ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 12 जून 2026
23 वर्षीय आदित्य शर्मा की मौत ने सोशल मीडिया पर एक दर्दनाक बहस को जन्म दे दिया है। वायरल पोस्टों के अनुसार, आदित्य उस भारतीय जहाज़ के नाविक थे जो पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संघर्ष की चपेट में आया। इसी बीच सोशल मीडिया पर उनके पिता राजेश शर्मा के पुराने पोस्ट भी चर्चा में आ गए हैं, जिनमें गाज़ा के खिलाफ कठोर सैन्य कार्रवाई का समर्थन और पूरे क्षेत्र को “गैर-मुस्लिम टेरिटरी” बनाने जैसी बातें कही गई थीं। अब बेटे की मौत के बाद परिवार न्याय और जवाबदेही की मांग कर रहा है। सोशल मीडिया पर कई लोग इसे इतिहास की एक कड़वी विडंबना के रूप में देख रहे हैं।
युद्ध के दिनों में सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा बिकने वाली चीज़ होती है आक्रोश। कोई बमबारी का समर्थन करता है, कोई पूरे शहर को मिटा देने की बात करता है, कोई किसी आबादी को हटाने का सुझाव देता है और कोई युद्ध को अंतिम समाधान बताता है। लेकिन इतिहास बार-बार साबित करता है कि युद्ध कभी किसी का स्थायी मित्र नहीं होता। वह अंततः इंसानों को ही निगलता है।
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने देखा है कि किस तरह सोशल मीडिया ने युद्धों को भी वैचारिक खेमों में बांट दिया। लोग मानो किसी खेल प्रतियोगिता की तरह युद्धों में पक्ष चुनने लगे। किसी के लिए इजराइल सही है, किसी के लिए फिलिस्तीन; किसी के लिए अमेरिका सही है, किसी के लिए ईरान। लेकिन इस शोर-शराबे के बीच सबसे बड़ी सच्चाई अक्सर छूट जाती है—युद्ध में मरने वाला इंसान किसी विचारधारा का नहीं, किसी परिवार का सदस्य होता है।
सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बने पुराने पोस्टों में गाज़ा को “गैर-मुस्लिम क्षेत्र” बनाने और वहां की आबादी को हटाने जैसे विचार व्यक्त किए गए थे। ऐसे विचार केवल राजनीतिक बयान नहीं होते, बल्कि वे उस मानसिकता को दर्शाते हैं जिसमें इंसानों को उनकी पहचान के आधार पर बांटकर देखा जाता है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी समाज ने किसी समुदाय को सामूहिक रूप से दोषी ठहराने या हटाने की सोच को स्वीकार किया है, उसका परिणाम केवल हिंसा और त्रासदी के रूप में सामने आया है।
आज जब पश्चिम एशिया का संघर्ष समुद्रों तक फैल चुका है और व्यापारिक जहाज़, नाविक तथा आम नागरिक भी इसकी चपेट में आ रहे हैं, तब यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि युद्ध का वास्तविक शिकार कौन है? क्या वे नेता जो फैसले लेते हैं? क्या वे रणनीतिकार जो नक्शों पर सीमाएं बनाते और मिटाते हैं? या वे आम लोग जो रोज़ी-रोटी कमाने के लिए घर से हजारों किलोमीटर दूर काम कर रहे होते हैं?
वास्तविकता यह है कि युद्ध की कीमत हमेशा आम लोग चुकाते हैं। गाज़ा में मरने वाला बच्चा हो, तेल अवीव में मारा गया नागरिक हो, तेहरान में घायल हुआ युवक हो या समुद्र में जान गंवाने वाला भारतीय नाविक—हर मौत के पीछे एक परिवार, एक सपना और एक अधूरी कहानी होती है।
युद्ध समर्थक राजनीति की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह इंसानों को आंकड़ों में बदल देती है। मौतों को संख्या में गिना जाता है, तबाह शहरों को रणनीतिक सफलता कहा जाता है और मानवीय पीड़ा को राजनीतिक बहस का हिस्सा बना दिया जाता है। लेकिन जब वही त्रासदी किसी अपने तक पहुंचती है, तब सारी राजनीतिक बहसें अचानक अर्थहीन लगने लगती हैं।
शायद यही वजह है कि सोशल मीडिया पर इस पूरे घटनाक्रम को लेकर इतनी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। लोग कह रहे हैं कि युद्ध की आग जब दूर जलती है तो उसकी गर्मी महसूस नहीं होती, लेकिन जब उसकी चिंगारी अपने आंगन में गिरती है तो दृष्टिकोण बदल जाता है। तब नारे पीछे छूट जाते हैं और केवल एक पिता का दुख दिखाई देता है।
इस पूरे विवाद से सबसे बड़ा सबक यही निकलता है कि किसी भी संघर्ष को धर्म, जाति या पहचान के चश्मे से देखने के बजाय इंसानियत के नजरिए से देखा जाए। क्योंकि मिसाइलें यह नहीं पूछतीं कि कौन किस धर्म का है, कौन किस विचारधारा का समर्थक है और किसने सोशल मीडिया पर क्या लिखा था। युद्ध केवल विनाश करता है।
सभ्य समाजों की पहचान इसी बात से होती है कि वे नफरत और बदले की राजनीति के बजाय शांति, संवाद और मानव जीवन के सम्मान को प्राथमिकता दें। क्योंकि अंततः युद्ध में जीतने वाले भी बहुत कुछ हारते हैं और हारने वाले भी। और जब युद्ध की राजनीति घर तक पहुंच जाती है, तब विचारधाराओं की सारी बहसों के बीच केवल इंसानी दर्द बचता है।




