकड़ा ऐसा है, जो कई गंभीर सवाल खड़े करता है। विश्व बैंक आज भी भारत को ‘लोअर-मिडिल इनकम’ यानी निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था की श्रेणी में रखता है और भारत 2009 से इसी श्रेणी में है। यानी करीब 17 वर्षों में देश की कुल अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी हो गई, शहर बदले, एक्सप्रेसवे बने, डिजिटल भुगतान की क्रांति हुई, बड़ी भारतीय कंपनियों ने दुनिया में अपनी पहचान बनाई, शेयर बाजार का आकार बढ़ा, लेकिन औसत नागरिक की आय उस रफ्तार से आगे नहीं बढ़ी कि भारत अगली आय श्रेणी में पहुंच सके। यही भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास है। सवाल यह नहीं है कि भारत आगे बढ़ रहा है या नहीं—भारत निश्चित रूप से आगे बढ़ रहा है। असली सवाल यह है कि इस विकास का कितना हिस्सा सामान्य भारतीय के जीवन, उसकी कमाई और उसकी आर्थिक सुरक्षा तक पहुंच रहा है।

GDP बड़ी होने और लोगों के अमीर होने में बहुत बड़ा फर्क है

इस पूरे सवाल को बहुत आसान तरीके से समझा जा सकता है। किसी देश की कुल GDP बड़ी होने का अर्थ यह है कि उस देश में वस्तुओं और सेवाओं का कुल उत्पादन बहुत बड़ा है, लेकिन इसका यह अर्थ अपने आप नहीं निकलता कि वहां रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति भी अमीर है। विश्व बैंक देशों की आय श्रेणी तय करते समय प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय यानी GNI per capita को महत्वपूर्ण आधार बनाता है। विश्व बैंक के वर्गीकरण में प्रति व्यक्ति GNI $1,146 से $4,515 के बीच होने पर अर्थव्यवस्था लोअर-मिडिल इनकम और $4,516 से ऊपर जाने पर अपर-मिडिल इनकम श्रेणी में पहुंचती है। भारत की समस्या यहीं दिखाई देती है। कुल अर्थव्यवस्था विशाल है, लेकिन जब उस आर्थिक ताकत को देश की बहुत बड़ी आबादी के संदर्भ में देखा जाता है तो प्रति व्यक्ति आय अभी भी अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। रूस जैसी अर्थव्यवस्था का कुल आकार भारत से छोटा हो सकता है, लेकिन वहां प्रति व्यक्ति आय लगभग $17,500 से $18,500 के आसपास है। इसलिए केवल यह कहना कि हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया में छठे स्थान पर पहुंच गई, पूरी कहानी नहीं बताता। आर्थिक विकास की असली सफलता तब मानी जाएगी जब GDP की बढ़ोतरी के साथ सामान्य नागरिक की आय भी तेजी से बढ़े और भारत लोअर-मिडिल इनकम से अपर-मिडिल और फिर हाई-इनकम अर्थव्यवस्था की ओर बढ़े।

सबसे बड़ा सवाल रोजगार का नहीं, अच्छे रोजगार का है

भारत की आर्थिक चुनौती को केवल बेरोजगारी के आंकड़े से समझना भी अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि जो रोजगार उपलब्ध हैं, उनमें कितने रोजगार अच्छी तनख्वाह, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता देते हैं। पिछले दो दशकों में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में कॉन्ट्रैक्ट आधारित रोजगार तेजी से बढ़ा है। कम वेतन पर काम करने वाले अस्थायी कर्मचारियों की बड़ी संख्या तैयार हुई है, जिनके पास स्थायी कर्मचारियों जैसी नौकरी की सुरक्षा और दूसरी सुविधाएं नहीं होतीं। सरकार को इस सवाल पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या लंबे समय तक कम वेतन वाले कॉन्ट्रैक्ट रोजगार पर निर्भरता भारत की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने की राह में बाधा बन रही है। अगर कोई युवा रोजगार में है, लेकिन उसकी कमाई इतनी कम है कि बढ़ते किराए, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और रोजमर्रा के खर्चों के बाद उसके पास बचत ही नहीं होती, तो आंकड़ों में वह बेरोजगार नहीं है, लेकिन आर्थिक रूप से सुरक्षित भी नहीं है। यही कारण है कि भारत को अब केवल ‘कितनी नौकरियां पैदा हुईं’ से आगे बढ़कर यह पूछना होगा कि किस तरह की नौकरियां पैदा हुईं और उनमें लोगों को कितनी आय मिल रही है।

काम करने वाले करोड़ों हाथ हैं, लेकिन बेहतर अवसर अभी कम हैं

भारत की लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट लगभग 56.4 प्रतिशत बताई जाती है, जबकि वियतनाम में यह करीब 73 प्रतिशत और फिलीपींस में लगभग 60 प्रतिशत है। इसका आसान अर्थ यह है कि भारत की विशाल कामकाजी आबादी का पूरा आर्थिक उपयोग अभी नहीं हो पा रहा है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी मानी जाती है, लेकिन यही ताकत तभी आर्थिक शक्ति बन सकती है जब युवाओं को पर्याप्त संख्या में अच्छी और उत्पादक नौकरियां मिलें। केवल डिग्री देने से अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होती, उस डिग्री के बाद रोजगार भी चाहिए। केवल रोजगार मिलना भी पर्याप्त नहीं है, ऐसा रोजगार चाहिए जिसमें व्यक्ति अपनी आय बढ़ा सके, परिवार का जीवन स्तर बेहतर कर सके और भविष्य के लिए बचत कर सके। अगर करोड़ों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं, छोटी नौकरियों या अस्थायी रोजगार के बीच फंसे रहें, तो देश की युवा आबादी जिसे ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ कहा जाता है, वही आगे चलकर आर्थिक दबाव बन सकती है। इसलिए रोजगार की संख्या के साथ रोजगार की गुणवत्ता भारत की आर्थिक नीति के केंद्र में आनी चाहिए।

श्रम सुधारों की दोबारा समीक्षा करने का समय

पिछले दो दशकों में भारत में श्रम कानूनों और रोजगार व्यवस्था में कई बदलाव हुए हैं। इन सुधारों का उद्देश्य उद्योगों के लिए कारोबार आसान बनाना और निवेश आकर्षित करना रहा है, लेकिन अब यह भी देखना जरूरी है कि इन बदलावों का कर्मचारियों की आय और नौकरी की सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ा। किसी अर्थव्यवस्था को उद्योग और कर्मचारी में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। दोनों मजबूत होंगे तभी अर्थव्यवस्था लंबे समय तक मजबूत रहेगी। कंपनियों को कारोबार करने की सुविधा मिलनी चाहिए, निवेश बढ़ना चाहिए, मुनाफा होना चाहिए, लेकिन उसी के साथ कर्मचारी को उचित वेतन, सुरक्षित कार्य परिस्थितियां और सामाजिक सुरक्षा भी मिलनी चाहिए। अगर महंगाई तेजी से बढ़े लेकिन वेतन उसी अनुपात में न बढ़े, तो व्यक्ति की वास्तविक खरीद क्षमता घटती है। यही खरीद क्षमता बाजार में मांग पैदा करती है। इसलिए कम वेतन को हमेशा उद्योगों के लिए लाभ मानना भी सही आर्थिक सोच नहीं है। बेहतर वेतन पाने वाला कर्मचारी ज्यादा खर्च करता है, बाजार में मांग बढ़ाता है और अंततः कारोबार को ही मजबूत करता है।

45 प्रतिशत कार्यबल खेती में, यही संरचनात्मक चुनौती

भारत के लगभग 45 प्रतिशत कामगार आज भी कृषि क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। कृषि भारत की अर्थव्यवस्था और समाज की रीढ़ है, लेकिन इतनी बड़ी आबादी का अपेक्षाकृत कम उत्पादकता वाले क्षेत्र में रहना एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती भी है। इसका समाधान खेती को कमजोर करना नहीं, बल्कि कृषि की उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण आबादी के लिए उद्योग, निर्माण, सेवाओं, खाद्य प्रसंस्करण और आधुनिक तकनीक आधारित रोजगार तैयार करना है। वियतनाम जैसे देशों ने अपनी बड़ी आबादी को धीरे-धीरे कम उत्पादक क्षेत्रों से अधिक उत्पादक उद्योगों और निर्यात आधारित क्षेत्रों में स्थानांतरित किया। भारत में यह परिवर्तन अपेक्षित गति से नहीं हो पाया। अगर गांव का युवा खेती छोड़ता है और शहर जाकर भी कम वेतन वाली अस्थायी नौकरी करता है, तो इसे पूर्ण आर्थिक परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। वास्तविक परिवर्तन तब होगा जब कृषि से बाहर आने वाले व्यक्ति की उत्पादकता और आय दोनों बढ़ें।

राज्यों के बीच विकास की खाई भी भारत को पीछे खींचती है

भारत वास्तव में एक नहीं बल्कि अलग-अलग आर्थिक गति से चलने वाले कई भारतों का समूह दिखाई देता है। कुछ राज्य उद्योग, तकनीक, निर्यात और सेवाओं में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जबकि कई राज्यों में आज भी अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं की भारी कमी है। विकसित राज्यों को अब वैश्विक वैल्यू चेन, हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आधुनिक सेवाओं और निर्यात के अगले स्तर पर जाना होगा, जबकि कम विकसित राज्यों में सबसे पहले मजबूत स्कूल, अस्पताल, बिजली, सड़क, पानी, डिजिटल नेटवर्क और स्थानीय उद्योग तैयार करने होंगे। जब तक राज्यों के बीच यह आर्थिक दूरी कम नहीं होगी, देश की औसत प्रति व्यक्ति आय को तेजी से ऊपर ले जाना कठिन रहेगा। भारत की आर्थिक ताकत केवल मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई, पुणे या कुछ औद्योगिक क्षेत्रों से तय नहीं हो सकती। असली परिवर्तन तब होगा जब छोटे शहर और गांव भी उसी विकास प्रक्रिया में शामिल होंगे।

MSME हांफता रहेगा तो करोड़ों नई नौकरियां कहां से आएंगी?

भारत के माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइज यानी MSME क्षेत्र को अक्सर अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है, लेकिन इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या आज भी पूंजी और आसान कर्ज की है। भारत की दीर्घकालीन निवेश दर को मौजूदा करीब 33.5 प्रतिशत GDP से बढ़ाकर 40 प्रतिशत तक ले जाने की जरूरत बताई जाती है, लेकिन केवल बड़ी कंपनियों के निवेश से यह लक्ष्य सामाजिक रूप से पर्याप्त नहीं होगा। देश के छोटे दुकानदार, निर्माता, कारोबारी और उद्यमी को भी बैंक और औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से आसानी से पूंजी मिलनी चाहिए। एक छोटा उद्योग भले हजार लोगों को रोजगार न दे, लेकिन अगर देशभर में लाखों छोटे उद्योग पांच-दस-पचास लोगों को रोजगार देने लगें तो रोजगार की तस्वीर बदल सकती है। इसलिए MSME को केवल सरकारी भाषणों में अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहना पर्याप्त नहीं है; उसे सस्ता कर्ज, कम जटिल नियम, समय पर भुगतान, बेहतर बाजार और तकनीकी सहायता भी देनी होगी।

कल्याण योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन स्थायी समाधान बेहतर कमाई है

भारत अपने GDP का लगभग 7 प्रतिशत सामाजिक कल्याण पर खर्च करता है और इसमें राज्य सरकारों की हिस्सेदारी बहुत बड़ी है। खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आवास, पेयजल, स्वास्थ्य और नकद सहायता जैसी योजनाओं ने करोड़ों गरीब और निम्न आय वाले परिवारों को बड़ी राहत दी है। इन योजनाओं की जरूरत और महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन किसी अर्थव्यवस्था की अंतिम सफलता इस बात से तय नहीं हो सकती कि सरकार कितने लोगों को सहायता दे रही है। ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कितने परिवार ऐसी आर्थिक स्थिति में पहुंच रहे हैं जहां उन्हें लगातार सरकारी सहायता की आवश्यकता ही न रहे। मुफ्त राशन भूख से सुरक्षा दे सकता है, लेकिन अच्छी नौकरी परिवार को आर्थिक स्वतंत्रता देती है। सरकारी मकान सिर पर छत दे सकता है, लेकिन स्थिर आय परिवार को अपनी पसंद का भविष्य बनाने की ताकत देती है। इसलिए कल्याणकारी योजनाओं और रोजगार नीति को एक-दूसरे का विकल्प नहीं बल्कि पूरक बनाना होगा। सरकार की सफलता अंततः तब होगी जब गरीब व्यक्ति सहायता पाने वाले नागरिक से बदलकर मजबूत उपभोक्ता, करदाता, बचतकर्ता और निवेशक बने।

कंपनियों का मुनाफा बढ़े, लेकिन उसका लाभ समाज तक भी पहुंचे

भारत में कई बड़ी कंपनियों का मुनाफा तेजी से बढ़ा है और कारोबार का विस्तार हुआ है। यह अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन यहां भी एक जरूरी सवाल है—क्या बढ़ते कॉरपोरेट मुनाफे का पर्याप्त हिस्सा बेहतर रोजगार, ज्यादा वेतन और नए निवेश के रूप में अर्थव्यवस्था में वापस आ रहा है? निजी क्षेत्र को मुनाफा कमाने का पूरा अधिकार है क्योंकि मुनाफे के बिना निवेश और विस्तार संभव नहीं है, लेकिन एक स्वस्थ पूंजीवादी व्यवस्था वही होती है जिसमें कंपनी, निवेशक, कर्मचारी और उपभोक्ता—सभी को विकास का लाभ मिले। यदि कंपनियों का मुनाफा लगातार बढ़ता रहे लेकिन कर्मचारियों की वास्तविक मजदूरी ठहरी रहे, तो आर्थिक असमानता बढ़ेगी और घरेलू मांग कमजोर होगी। निजीकरण का अर्थ केवल अधिकतम लाभ नहीं हो सकता। उसके साथ जवाबदेही, सेवा की गुणवत्ता, उचित कीमत, रोजगार और सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होनी चाहिए। विकास को साझा करना कोई दान नहीं बल्कि टिकाऊ अर्थव्यवस्था की जरूरत है।

विश्व बैंक का अरबों डॉलर का निवेश, लेकिन जमीन पर नतीजा कितना?

भारत में विश्व बैंक की लगभग 79 सक्रिय प्रतिबद्धताओं का कुल आकार करीब 20 अरब डॉलर बताया जाता है और इसके अलावा इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन भी बड़े स्तर पर भारत में निवेश और परियोजनाओं को समर्थन देता है। इतनी बड़ी राशि निश्चित रूप से भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, लेकिन यहां भी असली सवाल रकम का नहीं बल्कि परिणाम का है। अगर अरबों डॉलर शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, रोजगार, जल व्यवस्था, ग्रामीण विकास और संस्थागत सुधारों के लिए आते हैं तो उनके परिणाम भी लोगों के जीवन में दिखाई देने चाहिए। कितने नए रोजगार बने, कितने बच्चों को बेहतर शिक्षा मिली, कितने लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिली, कितने छोटे कारोबार मजबूत हुए और कितने क्षेत्रों की उत्पादकता बढ़ी—इन सवालों के आधार पर परियोजनाओं का मूल्यांकन होना चाहिए। केवल यह बताना कि भारत को कितना अंतरराष्ट्रीय वित्त मिला, सफलता का प्रमाण नहीं है। असली सफलता यह है कि उस धन ने सामान्य नागरिक के जीवन में कितना बदलाव पैदा किया।

दुनिया केवल GDP की तालिका नहीं देखती

भारत के लिए सबसे जरूरी बात यह समझना है कि दुनिया किसी देश की आर्थिक ताकत का आकलन केवल GDP की रैंकिंग से नहीं करती। प्रति व्यक्ति आय, मजदूरी, रोजगार की गुणवत्ता, श्रम भागीदारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, उत्पादकता और जीवन स्तर भी किसी देश की वास्तविक आर्थिक स्थिति बताते हैं। यही कारण है कि भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद लोअर-मिडिल इनकम श्रेणी में है। इसमें कोई विरोधाभास तभी दिखाई देता है जब हम GDP और नागरिक की आय को एक ही चीज मान लेते हैं। वास्तव में दोनों अलग-अलग तस्वीरें दिखाते हैं। GDP बताती है कि पूरा देश मिलकर कितना बड़ा आर्थिक उत्पादन कर रहा है, जबकि प्रति व्यक्ति आय यह बताती है कि उस आर्थिक ताकत का औसत नागरिक की आर्थिक स्थिति से क्या रिश्ता है। इसलिए भारत को अब केवल दुनिया की तीसरी, चौथी या पांचवीं अर्थव्यवस्था बनने की दौड़ नहीं लड़नी चाहिए, बल्कि प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने की दौड़ को भी उतनी ही गंभीरता से लेना चाहिए।

वैश्विक संकट बताते हैं कि मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था कितनी जरूरी है

भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था दुनिया से अलग रहकर नहीं चल सकती। युद्ध, कच्चे तेल की कीमतें, सप्लाई चेन में रुकावट, व्यापार युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। हाल के अमेरिका-ईरान संघर्ष जैसे घटनाक्रम यह बताते हैं कि ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक सप्लाई चेन पर अत्यधिक निर्भरता कितनी बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे संकटों से पूरी तरह बचना संभव नहीं है, लेकिन मजबूत घरेलू मांग, विविध ऊर्जा स्रोत, मजबूत MSME, बेहतर रोजगार और ज्यादा आय वाले नागरिक अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने की क्षमता देते हैं। अगर घरेलू अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत हो तो वैश्विक संकट का असर सीमित किया जा सकता है। लेकिन अगर पहले से ही कम आय, कमजोर रोजगार और क्षेत्रीय असमानता जैसी समस्याएं मौजूद हों तो बाहरी संकट उनका असर और बढ़ा देता है।

अब विश्व बैंक के नुस्खों के साथ अपनी नीतियों की भी समीक्षा जरूरी

विश्व बैंक लंबे समय से भारत में निजी क्षेत्र के नेतृत्व में रोजगार पैदा करने, टैक्स व्यवस्था आसान बनाने, श्रम कानूनों में सुधार, व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने, उद्यमिता को मजबूत करने, पूंजी जुटाने और कारोबार पर अनावश्यक नियमों का बोझ घटाने की बात करता रहा है। इन सुझावों में कई उपयोगी बातें हैं, लेकिन भारत को इन्हें अपनी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार देखना होगा। अगर कारोबार आसान हो लेकिन रोजगार असुरक्षित हो जाए, निवेश बढ़े लेकिन मजदूरी न बढ़े, निजीकरण बढ़े लेकिन सेवाएं महंगी हो जाएं, या कंपनियों का मुनाफा बढ़े लेकिन घरेलू मांग कमजोर रहे तो नीति के परिणामों की दोबारा समीक्षा करनी होगी। आर्थिक सुधारों का अंतिम उद्देश्य केवल निवेशकों का विश्वास बढ़ाना नहीं बल्कि नागरिकों की आर्थिक क्षमता बढ़ाना भी होना चाहिए। इसलिए विश्व बैंक के सुझाव हों या भारत सरकार की अपनी नीतियां—हर नीति को इस कसौटी पर परखना चाहिए कि उससे सामान्य भारतीय की आय, रोजगार और जीवन स्तर कितना बेहतर हुआ।

भारत की अगली आर्थिक क्रांति GDP में नहीं, आम आदमी की आय में होनी चाहिए

भारत के सामने अब लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए। दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना गौरव की बात होगी, लेकिन उससे कहीं बड़ी उपलब्धि भारत को लोअर-मिडिल इनकम से अपर-मिडिल इनकम और फिर हाई-इनकम देश बनाना होगी। इसके लिए केवल GDP की तेज वृद्धि पर्याप्त नहीं है। करोड़ों अच्छी नौकरियां, बेहतर मजदूरी, सुरक्षित रोजगार, मजबूत MSME, ज्यादा उत्पादक कृषि, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवा, मजबूत सामाजिक सुरक्षा और राज्यों के बीच कम होती आर्थिक असमानता जरूरी है। भारत की सफलता का सबसे सही पैमाना यह नहीं होगा कि दिल्ली या मुंबई में कितनी ऊंची इमारतें बनीं, शेयर बाजार कितने अंक ऊपर गया या देश की GDP कितने ट्रिलियन डॉलर की हो गई। असली पैमाना यह होगा कि गांव के किसान, शहर के कर्मचारी, छोटे दुकानदार, फैक्ट्री मजदूर, शिक्षक, युवा और सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार की वास्तविक आय कितनी बढ़ी। महीने के अंत में उसके पास कितना पैसा बचता है, वह अपने बच्चों को कैसी शिक्षा दे सकता है, बीमारी आने पर इलाज करा सकता है या नहीं और क्या उसे अपने भविष्य का भरोसा है। GDP दुनिया को भारत की ताकत दिखाती है, लेकिन आम आदमी की जेब भारत की असली समृद्धि बताती है। जिस दिन दोनों तस्वीरें एक जैसी दिखाई देने लगेंगी, उसी दिन भारत का ‘Prosperity Paradox’ वास्तव में खत्म होगा।

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