ओपिनियन | शकील अख़्तर, वरिष्ठ पत्रकार | ABC NATIONAL NEWS | 15 जून 2026
राहुल गांधी के बारे में लंबे समय तक यह धारणा बनाई जाती रही कि वे आदर्शों की बात तो करते हैं, लेकिन राजनीति की व्यावहारिक भाषा नहीं समझते। उन पर आरोप लगाया जाता था कि वे जनता की भावनाओं से अधिक सिद्धांतों की राजनीति करते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। उनका आदर्शवाद अपनी जगह कायम है, मगर अब वे राजनीति की वही भाषा भी बोलने लगे हैं जिसे आम लोग समझते हैं और अपने जीवन से जोड़कर देखते हैं।
इंडिया गठबंधन की हालिया बैठक में राहुल गांधी का भाषण इसी बदलाव का संकेत देता है। उन्होंने कहा कि विपक्ष 2029 का चुनाव पहले ही जीत चुका है। यह केवल चुनावी दावा नहीं था, बल्कि कार्यकर्ताओं और समर्थकों में आत्मविश्वास भरने का प्रयास भी था। राजनीति केवल तथ्यों और आंकड़ों से नहीं चलती, उसमें मनोविज्ञान और उम्मीद की भी बड़ी भूमिका होती है। राहुल अब इस बात को समझते दिखाई दे रहे हैं।
इसी तरह जब वे कहते हैं कि “कॉम्प्रोमाइज्ड प्रधानमंत्री के राज में भारतीय होने का मतलब दुर्गति है”, तो यह केवल एक राजनीतिक हमला नहीं रह जाता। ओमान तट के पास भारतीय नाविकों की मौत, विदेश नीति को लेकर उठ रहे सवाल और आम नागरिकों की सुरक्षा की चिंता—इन सबको जोड़कर राहुल एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं जिसे जनता आसानी से समझ सके।
राहुल गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत यह रही है कि वे मुद्दों को केवल संसद तक सीमित नहीं रखते। भारत जोड़ो यात्रा से लेकर छात्र, किसान, बेरोजगार युवा और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को लगातार उठाने की कोशिश करते रहे हैं। कई बार उनकी भाषा अत्यधिक आदर्शवादी लगती थी, लेकिन अब उसमें राजनीतिक धार भी दिखाई दे रही है।
इसका सबसे ताजा उदाहरण कोटा का कार्यक्रम है। 17 जून को राहुल गांधी कोटा में छात्रों के बीच होंगे। यह कोई साधारण राजनीतिक सभा नहीं है। कोटा आज केवल एक शहर नहीं, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं, छात्र तनाव और युवा आकांक्षाओं का प्रतीक बन चुका है। नीट, सीयूईटी, भर्ती परीक्षाओं और रोजगार के सवालों के बीच छात्र पहली बार किसी बड़े राष्ट्रीय नेता को सीधे अपनी बात कहने का अवसर पा रहे हैं।
संभव है कि हजारों छात्र वहां केवल भाषण सुनने न आएं, बल्कि अपनी परेशानियां बताने आएं। यही वह राजनीति है जो राहुल गांधी पिछले कुछ समय से करने की कोशिश कर रहे हैं—जनता के बीच जाकर संवाद की राजनीति।
राजनीति में केवल सही होना काफी नहीं होता, जनता को यह महसूस भी होना चाहिए कि कोई उनकी बात सुन रहा है। राहुल गांधी की चुनौती भी यही रही है। लेकिन अब लगता है कि वे केवल वैचारिक बहस नहीं कर रहे, बल्कि जनता की भाषा में जनता के मुद्दे उठाने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या इससे 2029 का चुनाव वास्तव में प्रभावित होगा? इसका जवाब भविष्य देगा। लेकिन इतना जरूर है कि राहुल गांधी अब केवल आदर्शवाद की राजनीति नहीं कर रहे। वे राजनीतिक संदेश को अधिक स्पष्ट, अधिक आक्रामक और अधिक जनसामान्य की समझ के अनुरूप बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
यही कारण है कि उनके समर्थकों में उत्साह बढ़ रहा है और विरोधी भी उनके बयानों का जवाब देने को मजबूर हो रहे हैं। लोकतंत्र में किसी नेता की सबसे बड़ी सफलता यही होती है कि वह बहस का केंद्र बन जाए। फिलहाल राहुल गांधी उस दिशा में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।




