राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | हैदराबाद/नई दिल्ली | 2 नवंबर 2026
देश की मतदाता सूची से करोड़ों नाम हटाए जाने का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। विपक्ष चुनाव आयोग से बार-बार सवाल पूछ रहा है कि आखिर 13.39 करोड़ नाम हटाने के पीछे क्या आधार था? कितने नाम मृत मतदाताओं के थे, कितने लोग दूसरी जगह चले गए, कितने डुप्लीकेट थे और कितने वास्तविक मतदाताओं के नाम काट दिए गए? लेकिन इन सवालों का स्पष्ट जवाब देने के बजाय बीजेपी नेता राजनीतिक बयानबाजी में व्यस्त हैं। अब गृह मंत्री अमित शाह ने हैदराबाद की रैली में नया दावा कर दिया कि हटाए गए तीन करोड़ नाम बांग्लादेशी घुसपैठियों के थे।
13.39 करोड़ का हिसाब मांगो तो तीन करोड़ घुसपैठियों की कहानी!
अमित शाह ने सोमवार को हैदराबाद में कहा कि SIR के दौरान हटाए गए करीब तीन करोड़ नाम ऐसे लोगों के थे, जो बांग्लादेशी घुसपैठिए थे और वास्तव में मौजूद ही नहीं थे। उन्होंने राहुल गांधी पर आरोप लगाया कि वे घुसपैठियों के वोट बचाने की राजनीति कर रहे हैं।
शाह ने हटाए गए नामों का जो ब्योरा दिया, उसके मुताबिक करीब 6.15 करोड़ लोग दूसरी जगह चले गए थे, 2.8 से 3 करोड़ लोगों की मृत्यु हो चुकी थी और लगभग एक करोड़ नाम डुप्लीकेट मतदाताओं के थे। इसके अलावा उन्होंने तीन करोड़ लोगों को घुसपैठिया बताया।
लेकिन सवाल यह है कि इन दावों का आधिकारिक और प्रमाणित आधार क्या है? क्या निर्वाचन आयोग ने राज्यवार और श्रेणीवार पूरा ब्योरा सार्वजनिक किया है? जिन तीन करोड़ लोगों को घुसपैठिया बताया जा रहा है, उनकी पहचान किस प्रक्रिया से हुई? क्या आयोग के पास इसका सत्यापित रिकॉर्ड है?
बीजेपी नेताओं से सवाल क्यों नहीं पूछे जा रहे?
विपक्ष लगातार निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है। सवाल केवल नाम हटाने का नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि किसी पात्र भारतीय नागरिक का वोट गलत तरीके से न काट दिया गया हो।
अगर करोड़ों नाम मृत्यु, स्थानांतरण और डुप्लीकेशन के कारण हटाए गए हैं तो उनका पूरा हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। और अगर तीन करोड़ नाम घुसपैठियों के थे तो उनके सत्यापन की प्रक्रिया और दस्तावेज भी सामने आने चाहिए।
लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी है, लेकिन किसी नागरिक को बिना पारदर्शी प्रक्रिया के मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। राजनीतिक मंच से आरोप लगा देना इस संवैधानिक जिम्मेदारी का जवाब नहीं है।
सवाल चुनाव आयोग से है, जवाब राहुल गांधी को चुनौती देकर क्यों?
अमित शाह ने राहुल गांधी को SIR, घुसपैठियों और EVM के मुद्दे पर संसद का विशेष सत्र बुलाकर बहस करने की चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि सरकार चर्चा के लिए तैयार है और राहुल गांधी बहस से बचेंगे।
लेकिन गृह मंत्री जी, सवाल तो चुनाव आयोग से है। संसद में बहस की चुनौती अपनी जगह है, मगर आयोग को यह बताना ही होगा कि कितने नाम किस आधार पर हटाए गए। विपक्ष के सवालों का जवाब देने के बजाय उसे घुसपैठियों का समर्थक बताना क्या मूल मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश नहीं है?
शाह ने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की जीत का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि उन चुनावों में SIR नहीं हुआ था और मोदी भारतीय मतदाताओं के वोट से प्रधानमंत्री बने। लेकिन पहले के चुनावों में जीत का हवाला देने से आज मतदाता सूची में नाम हटाए जाने का विवाद खत्म नहीं हो जाता।
निर्वाचन आयोग की चुप्पी पर जवाबदेही तय हो
इस पूरे विवाद में निर्वाचन आयोग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था को राजनीतिक आरोपों के बीच चुप्पी साधने के बजाय तथ्यों के साथ सामने आना चाहिए।
आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि 13.39 करोड़ नाम हटाए जाने का आंकड़ा किस अवधि और किन राज्यों से संबंधित है। मृत्यु, स्थानांतरण, डुप्लीकेट और कथित विदेशी नागरिकों की श्रेणियों में कितने नाम हटाए गए? कितने लोगों ने आपत्ति दर्ज कराई और कितने पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़े गए?
यह भी साफ होना चाहिए कि नाम हटाने से पहले संबंधित नागरिकों को सूचना और अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया या नहीं।
वोट किसी पार्टी की जागीर नहीं
बीजेपी नेता विपक्ष पर आरोप लगा रहे हैं, गृह मंत्री रैली में चुनौती दे रहे हैं और राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज हो रही है। लेकिन देश के मतदाता को भाषण नहीं, अपने वोट की सुरक्षा चाहिए।
13.39 करोड़ नामों को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब प्रमाणित आंकड़ों से मिलना चाहिए। अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ है तो निर्वाचन आयोग पूरा ब्योरा सार्वजनिक करे। और अगर किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटाया गया है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
चुनाव आयोग से सवाल लगातार पूछे जा रहे हैं, लेकिन बीजेपी नेता ‘छम्मक छल्लो’ बने हुए हैं। लोकतंत्र में सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है और उनका जवाब देना संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारी। आखिर मतदाता अपने वोट का हिसाब किससे मांगे—चुनाव आयोग से या राजनीतिक रैलियों में भाषण देने वाले नेताओं से?



