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मोदी का ‘वोकल फॉर लोकल’: जनता को नसीहत, विदेशी ब्रांडों और सरकारी ठेकों पर सवाल!

दीपावली पर स्वदेशी खरीदने की अपील, लेकिन सवाल यह कि प्रधानमंत्री खुद कितनी स्वदेशी मिसाल पेश करते हैं और हजारों करोड़ के सरकारी ठेकों में भारतीय कंपनियों को कितनी प्राथमिकता मिलती है?

राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 अक्टूबर 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 अक्टूबर को ‘मन की बात’ में दीपावली और छठ से पहले देशवासियों से स्वदेशी उत्पाद खरीदने की अपील की। उन्होंने जैविक खेती, भारतीय उत्पादों, खादी, वैज्ञानिक शोध, डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की सराहना की। महाराष्ट्र के ‘शबरी नेचुरल्स’ को जापान का गुड डिजाइन अवॉर्ड मिलने और कर्नाटक के एक स्टार्टअप द्वारा बांस तथा कृषि अपशिष्ट से पैकेजिंग सामग्री तैयार करने का भी जिक्र किया।

स्थानीय उद्योगों, कारीगरों और छोटे कारोबारियों को बढ़ावा देना जरूरी है। लेकिन प्रधानमंत्री की इस अपील के साथ एक बड़ा सवाल भी उठता है—क्या स्वदेशी अपनाने की जिम्मेदारी सिर्फ आम जनता की है, या प्रधानमंत्री और सरकार को भी अपने व्यवहार, खर्च और नीतियों में इसकी मिसाल पेश करनी चाहिए?

दीपावली पर जनता को संदेश, सरकार की जिम्मेदारी क्या?

आम आदमी बाजार में सामान खरीदते समय अपनी जेब, कीमत और जरूरत देखता है। उसे सस्ता, टिकाऊ और उपयोगी सामान चाहिए। प्रधानमंत्री जब भारतीय उत्पाद खरीदने की अपील करते हैं, तो इसके पीछे स्थानीय रोजगार और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने का तर्क होता है।

लेकिन स्वदेशी को केवल त्योहारों के आसपास चलने वाला अभियान बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। यदि स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना राष्ट्रीय आर्थिक नीति का हिस्सा है, तो यही प्राथमिकता सरकारी खरीद, बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं, तकनीकी सेवाओं और बड़े सार्वजनिक ठेकों में भी दिखाई देनी चाहिए।

सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ के तहत 2017 में सरकारी खरीद में स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को प्राथमिकता देने की नीति बनाई थी। बाद में इसमें संशोधन भी किए गए। इस नीति का उद्देश्य भारत में उत्पादन, रोजगार और घरेलू मूल्यवर्धन को बढ़ावा देना है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि जनता क्या खरीदती है, बल्कि यह भी है कि सरकार अपने खर्च से भारतीय उद्योगों को कितना मजबूत करती है।

हजारों करोड़ के ठेकों में स्वदेशी की कसौटी

भारत सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बड़े पैमाने पर सामान, तकनीक, सेवाएं और निर्माण कार्य खरीदती हैं। इन परियोजनाओं में विदेशी कंपनियां भी शामिल होती हैं। हर विदेशी कंपनी को दिया गया ठेका स्वदेशी नीति के खिलाफ नहीं है। कई क्षेत्रों में विशेष तकनीक, उपकरण या घरेलू उत्पादन क्षमता की कमी के कारण विदेशी कंपनियों की जरूरत पड़ सकती है।

लेकिन जहां भारतीय कंपनियां गुणवत्ता, कीमत और तकनीक के मामले में प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं, वहां उन्हें कितनी प्राथमिकता मिलती है? क्या सरकारी निविदाओं की शर्तें भारतीय कंपनियों और छोटे कारोबारियों की भागीदारी के अनुकूल हैं? स्थानीय सामग्री के इस्तेमाल की शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं? और सरकारी खरीद में भारतीय उत्पादन की हिस्सेदारी के आंकड़े कितने पारदर्शी हैं?

सरकार को इन सवालों के जवाब आंकड़ों के साथ देने चाहिए। बड़े ठेकों में भारतीय कंपनियों की भागीदारी, घरेलू सामग्री का प्रतिशत और विदेशी कंपनियों को चुनने के कारण सार्वजनिक किए जाने चाहिए। इससे यह स्पष्ट होगा कि आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य सरकारी खरीद में कितना आगे बढ़ा है।

मोदी के पहनावे और विदेशी ब्रांडों पर सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सूट, चश्मे, कलम, घड़ी और जूतों को लेकर भी समय-समय पर सार्वजनिक बहस होती रही है। उनके पहनावे में विदेशी ब्रांडों के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए जाते हैं। लेकिन किसी खास वस्तु का ब्रांड और उसका निर्माण-स्थान प्रमाणित किए बिना यह दावा करना सही नहीं होगा कि प्रधानमंत्री की सभी निजी वस्तुएं विदेशी हैं। विदेशी ब्रांड का उत्पाद भारत में भी बन सकता है और भारतीय ब्रांड के सामान में आयातित सामग्री भी हो सकती है।

फिर भी मूल सवाल अपनी जगह कायम है। जब प्रधानमंत्री देशवासियों से स्वदेशी अपनाने की अपील करते हैं, तो उनके अपने आधिकारिक खर्च और सरकार की खरीद में भारतीय उत्पादों को बढ़ावा देने की नीति कितनी स्पष्ट है? क्या प्रधानमंत्री कार्यालय और सरकारी आयोजनों में स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देने के आंकड़े सार्वजनिक किए जा सकते हैं?

स्वदेशी केवल भाषण नहीं, आर्थिक नीति हो

भारतीय उत्पाद खरीदने से छोटे कारोबारियों, कारीगरों और घरेलू विनिर्माताओं को फायदा मिल सकता है। लेकिन इसके लिए केवल अपील पर्याप्त नहीं है। भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता सुधारना, उनकी कीमत प्रतिस्पर्धी बनाना, छोटे कारोबारियों को कर्ज उपलब्ध कराना और उन्हें बड़े बाजारों तक पहुंचाना भी सरकार की जिम्मेदारी है।

यदि स्थानीय उत्पाद महंगे हों, उनकी गुणवत्ता कमजोर हो या उन्हें बाजार तक पहुंचने में कठिनाई हो, तो केवल भावनात्मक अपील से स्थायी बदलाव नहीं आएगा। स्वदेशी को मजबूत करने के लिए उद्योगों को व्यावहारिक सहायता और सरकारी खरीद में निष्पक्ष अवसर देने होंगे।

जनता से पहले सत्ता को जवाब देना होगा

प्रधानमंत्री की ‘वोकल फॉर लोकल’ अपील का मूल्यांकन उसके परिणामों से होना चाहिए। देशवासियों से स्वदेशी खरीदने की अपेक्षा करने के साथ सरकार को यह भी बताना चाहिए कि भारतीय उद्योगों को कितने अवसर मिले, स्थानीय रोजगार कितना बढ़ा और सरकारी खरीद में घरेलू उत्पादन की हिस्सेदारी कितनी रही।

दीपावली पर स्वदेशी खरीदने का संदेश देना आसान है। असली चुनौती ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें भारतीय कारीगरों, छोटे कारोबारियों और कंपनियों को पूरे साल अवसर मिलें।

स्वदेशी का असली इम्तिहान केवल जनता की खरीदारी नहीं, सरकार की नीतियां, सरकारी ठेकों की पारदर्शिता और सत्ता के अपने फैसले भी हैं।

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