आस्था | ABC NATIONAL NEWS | नैनीताल | 19 सितंबर 2026
कुमाऊं की पहाड़ियों में शाम ढल रही है। हल्की बारिश हो रही है। मंदिर के बाहर सैकड़ों लोग आरती का इंतजार कर रहे हैं। किसी के हाथ जुड़े हैं, किसी की आंखों में आंसू हैं और किसी की जुबान पर बस एक ही नाम—“सीताराम… सीताराम…”। जैसे ही आरती की घंटियां बजती हैं, पूरा वातावरण भक्ति में डूब जाता है। यह है कैंची धाम, वह जगह जहां आज भी नीम करौली बाबा की मौजूदगी को उनके भक्त अपने विश्वास में महसूस करते हैं।
करीब पांच दशक पहले दुनिया छोड़ चुके नीम करौली बाबा की लोकप्रियता आज कम होने के बजाय लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। नैनीताल से करीब 20 किलोमीटर दूर पहाड़ियों में स्थित उनका आश्रम अब सिर्फ श्रद्धालुओं का तीर्थ नहीं रहा, बल्कि देश-विदेश से आने वाले युवाओं, पर्यटकों और सोशल मीडिया की नई पीढ़ी के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया है।
नीम करौली बाबा को 20वीं सदी के प्रभावशाली भारतीय संतों में गिना जाता है। उनकी खास पहचान थी—कंबल ओढ़े हुए शांत मुद्रा में बैठना या लेटना। उनके बारे में अनेक किस्से और आध्यात्मिक अनुभव उनके भक्तों के बीच आज भी सुनाए जाते हैं। बाबा का निधन 1973 में हुआ, लेकिन उनके अमेरिकी शिष्यों ने उनकी शिक्षाओं और विचारों को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाया।
बाबा के प्रमुख विदेशी शिष्यों में हार्वर्ड के मनोवैज्ञानिक रिचर्ड अल्पर्ट, जो बाद में राम दास के नाम से प्रसिद्ध हुए, अमेरिकी कीर्तन गायक कृष्ण दास और प्रसिद्ध महामारी विशेषज्ञ डॉ. लैरी ब्रिलियंट शामिल रहे। राम दास की किताब Be Here Now आध्यात्मिकता की तलाश करने वाले लोगों के बीच काफी चर्चित हुई और इसके साथ नीम करौली बाबा का नाम भी पश्चिमी दुनिया में तेजी से जाना गया।
नीम करौली बाबा की कहानी 1960 और 1970 के दशक की उस पश्चिमी आध्यात्मिक लहर से भी जुड़ती है, जब बड़ी संख्या में पश्चिमी युवा भारतीय दर्शन, योग और ध्यान की ओर आकर्षित हो रहे थे। उसी दौर में महर्षि महेश योगी जैसे भारतीय गुरुओं का प्रभाव भी पश्चिम तक पहुंचा था। कैंची धाम से जुड़े विदेशी शिष्यों ने बाबा की आध्यात्मिक विरासत को भारत की सीमाओं से बाहर पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई।
लेकिन बाबा की लोकप्रियता की नई लहर को एक और घटना ने खास तौर पर दुनिया की नजर में ला दिया। 2015 के आसपास कैंची धाम का नाम उस समय फिर चर्चा में आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फेसबुक मुख्यालय में मार्क जुकरबर्ग से मुलाकात हुई। जुकरबर्ग ने अपने जीवन के कठिन दौर का जिक्र करते हुए बताया था कि एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स ने उन्हें भारत आने और कैंची धाम जाने की सलाह दी थी। जॉब्स खुद भी भारत यात्रा के दौरान कैंची धाम आए थे।
इसके बाद कैंची धाम धीरे-धीरे आध्यात्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बनता गया। जिला प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 के पहले छह महीनों में करीब 24.34 लाख लोग कैंची धाम पहुंचे, जबकि इससे पहले के वर्षों में सालभर में लगभग आठ लाख श्रद्धालु यहां आते थे। यानी बाबा के आश्रम की ओर लोगों का आकर्षण कितनी तेजी से बढ़ रहा है, इसका अंदाजा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है।
फिर 2022 में क्रिकेट और फिल्म जगत की चर्चित जोड़ी विराट कोहली और अनुष्का शर्मा अपनी बेटी के साथ कैंची धाम और वृंदावन स्थित बाबा के आश्रम पहुंची। उनकी तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कैंची धाम को लेकर युवाओं की दिलचस्पी और बढ़ी।
अब एक तरफ श्रद्धालु हैं, जो बाबा को अपनी आस्था और आध्यात्मिक अनुभव का हिस्सा मानते हैं। दूसरी तरफ ऐसे युवा भी हैं, जो सोशल मीडिया के जरिए कैंची धाम के बारे में जानकर पहली बार यहां पहुंच रहे हैं। लेकिन भीड़ के बीच भी इस जगह की सबसे खास चीज शायद वही है जो दशकों से चली आ रही है—आरती की घंटियां, पहाड़ों की शांति और हजारों लोगों की एक साथ उठती आवाज—“सीताराम… सीताराम…”
शायद यही नीम करौली बाबा की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू है—बाबा नहीं हैं, लेकिन उनके दरबार में आस्था की कतार लगातार लंबी होती जा रही है।



