अपराध/ कर्नाटक | ABC NATIONAL NEWS | बेंगलुरु | 19 सितंबर 2026
कर्नाटक लोक सेवा आयोग यानी KPSC, जिस संस्था पर राज्य के लाखों युवाओं की सरकारी नौकरी की उम्मीद टिकी होती है, अब गंभीर सवालों के घेरे में है। The Indian Express की विस्तृत जांच के मुताबिक KPSC के निलंबित अध्यक्ष शिवशंकरप्पा एस. साहूकार के करीब सात साल के कार्यकाल में नियुक्तियों, परीक्षा प्रक्रिया और प्रशासनिक फैसलों को लेकर बार-बार गंभीर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रहीं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी नियुक्ति 2019 में तत्कालीन BJP सरकार के कार्यकाल में हुई, लेकिन 2023 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद भी वे पद पर बने रहे। जांच में यह भी दावा किया गया है कि KPSC के वरिष्ठ अधिकारियों ने कई बार अनियमितताओं की ओर सरकार का ध्यान खींचा, लेकिन कार्रवाई प्रभावी तरीके से आगे नहीं बढ़ सकी।
साहूकार को 31 अगस्त 2019 को KPSC का सदस्य नियुक्त किया गया था। उस समय कर्नाटक में बी.एस. येदियुरप्पा के नेतृत्व वाली BJP सरकार थी। उनकी नियुक्ति में शुरुआती स्तर पर ही सवाल उठे। उन्हें पहले ‘official’ सदस्य की श्रेणी में रखा गया, लेकिन आपत्ति के बाद उन्हें ‘non-official’ श्रेणी में किया गया क्योंकि उनके पास आवश्यक सरकारी सेवा का अनुभव नहीं था। इसके बावजूद मार्च 2021 में उन्हें KPSC का अध्यक्ष बना दिया गया। यह नियुक्ति भी इसलिए चर्चा में आई क्योंकि उनके पूर्ववर्ती IAS अधिकारी के कार्यकाल की समाप्ति से पहले ही उनके उत्तराधिकारी के रूप में साहूकार की नियुक्ति कर दी गई थी।
साहूकार के पेशेवर रिकॉर्ड को लेकर भी सवाल सामने आए। KPSC रिकॉर्ड के मुताबिक उन्होंने कृषि इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी और बाद में National Cooperative Union of India की एक परियोजना में काम किया। Indian Express की जांच के अनुसार, 2010 में उनके नियोक्ता ने उनका अनुबंध आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया था और उनके काम को संतोषजनक नहीं बताया था। इसके बाद KPSC में नियुक्ति तक उनके रोजगार से जुड़े सार्वजनिक रिकॉर्ड सीमित हैं। अखबार की रिपोर्ट में एक पूर्व KPSC सदस्य के हवाले से कहा गया है कि इस दौरान उन्होंने अनौपचारिक रूप से पैसे उधार देने का काम भी किया। इन व्यक्तिगत और पेशेवर दावों पर साहूकार ने अखबार के सवालों का जवाब नहीं दिया।
सबसे गंभीर सवाल तब सामने आए जब KPSC के भीतर के अधिकारियों ने कथित अनियमितताओं को लिखित रूप में उठाना शुरू किया। 2023 में KPSC सचिव IAS अधिकारी विकास सुरलकर और अध्यक्ष साहूकार के बीच अधिकारों और पारदर्शिता के मुद्दों पर टकराव हुआ। सुरलकर ने भर्ती प्रक्रिया में कथित नियम उल्लंघन और उम्मीदवारों के साथ अन्याय की ओर सरकार का ध्यान खींचा। Indian Express के अनुसार, उनके द्वारा रिपोर्ट भेजे जाने के अगले दिन उन्हें KPSC सचिव पद से हटा दिया गया। बाद में उनकी जगह आईं IAS अधिकारी लता कुमारी ने भी नियुक्तियों और प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर आपत्तियां उठाईं।
लता कुमारी ने जनवरी 2024 में राज्य सरकार और राज्यपाल को भेजे पत्र में साहूकार पर अधिकारों के कथित दुरुपयोग, भर्ती की शर्तों में बदलाव, इंटरव्यू पैनल के चयन और अन्य प्रशासनिक मामलों में नियमों की अनदेखी के आरोप लगाए। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 317 के तहत कार्रवाई की सिफारिश भी की थी। रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2024 में उन्हें भी छुट्टी पर भेज दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम से यह सवाल जरूर उठता है कि जिन अधिकारियों ने भर्ती व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों की ओर ध्यान दिलाया, उनके साथ बाद में क्या हुआ।
इसके बाद OMR उत्तर पुस्तिकाओं से कथित छेड़छाड़ का मामला सामने आया। 2023 में Assistant Executive Engineers की भर्ती परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिकाओं में छेड़छाड़ की शिकायत हुई। KPSC की आंतरिक जांच में बाद में 10 उम्मीदवारों को कथित रूप से उत्तर पुस्तिकाओं से छेड़छाड़ का दोषी बताया गया। मामला कर्नाटक हाई कोर्ट तक पहुंचा। एक समय CBI या SIT जैसी स्वतंत्र जांच की संभावना पर भी सुनवाई हुई, लेकिन बाद में मामला कर्नाटक राज्य प्रशासनिक अधिकरण यानी KSAT को भेज दिया गया। Indian Express के अनुसार, अंततः अलग से SIT जांच आगे नहीं बढ़ सकी।
अब सबसे बड़ा मामला 400 पशु चिकित्सा अधिकारियों की भर्ती परीक्षा का है। CID की जांच के अनुसार कुछ उम्मीदवारों को परीक्षा से पहले कथित तौर पर प्रश्नपत्र उपलब्ध कराया गया और कुछ उम्मीदवारों को रिसॉर्ट तथा होटलों में ठहराकर परीक्षा की तैयारी कराई गई। जांच में यह भी आरोप सामने आया कि कुछ उम्मीदवारों से कथित तौर पर ₹40 लाख से ₹80 लाख तक की रकम मांगी गई। CID ने KPSC के तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक IAS अधिकारी ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार, बिचौलिये बसवराज कन्नाले और अन्य लोगों की भूमिका की जांच की है।
मामला यहीं नहीं रुका। CID ने अदालत को बताया कि साहूकार और उनके बेटे की एक गिरफ्तार बिचौलिये के साथ एन्क्रिप्टेड इंटरनेट कॉल के जरिए लगातार बातचीत हुई थी। अदालत में जांच एजेंसी द्वारा रखी गई सामग्री के आधार पर साहूकार की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की गई। साहूकार ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि उनके खिलाफ सीधे तौर पर कोई आरोप नहीं है और मामला राजनीतिक रूप से प्रेरित है। यह उनका पक्ष है और अंतिम दोष सिद्धि का प्रश्न अदालत की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
इसी भर्ती मामले में CID ने कथित तौर पर 29 उम्मीदवारों को लीक हुए प्रश्नपत्र से लाभ मिलने की जांच की है। जांच एजेंसी ने 329 उम्मीदवारों की OMR शीट और उनकी कार्बन कॉपी जब्त कर फोरेंसिक जांच के लिए भेजी है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, जांच में रिश्वत की रकम के लेन-देन और उससे जुड़े वित्तीय रास्तों की भी पड़ताल की जा रही है।
और फिर सामने आया सबसे चौंकाने वाला मामला—साहूकार की बेटी की सरकारी नौकरी। आरोप है कि उनकी बेटी ने सरकारी नौकरी के लिए ऐसा आय प्रमाणपत्र पेश किया जिसमें परिवार की सालाना आय सिर्फ ₹40,000 दिखाई गई, जबकि FIR के अनुसार साहूकार KPSC सदस्य रहते हुए करीब ₹2.05 लाख मासिक बेसिक वेतन और बाद में अध्यक्ष रहते करीब ₹2.25 लाख मासिक बेसिक वेतन पा रहे थे। इस मामले में एक राजस्व निरीक्षक पर कथित रूप से गलत आय प्रमाणपत्र जारी करने का आरोप है और अदालत ने उसकी अग्रिम जमानत खारिज कर दी है। साहूकार की बेटी को भी मामले में आरोपी बनाया गया है।
इन्हीं घटनाक्रमों के बीच कर्नाटक के राज्यपाल ने 25 अगस्त 2026 को साहूकार को KPSC अध्यक्ष पद से निलंबित कर दिया। इससे पहले एक निलंबन आदेश को हाई कोर्ट ने प्रक्रियागत आधार पर रद्द किया था, जिसके बाद राज्य मंत्रिमंडल ने दोबारा कार्रवाई की सिफारिश की और राज्यपाल ने नया आदेश जारी किया। CID ने भी पशु चिकित्सा भर्ती मामले में उनसे पूछताछ के लिए समन जारी किया।
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि साहूकार के खिलाफ लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं। असली सवाल यह भी है कि सरकारी नौकरियों की भर्ती करने वाली संवैधानिक संस्था में अगर अनियमितताओं के संकेत कई बार सामने आए, तो समय रहते व्यवस्था ने कार्रवाई क्यों नहीं की? उपलब्ध जांच रिपोर्ट के अनुसार शिकायतें BJP सरकार के समय से सामने आती रहीं और कांग्रेस सरकार के दौरान भी अधिकारियों ने आपत्तियां दर्ज कराईं। इसलिए इस मामले को केवल BJP बनाम कांग्रेस की राजनीति के चश्मे से देखना अधूरा होगा। यह मामला उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें लाखों युवाओं की मेहनत, परीक्षा और भविष्य दांव पर लगा होता है।
सरकारी नौकरी की परीक्षा में बैठने वाला युवा महीनों और वर्षों तक तैयारी करता है। वह मानकर चलता है कि उसकी मेहनत, ज्ञान और परीक्षा में प्रदर्शन के आधार पर उसका चयन होगा। अगर किसी भर्ती में पेपर लीक, OMR से छेड़छाड़ या पैसे के बदले चयन जैसे आरोप सामने आते हैं, तो उसका असर केवल कुछ उम्मीदवारों तक सीमित नहीं रहता—पूरे परीक्षा तंत्र पर युवाओं का भरोसा प्रभावित होता है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी इस मामले की सुनवाई के दौरान परीक्षा व्यवस्था पर जनता के भरोसे और भविष्य के प्रशासकों की भर्ती को लेकर गंभीर चिंता जताई थी।
इसलिए KPSC प्रकरण का सबसे जरूरी सबक यही है—सरकार कोई भी हो, भर्ती आयोग की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और जवाबदेही से समझौता नहीं होना चाहिए। आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, दोषी पाए जाने वालों पर कानून के मुताबिक कार्रवाई हो और जिन अभ्यर्थियों ने बिना किसी गलती के परीक्षा दी है, उनके हितों की रक्षा की जाए। आखिर सरकारी नौकरी सिर्फ एक पद नहीं होती; लाखों युवाओं के लिए यह उनके परिवार के भविष्य और वर्षों की मेहनत का सवाल होती है।



