बिजनेस | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 6 अगस्त 2026
देश में चाय की दुकान से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक भुगतान का सबसे आसान जरिया बन चुका UPI क्या अब हमेशा पूरी तरह मुफ्त नहीं रहेगा? केंद्र सरकार की ओर से संसद में पेश Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026 ने इस सवाल को अचानक बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है। विधायी बदलाव के जरिए सरकार के लिए भविष्य में कुछ श्रेणियों के UPI और RuPay लेनदेन पर Merchant Discount Rate (MDR) जैसे शुल्क की अनुमति देने का रास्ता खुल सकता है। फिलहाल सामने आई जानकारी के मुताबिक शुरुआती विचार बड़े मर्चेंट्स और ₹2,000 से अधिक के लेनदेन तक सीमित है, लेकिन प्रस्तावित कानून की भाषा भविष्य में इसका दायरा बढ़ाने की गुंजाइश भी छोड़ती है।
सबसे पहले आम UPI उपयोगकर्ता के लिए स्थिति साफ कर देना जरूरी है—₹2,000 से अधिक का हर UPI भुगतान अभी चार्जेबल नहीं हुआ है। ऐसा कोई सार्वभौमिक शुल्क फिलहाल लागू नहीं किया गया है कि आपने ₹2,001 का भुगतान किया और आपके खाते से तत्काल अतिरिक्त फीस कट गई। जिस व्यवस्था पर विचार की बात सामने आई है, उसमें लगभग ₹1 करोड़ से ₹1.5 करोड़ या उससे अधिक सालाना टर्नओवर वाले चुनिंदा मर्चेंट्स और ₹2,000 से अधिक मूल्य के भुगतान को शामिल किया जा सकता है। अंतिम फैसला सरकार की अधिसूचना और नियमों से ही स्पष्ट होगा।
अरबों ट्रांजैक्शन का सवाल—UPI चलाने की कीमत कौन देगा?
UPI अब केवल भुगतान का एक विकल्प नहीं बल्कि भारत की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है। किराने की दुकान, सब्जी विक्रेता, ऑटो-टैक्सी, पेट्रोल पंप, अस्पताल, रेस्तरां, ई-कॉमर्स, सुपरमार्केट और बड़े रिटेल स्टोर—हर जगह QR कोड के जरिए भुगतान सामान्य हो चुका है। जुलाई में ही करीब 23.7 अरब UPI भुगतान होने और इनकी कुल कीमत लगभग ₹29.9 लाख करोड़ रहने के आंकड़े सामने आए हैं।
इतने विशाल डिजिटल नेटवर्क को चलाने, सुरक्षित रखने, ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने और लगातार तकनीकी रूप से अपग्रेड करने में पैसा खर्च होता है। अब विवाद इसी बात पर है कि यह खर्च आखिर कौन उठाए—सरकार, RBI, बैंक, पेमेंट कंपनियां, व्यापारी या अंततः ग्राहक?
RBI गवर्नर बोले—‘किसी न किसी को लागत चुकानी होगी’
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी इस बहस के बीच स्पष्ट किया कि UPI लेनदेन की एक लागत है और उसे आखिरकार “किसी न किसी को चुकाना होगा।” वर्तमान व्यवस्था में इसका खर्च बैंकों, National Payments Corporation of India और वित्तीय तंत्र के अन्य हिस्सों द्वारा वहन किया जा रहा है।
गवर्नर का कहना है कि देश के इस सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार मजबूत करने और इसमें निवेश जारी रखने के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होगी। इसके लिए MDR हो या लागत की भरपाई का कोई दूसरा तरीका, व्यवस्था को टिकाऊ बनाए रखने के लिए पैसा कहीं न कहीं से आना ही है।
यानी UPI भले ग्राहक को स्क्रीन पर ‘फ्री’ दिखाई देता रहा हो, लेकिन उसके पीछे चलने वाली तकनीक, बैंकिंग नेटवर्क, सर्वर, सुरक्षा, सेटलमेंट और भुगतान इंफ्रास्ट्रक्चर मुफ्त नहीं हैं।
फिर बड़ा सवाल—क्या RBI खुद उठा सकता है पूरा खर्च?
इसी के साथ एक महत्वपूर्ण आर्थिक सवाल खड़ा हो गया है। उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों की तुलना से संकेत मिलता है कि RBI के पास इतना बड़ा वार्षिक सरप्लस है कि UPI नेटवर्क की अनुमानित परिचालन लागत का भुगतान व्यापारियों या ग्राहकों पर नया शुल्क लगाए बिना भी किया जा सकता है।
बैंकिंग उद्योग से जुड़े अनुमानों के मुताबिक UPI नेटवर्क को संचालित और बनाए रखने में लगभग 40 पैसे से ₹1 प्रति ट्रांजैक्शन तक खर्च हो सकता है। वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 24,161.69 करोड़ UPI ट्रांजैक्शन हुए। इस आधार पर पूरे UPI नेटवर्क की अनुमानित सालाना लागत करीब ₹9,664 करोड़ से ₹24,161 करोड़ के बीच बैठती है।
राशि सुनने में बहुत बड़ी है, लेकिन RBI के सरप्लस से तुलना करने पर तस्वीर बदल जाती है।
RBI ने सरकार को दिया करीब ₹2.9 लाख करोड़ का सरप्लस
2025-26 में RBI की आय लगभग ₹4.3 लाख करोड़ बताई गई है, जिसमें से करीब ₹2.9 लाख करोड़ का सरप्लस केंद्र सरकार को ट्रांसफर किया गया। इस हिसाब से पूरे देश के UPI नेटवर्क को एक साल तक चलाने की अनुमानित लागत RBI द्वारा केंद्र को दिए गए सरप्लस की महज करीब 3% से 8.5% बैठती है।
यहीं से बड़ा नीतिगत सवाल पैदा होता है—जिस UPI व्यवस्था को भारत ने अपनी सबसे सफल डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचनाओं में से एक बनाया और जिसे सरकार ने वर्षों तक Digital India तथा कैशलेस अर्थव्यवस्था की उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया, क्या उसकी लागत का कुछ हिस्सा RBI के विशाल सरप्लस से नहीं उठाया जा सकता?
यदि ऐसा संभव है, तो मर्चेंट पर नया शुल्क लगाने की आवश्यकता कितनी है? और यदि मर्चेंट पर शुल्क लगाया गया तो क्या अंततः उसकी कीमत ग्राहक को नहीं चुकानी पड़ेगी?
UPI 425% बढ़ा, RBI का सरप्लस 857%
पिछले पांच वर्षों के आंकड़े इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाते हैं। इस अवधि में UPI ट्रांजैक्शन की संख्या करीब 425% बढ़ी, जबकि RBI द्वारा केंद्र सरकार को ट्रांसफर किया जाने वाला सरप्लस लगभग ₹30,307 करोड़ से बढ़कर ₹2.9 लाख करोड़ तक पहुंच गया। यानी इसमें करीब 857% की वृद्धि हुई।
इस तुलना से तर्क दिया जा रहा है कि UPI की लोकप्रियता और उसके संचालन का बोझ तेजी से बढ़ने के बावजूद RBI के सरप्लस में उससे भी अधिक तेजी से वृद्धि हुई है। इसलिए UPI की लागत को सीधे व्यापारियों या ग्राहकों तक पहुंचाने से पहले सार्वजनिक वित्त के जरिए इसे वहन करने के विकल्प पर भी गंभीरता से विचार किया जा सकता है।
आखिर MDR है क्या?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए Merchant Discount Rate यानी MDR को समझना जरूरी है। यह मूलतः वह शुल्क है जो भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारी से बैंक या पेमेंट सिस्टम से जुड़े संस्थान ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने के बदले लेते हैं।
मान लीजिए किसी ग्राहक ने दुकान पर ₹5,000 का डिजिटल भुगतान किया। यदि उस लेनदेन पर MDR लागू है तो भुगतान व्यवस्था से जुड़ी संस्थाएं उस रकम का एक छोटा हिस्सा शुल्क के रूप में ले सकती हैं। मर्चेंट को प्रभावी रूप से उसकी बिक्री की पूरी राशि से थोड़ा कम प्राप्त होगा या उसे अलग से यह लागत उठानी पड़ेगी।
UPI और RuPay को तेजी से लोकप्रिय बनाने के लिए इन पर MDR को लेकर सरकार ने विशेष व्यवस्था बनाई थी। इससे छोटे दुकानदारों और ग्राहकों को डिजिटल भुगतान अपनाने में बड़ी सहूलियत मिली। अब प्रस्तावित विधायी बदलाव सरकार को यह तय करने की अधिक गुंजाइश दे सकता है कि किस तरह के ट्रांजैक्शन पर शुल्क लगाया जा सकता है और किन्हें इससे बाहर रखा जाएगा।
मर्चेंट देगा फीस, लेकिन क्या ग्राहक की जेब बचेगी?
यह इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलू है। मान लिया जाए कि सरकार सीधे ग्राहक से कोई शुल्क नहीं लेती और MDR केवल बड़े मर्चेंट्स पर लगाया जाता है, तब भी इसका अर्थ यह नहीं कि ग्राहक पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
व्यापार में बढ़ी हुई लागत अक्सर किसी न किसी रूप में उपभोक्ता तक पहुंचती है। व्यापारी इसे उत्पाद की कीमत में जोड़ सकता है, convenience fee लगा सकता है या दूसरे तरीके से अपनी लागत की भरपाई कर सकता है। इसलिए कागज पर “मर्चेंट से लिया गया शुल्क” और वास्तविक अर्थव्यवस्था में “ग्राहक द्वारा चुकाई गई कीमत” दो पूरी तरह अलग चीजें नहीं हैं।
यही कारण है कि UPI पर MDR की वापसी या किसी नए शुल्क की संभावना का असर केवल बड़े व्यापारियों तक सीमित मानना जल्दबाजी होगी।
₹2,000 पार करते ही पैसा कटेगा? अभी नहीं
इस पूरे घटनाक्रम के बीच ₹2,000 की सीमा को लेकर सबसे अधिक भ्रम पैदा हो सकता है। इसलिए तथ्य स्पष्ट है—अभी ऐसी व्यवस्था लागू नहीं हुई है कि ₹2,000 तक UPI मुफ्त हो और ₹2,001 होते ही ग्राहक से फीस वसूल ली जाए।
सामने आई जानकारी में ₹2,000 से अधिक के भुगतान और लगभग ₹1–1.5 करोड़ सालाना टर्नओवर वाले मर्चेंट्स का उल्लेख संभावित शुरुआती व्यवस्था के संदर्भ में हुआ है। शुल्क कितना होगा, किस श्रेणी के मर्चेंट पर लागू होगा, क्या केवल Person-to-Merchant (P2M) ट्रांजैक्शन प्रभावित होंगे या Person-to-Person (P2P) भुगतान भी कभी इसके दायरे में आ सकते हैं—इन सवालों का अंतिम जवाब नियम और सरकारी अधिसूचना से मिलेगा।
इसलिए किसी दोस्त या परिवार के सदस्य को ₹5,000 या ₹10,000 UPI से भेजने पर अभी फीस लगने वाली है—ऐसा निष्कर्ष निकालना गलत होगा।
असली बदलाव कानून में छिपा है
तत्काल शुल्क से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रस्तावित कानून की दिशा है। अभी तक UPI की पहचान ऐसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था के रूप में रही है जहां ग्राहक और मर्चेंट के लिए प्रत्यक्ष लेनदेन लागत बेहद कम या शून्य रखी गई। अब यदि सरकार को कुछ श्रेणियों के लेनदेन पर शुल्क की अनुमति देने का अधिकार मिलता है, तो भविष्य की नीति का दरवाजा खुल जाता है।
आज दायरा बड़े मर्चेंट्स और ₹2,000 से अधिक के भुगतान तक सीमित हो सकता है। लेकिन यदि कानून सरकार को अलग-अलग प्रकार के ट्रांजैक्शन अधिसूचित करने की शक्ति देता है, तो आने वाले वर्षों में परिस्थितियों के अनुसार इस दायरे में बदलाव किया जा सकता है।
इसलिए असली कहानी केवल यह नहीं है कि आज किसे फीस देनी पड़ेगी, बल्कि यह भी है कि कल सरकार किन लेनदेन को शुल्क के दायरे में ला सकेगी।
जिस ‘फ्री UPI’ ने भारत बदल दिया, उसकी कीमत क्या होगी?
भारत ने UPI को दुनिया के सामने अपनी डिजिटल क्रांति के सबसे सफल उदाहरणों में पेश किया है। इसकी सफलता के पीछे तकनीक जितनी महत्वपूर्ण रही, उतना ही महत्वपूर्ण इसका बेहद सरल और कम लागत वाला मॉडल रहा है। ग्राहक को कार्ड नंबर याद रखने की जरूरत नहीं, बैंक की लंबी प्रक्रिया नहीं—मोबाइल उठाइए, QR स्कैन कीजिए और कुछ सेकंड में भुगतान पूरा।
छोटे कारोबारियों के लिए भी यही सबसे बड़ा आकर्षण रहा। महंगी कार्ड मशीन की जरूरत नहीं, केवल QR कोड से भुगतान स्वीकार किया जा सकता है।
यही वजह है कि UPI पर किसी भी प्रकार का शुल्क लगाने का फैसला केवल बैंकिंग उद्योग की लागत का मामला नहीं है। यह करोड़ों उपभोक्ताओं, दुकानदारों, छोटे कारोबारियों और भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के व्यवहार को प्रभावित करने वाला फैसला हो सकता है।
सवाल ₹2,000 का नहीं—UPI की कीमत आखिर कौन चुकाएगा?
पूरी बहस आखिरकार इसी एक सवाल पर आकर टिकती है। UPI को चलाना मुफ्त नहीं है। बैंक और भुगतान व्यवस्था से जुड़े संस्थानों को इसकी तकनीक, सुरक्षा और संचालन पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। RBI गवर्नर भी कह रहे हैं कि किसी न किसी को यह लागत उठानी होगी।
लेकिन दूसरी तरफ उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि RBI का वार्षिक सरप्लस UPI की अनुमानित परिचालन लागत से कई गुना बड़ा है। ऐसे में सरकार के सामने मूल नीतिगत चुनाव है—क्या UPI को सड़क, रेलवे या दूसरे सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की तरह डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मानकर इसकी लागत व्यवस्था के भीतर से वहन की जाए, या धीरे-धीरे इसका कुछ हिस्सा मर्चेंट और अंततः ग्राहक तक पहुंचाया जाए?
फिलहाल आम UPI उपयोगकर्ता के लिए राहत की बात यही है कि ₹2,000 से ऊपर हर भुगतान पर फीस लागू नहीं हुई है। लेकिन संसद में आया विधायी बदलाव भविष्य में चुनिंदा UPI और RuPay ट्रांजैक्शन पर शुल्क लगाने का रास्ता जरूर खोल सकता है। भारत में अरबों लोगों और कारोबारियों की भुगतान आदत बदल चुके UPI के लिए यह छोटा बदलाव नहीं है। अब नजर इस बात पर होगी कि सरकार इस खुले दरवाजे से कितनी दूर जाती है—और डिजिटल भुगतान की कीमत आखिर किसकी जेब से निकलती है।




