राष्ट्रीय/नई दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | 10 अगस्त 2026
नई दिल्ली। देश में सामाजिक दूरी, अविश्वास और नफरत की घटनाओं के बीच मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने दिल्ली के राजघाट से ‘आओ जड़ों से जुड़ें’ अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने का संदेश दिया। गांधी स्मृति दर्शन में आयोजित सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि भारत में रहने वाले लोगों की धार्मिक आस्था, पूजा-पद्धति, भाषा और परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन देश, नागरिकता और साझा विरासत उन्हें एक-दूसरे से जोड़ती है। कार्यक्रम में बार-बार इस बात पर जोर दिया गया कि समाज को बांटने वाली सोच का मुकाबला राजनीतिक टकराव से नहीं, बल्कि संवाद, आपसी सम्मान और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करके किया जाना चाहिए। सम्मेलन में सामाजिक, शैक्षणिक और धार्मिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने देश में भाईचारा मजबूत करने और भारतीय पहचान को साझा आधार बनाने का आह्वान किया।

इंद्रेश कुमार का संदेश—धर्म अलग हो सकता है, वतन नहीं
कार्यक्रम की अध्यक्षता मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक और वरिष्ठ संघ नेता इंद्रेश कुमार ने की। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का धर्म उसकी आस्था और विश्वास का विषय है और पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन इससे उसकी भारतीय पहचान समाप्त नहीं होती। उन्होंने लोगों से अपनी जड़ों, इतिहास और पूर्वजों के बारे में जानने की अपील करते हुए कहा कि समाज को उन चीजों पर ध्यान देना चाहिए जो लोगों को जोड़ती हैं, न कि उन मुद्दों को बढ़ावा देना चाहिए जो दूरी पैदा करते हैं। इंद्रेश कुमार ने भारतीयता को व्यवहार और जिम्मेदारी से जोड़ते हुए कहा कि देश में रहने वाले लोगों को अपनी साझा विरासत को समझना चाहिए और यह भावना मजबूत करनी चाहिए कि “हम हिंदुस्तानी थे, हैं और रहेंगे।”
उन्होंने कहा कि भारत को नफरत, हिंसा, भेदभाव, अशिक्षा और बेरोजगारी जैसी चुनौतियों से बाहर निकालने के लिए समाज में संवाद और सहयोग बढ़ाना होगा। उनके मुताबिक ‘जड़ों से जुड़ें’ अभियान का उद्देश्य लोगों को अपनी पारिवारिक और सामाजिक विरासत को समझने के साथ-साथ दूसरे समुदायों की पहचान और आस्था का सम्मान करने के लिए प्रेरित करना है।
‘शिजरा जानिए, अपनी कहानी समझिए’
इंद्रेश कुमार ने अभियान में शिजरा यानी वंशावली और पारिवारिक इतिहास को जानने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति जब अपने परिवार, पूर्वजों और अपनी मिट्टी से जुड़े इतिहास को समझता है तो उसके भीतर समाज और देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना मजबूत होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपनी जड़ों को जानने का अर्थ किसी दूसरे धर्म या समुदाय से दूरी बनाना नहीं है। इसका उद्देश्य अपनी विरासत को समझना और देश के प्रति जुड़ाव को मजबूत करना है।
उन्होंने यह भी कहा कि अभियान को किसी धर्मांतरण या धार्मिक पहचान बदलने के प्रयास के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना था कि अलग-अलग धार्मिक पहचान के बावजूद लोग एक साझा राष्ट्रीय पहचान के साथ आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने ‘हर घर तिरंगा’ और ‘घर-घर तिरंगा’ जैसे अभियानों में भी लोगों की भागीदारी की अपील करते हुए कहा कि तिरंगा पूरे देश की साझा पहचान और सम्मान का प्रतीक है।
डॉ. शाहिद अख्तर—‘एक कौम, एक वतन—हिंदुस्तान’
सम्मेलन में NCMEI के ऑफिशिएटिंग चेयरमैन डॉ. शाहिद अख्तर ने भारतीय मुसलमानों की राष्ट्रीय पहचान और साझा विरासत को लेकर जोरदार संदेश दिया। उन्होंने कहा, “एक कौम, एक वतन—हिंदुस्तान। हमारे पूर्वज सब एक थे। हम भारतीय थे, भारतीय हैं और भारतीय रहेंगे।”
डॉ. शाहिद अख्तर ने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता और साझा संस्कृति से बनी है। अलग-अलग धर्मों और परंपराओं के बावजूद भारतीय समाज के लोगों के बीच सदियों से सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। ऐसे समय में जब नफरत और अविश्वास समाज में दूरी पैदा करते हैं, जरूरत इस बात की है कि इंसानियत, एकता और अखंडता की आवाज को मजबूत किया जाए।
उन्होंने कहा कि अपनी जड़ों और पूर्वजों को पहचानना, अपनी मिट्टी और अपने वतन से जुड़ना एक जिम्मेदार नागरिक की पहचान है। धार्मिक या सामाजिक पहचान अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय एकता का साझा आधार सभी भारतीयों को जोड़ता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपनी जड़ों को समझता है, वह अपने समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी बेहतर ढंग से समझ सकता है। उनका संदेश था—“हमारी पहचान एक है, हमारा वतन एक है और सबसे पहले हम हिंदुस्तानी हैं।”
डॉ. ताहिर हुसैन—‘तोड़ने वाली ताकतों के खिलाफ खड़ा होना होगा’
‘आओ जड़ों से जुड़ें’ अभियान के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. ताहिर हुसैन ने कहा कि यह पहल किसी एक धर्म, समुदाय या वर्ग तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य भारतीय समाज के अलग-अलग हिस्सों के बीच संवाद और विश्वास को बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि समाज को कमजोर करने वाली सोच लोगों को धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करती है। ऐसी सोच का मुकाबला तभी किया जा सकता है जब लोग एक-दूसरे को समझें और संवाद का रास्ता खुला रखें।
उन्होंने युवाओं से सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों और नफरत भरी सामग्री से सावधान रहने की अपील की। उनका कहना था कि युवाओं को तथ्यों और संवाद के आधार पर समाज को आगे ले जाने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
डॉ. शालिनी अली—‘जड़ों की पहचान से बढ़ेगा भरोसा’
अभियान की राष्ट्रीय संयोजक डॉ. शालिनी अली ने कहा कि भारत की विविधता उसकी कमजोरी नहीं बल्कि ताकत है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समुदायों के लोग जब एक-दूसरे के इतिहास, संस्कृति और परंपराओं को समझते हैं तो गलतफहमियां कम होती हैं और सामाजिक विश्वास बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि सामाजिक शांति केवल कानून और प्रशासन के भरोसे कायम नहीं रह सकती। परिवार, स्कूल, समुदाय और सामाजिक संगठनों को भी संवाद की संस्कृति मजबूत करनी होगी। भारतीयता को उन्होंने ऐसा साझा आधार बताया जो अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान वाले लोगों को एक साथ खड़ा कर सकता है।
प्रो. माहरुख मिर्जा—‘मुसीबत में इंसान देखें, पहचान नहीं’
ख्वाजा गरीब नवाज यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर प्रो. माहरुख मिर्जा ने अपने संबोधन में इंसानियत को सबसे ऊपर रखने की बात कही। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को संकट में देखकर सबसे पहले उसकी जाति या धर्म नहीं, बल्कि उसकी इंसानी जरूरत देखी जानी चाहिए। भारतीय समाज की ताकत इसी में है कि अलग-अलग मान्यताओं वाले लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में खड़े हो सकते हैं।
उन्होंने साझा मानव विरासत और इंसानियत की भावना को मजबूत करने की जरूरत बताई और कहा कि यदि समाज एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आए तो नफरत फैलाने वाली ताकतों की जमीन कमजोर होगी।
‘जड़ों से जुड़ना’ का मतलब किसी से दूरी बनाना नहीं
सम्मेलन में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि अपनी जड़ों को जानने का अर्थ किसी दूसरे समुदाय से दूरी बनाना या उसकी धार्मिक पहचान पर सवाल उठाना नहीं है। इसका अर्थ अपने परिवार, पूर्वजों, संस्कृति और इतिहास को समझना है, साथ ही दूसरे व्यक्ति की पहचान और आस्था का सम्मान करना भी है।
वक्ताओं ने कहा कि भारत में अनेक धर्म, भाषाएं, जातियां और परंपराएं साथ-साथ मौजूद हैं। इसलिए अभियान का संदेश दीवार खड़ी करने के बजाय पुल बनाने का होना चाहिए। अपनी पहचान को समझने वाला व्यक्ति यदि दूसरे की पहचान का सम्मान करता है तो समाज में टकराव के बजाय संवाद और अविश्वास के बजाय भरोसे की जमीन तैयार होती है।
नफरत के साथ बेरोजगारी और भेदभाव के खिलाफ भी लड़ाई
सम्मेलन में सामाजिक समस्याओं का दायरा सांप्रदायिक तनाव तक सीमित नहीं रखा गया। वक्ताओं ने अशिक्षा, बेरोजगारी, भेदभाव और सामाजिक असमानता को भी समाज के सामने बड़ी चुनौतियां बताया। उनका कहना था कि भाईचारा तभी मजबूत होगा जब हर वर्ग को शिक्षा, सम्मान और अवसर मिलेंगे।
वक्ताओं ने कहा कि नफरत का मुकाबला केवल भाषणों से नहीं किया जा सकता। इसके लिए जमीन पर ऐसे प्रयास करने होंगे जिनसे लोगों के बीच भरोसा बढ़े और समाज के कमजोर वर्गों को आगे बढ़ने का अवसर मिले।
राजघाट से संदेश—पहचान अलग हो सकती है, भारत साझा है
कार्यक्रम में स्वामी दिनेशानंद महाराज, मंच के राष्ट्रीय संयोजक मोहम्मद अफजल, तुषारकांत हिन्दुस्थानी, गिरीश जूआल, मौलाना जुरूदिन, प्रो. आसिफ मलिक, एडवोकेट गुलाम साहब, प्रो. गीता सिंह, मेजर जनरल जावेद, प्रो. मेरी और मूसा खान सनातनी मुसलमान सहित कई वक्ताओं ने भी सामाजिक एकता और भाईचारे को मजबूत करने की जरूरत बताई।
राजघाट से ‘आओ जड़ों से जुड़ें’ अभियान ने जिस संदेश के साथ राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया, उसका सार यही रहा कि धार्मिक आस्था अलग हो सकती है, पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन देश और नागरिक पहचान साझा है। सम्मेलन में कहा गया कि नफरत का जवाब नफरत से नहीं, बल्कि संवाद, सम्मान और भाईचारे से दिया जाना चाहिए।
‘जड़ों से जुड़ें’ अभियान के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि यह संदेश मंचों और नारों से निकलकर परिवारों, युवाओं, शिक्षण संस्थानों और समाज के बीच वास्तविक संवाद में कितना बदल पाता है। अगर अपनी जड़ों को जानने की पहल लोगों को एक-दूसरे के और करीब लाती है, तो यह सामाजिक विश्वास और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।




