राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 6 अगस्त 2026
NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर 26 दिनों तक भूख हड़ताल करने वाले पर्यावरण एवं शिक्षा कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के दो वरिष्ठ नेताओं पर उनसे किया गया वादा तोड़ने का गंभीर आरोप लगाया है। वांगचुक का कहना है कि उनके अनशन समाप्त करने के दौरान हुई आधी रात की बैठक की तस्वीरें सार्वजनिक नहीं करने पर स्पष्ट सहमति बनी थी, लेकिन इसके बावजूद तस्वीरें जारी कर दी गईं। इस घटनाक्रम से वह राजनीतिक नेतृत्व के रवैये से बेहद निराश हुए।
वांगचुक ने बुधवार को एक टीवी इंटरव्यू में दावा किया कि केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के साथ उनकी बातचीत के दौरान यह स्पष्ट समझ बनी थी कि उनके 26 दिन के उपवास को समाप्त करने वाली बैठक की तस्वीरें तब तक सार्वजनिक नहीं की जाएंगी, जब तक विपक्षी नेताओं और आंदोलनकारी छात्रों के प्रतिनिधियों को भी घोषणा की प्रक्रिया में शामिल नहीं कर लिया जाता।
वांगचुक के मुताबिक बैठक के दौरान मंत्रियों के अपने फोटोग्राफर मौजूद थे और तस्वीरें ली गई थीं। उन्होंने कहा, “मंत्रियों के अपने फोटोग्राफर थे। उन्होंने मुझसे वादा किया था कि वे तस्वीरें जारी नहीं करेंगे। उन्होंने वह वादा तोड़ दिया।”
आधी रात की बैठक और तस्वीरों पर विवाद
यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वांगचुक का 26 दिनों का अनशन NEET पेपर लीक के खिलाफ चले व्यापक छात्र आंदोलन के सबसे चर्चित अध्यायों में शामिल रहा। लंबे उपवास के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल भी ले जाना पड़ा था। बाद में केंद्र की ओर से आंदोलनकारियों की मांगों पर कदम उठाने का भरोसा मिलने के बाद उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया।
लेकिन अब वांगचुक का कहना है कि अनशन समाप्त होने की प्रक्रिया को जिस तरह तस्वीरों के जरिए सार्वजनिक किया गया, वह उस आपसी सहमति के अनुरूप नहीं था जो बैठक में बनी थी।
उनके आरोप का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह तस्वीर खिंचवाने मात्र पर आपत्ति नहीं जता रहे हैं। उनका दावा है कि तस्वीरों को कब और किन परिस्थितियों में सार्वजनिक किया जाएगा, इसे लेकर पहले से स्पष्ट सहमति थी। उनके अनुसार विपक्ष और छात्र प्रतिनिधियों को साथ लिए बिना तस्वीरों को जारी नहीं किया जाना था।
वांगचुक बोले—इस घटना ने राजनीतिक नेताओं से किया निराश
वांगचुक ने इस पूरे घटनाक्रम को केवल तस्वीरों का विवाद नहीं माना। उन्होंने कहा कि इस अनुभव ने उन्हें विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के व्यवहार को लेकर निराश किया है।
उनके बयान से यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या अनशन समाप्त होने की तस्वीरों को सरकार की ओर से राजनीतिक संदेश के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि आंदोलनकारी पक्ष इसे व्यापक सहमति के बाद होने वाली प्रक्रिया मान रहा था।
वांगचुक का आरोप यदि सही है तो विवाद इस बात का नहीं रह जाता कि तस्वीर किसने खींची, बल्कि यह विश्वास और राजनीतिक संवाद का प्रश्न बन जाता है। किसी आंदोलन को समाप्त कराने के लिए सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत में यदि कोई सहमति बनती है, तो उसका पालन दोनों पक्षों से अपेक्षित होता है।
26 दिन का अनशन बना था NEET आंदोलन का बड़ा चेहरा
NEET पेपर लीक को लेकर शुरू हुए आंदोलन के दौरान वांगचुक जंतर-मंतर पर छात्रों और CJP समर्थित प्रदर्शन से जुड़े थे। उनका 26 दिनों तक चला अनशन आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में लाने वाले प्रमुख घटनाक्रमों में रहा।
इस दौरान प्रदर्शनकारी परीक्षा व्यवस्था में सुधार, पेपर लीक के खिलाफ सख्त कार्रवाई और जवाबदेही की मांग उठा रहे थे। आंदोलन के दौरान छात्रों और पुलिस के बीच टकराव तथा 20 जुलाई की कार्रवाई को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए।
अब अनशन समाप्त होने के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ है। आंदोलनकारी युवाओं द्वारा कथित पुलिस ज्यादती के आरोपों के साथ वांगचुक का यह नया दावा सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बने भरोसे पर सवाल खड़ा कर रहा है।
वांगचुक के आरोप पर सरकारी पक्ष भी जरूरी
हालांकि वांगचुक ने जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह पर स्पष्ट रूप से वादा तोड़ने का आरोप लगाया है, लेकिन यह उनका दावा है। तस्वीरों को सार्वजनिक करने को लेकर बैठक में वास्तव में किन शर्तों पर सहमति बनी थी और सरकार या संबंधित मंत्रियों की इस बारे में क्या समझ थी, इस पर उनका पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा।
यदि मंत्रियों की ओर से तस्वीरें जारी नहीं करने का स्पष्ट आश्वासन दिया गया था, जैसा वांगचुक दावा कर रहे हैं, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि फिर तस्वीरें किस निर्णय के तहत सार्वजनिक की गईं। और यदि सरकार इस दावे से असहमत है तो उसे भी यह स्पष्ट करना होगा कि बैठक में तस्वीरों को लेकर वास्तव में क्या तय हुआ था।
फिलहाल वांगचुक का बयान NEET आंदोलन से जुड़े घटनाक्रम में एक नया विवाद जोड़ता है। 26 दिन की भूख हड़ताल खत्म कराने के लिए हुई जिस बातचीत को सरकार और आंदोलनकारियों के बीच भरोसे की शुरुआत माना जा सकता था, अब उसी बातचीत की तस्वीरें भरोसा टूटने के आरोप का कारण बन गई हैं।




