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भारत में अकादमिक आज़ादी पर बड़ा सवाल: ‘Free to Think 2026’ में गिरावट, सरकार के बढ़ते हस्तक्षेप पर चिंता

शिक्षा/राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 सितंबर 2026

 

अकादमिक स्वतंत्रता ‘गंभीर रूप से प्रतिबंधित’

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में अकादमिक स्वतंत्रता को लेकर एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। Scholars at Risk की वार्षिक ‘Free to Think 2026’ रिपोर्ट ने भारत को अकादमिक स्वतंत्रता की ‘Severely Restricted’ यानी ‘गंभीर रूप से प्रतिबंधित’ श्रेणी में रखा है।

रिपोर्ट में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, शोध और अध्यापन की स्वतंत्रता तथा छात्रों की अभिव्यक्ति से जुड़े मामलों में बढ़ते दबाव का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1 जुलाई 2025 से 30 जून 2026 के बीच दुनिया के 59 देशों और क्षेत्रों में उच्च शिक्षा समुदायों पर 382 हमले दर्ज किए गए।

AFI स्कोर 0.16 से गिरकर 0.14

रिपोर्ट में भारत के Academic Freedom Index यानी AFI में भी गिरावट दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारत का स्कोर 2024 में 0.16 था, जो 2025 में घटकर 0.14 रह गया। Scholars at Risk के अनुसार, 2022 के बाद शोध और अध्यापन की स्वतंत्रता पर बढ़ते प्रतिबंध इस गिरावट से जुड़े हैं।

यानी ‘Free to Think 2026’ की रिपोर्ट में इस्तेमाल किया गया 0.14 का स्कोर 2025 के AFI डेटा से संबंधित है, न कि पूरे 2026 वर्ष का स्कोर।

सरकार और UGC की भूमिका पर रिपोर्ट की चिंता

भारत के मामले में रिपोर्ट ने केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार और उच्च शिक्षा में University Grants Commission यानी UGC की भूमिका पर विशेष चिंता जताई है।

Scholars at Risk का कहना है कि UGC को उच्च शिक्षा पर राज्य के प्रभाव के एक प्रमुख माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया गया। रिपोर्ट में कुलपतियों की नियुक्ति से जुड़े योग्यता मानकों में बदलाव और कॉन्ट्रैक्ट फैकल्टी से संबंधित नियमों में बदलाव का भी उल्लेख है। रिपोर्ट इन कदमों को विश्वविद्यालयों की संस्थागत स्वायत्तता से जोड़कर देखती है।

यह रिपोर्ट का आकलन है; इन नीतिगत बदलावों की सरकार की ओर से अलग व्याख्या और उनके घोषित उद्देश्य भी हो सकते हैं।

कैंपस में छात्र आवाज़ पर भी सवाल

रिपोर्ट में छात्र आंदोलनों और विश्वविद्यालय परिसरों में अभिव्यक्ति से जुड़े मामलों को भी शामिल किया गया है।

Scholars at Risk ने भारत में छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई का उल्लेख करते हुए इसे अकादमिक स्वतंत्रता पर व्यापक दबाव के संदर्भ में रखा है। रिपोर्ट भारत के साथ ईरान, सर्बिया, सेनेगल और इंडोनेशिया में छात्र प्रदर्शनों के दौरान राज्य बलों की कार्रवाई का भी जिक्र करती है।

विश्वविद्यालय की आज़ादी आखिर है क्या?

अकादमिक स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ यह नहीं कि शिक्षक अपनी पसंद का विषय पढ़ा सके।

इसमें शोध करने की स्वतंत्रता, सवाल पूछने का अधिकार, स्वतंत्र अध्यापन, विचारों का आदान-प्रदान, अकादमिक संस्थानों की स्वायत्तता और कैंपस में शांतिपूर्ण असहमति व्यक्त करने की जगह भी शामिल है।

Scholars at Risk का कहना है कि जब सरकारें विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक व्यवस्था, पाठ्यक्रम, शोध या कैंपस गतिविधियों में अत्यधिक हस्तक्षेप करती हैं, तो स्वतंत्र विचार और आलोचनात्मक बहस के लिए उपलब्ध जगह प्रभावित हो सकती है।

दुनिया भर में भी बिगड़ रही तस्वीर

यह केवल भारत की कहानी नहीं है।

‘Free to Think 2026’ के मुताबिक, जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच 59 देशों और क्षेत्रों में उच्च शिक्षा समुदायों पर 382 हमले दर्ज किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दशक में 179 देशों में से 50 देशों में अकादमिक स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज की गई, जबकि केवल नौ देशों में सुधार हुआ।

Scholars at Risk का कहना है कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता में सरकारी हस्तक्षेप और असहमति को दबाने की कोशिशें अब कई देशों में व्यापक चुनौती बन चुकी हैं।

भारत से जुड़े 42 हमलों का उल्लेख

रिपोर्ट की भारत संबंधी कवरेज में अध्ययन अवधि के दौरान उच्च शिक्षा समुदायों से जुड़े 42 हमलों का उल्लेख किया गया है। इनमें हिंसा, गिरफ्तारी, मुकदमे, पद से हटाने और अकादमिक गतिविधियों में बाधा जैसे अलग-अलग प्रकार के मामले शामिल हैं।

यहां यह समझना जरूरी है कि ‘हमले’ की श्रेणी रिपोर्ट की अपनी निगरानी और परिभाषाओं पर आधारित है। इसलिए इन आंकड़ों को व्यापक संदर्भ में पढ़ना जरूरी है।

सवाल सरकार से ज्यादा बड़ा है

इस रिपोर्ट का अर्थ यह नहीं है कि भारत के हर विश्वविद्यालय में अकादमिक स्वतंत्रता समाप्त हो गई है या हर शिक्षक और छात्र समान परिस्थितियों का सामना कर रहा है।

लेकिन AFI में गिरावट, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को लेकर उठाए गए सवाल और छात्र-अभिव्यक्ति से जुड़े दर्ज मामलों ने उच्च शिक्षा के भविष्य पर बहस जरूर तेज कर दी है।

Scholars at Risk का निष्कर्ष है कि विश्वविद्यालयों को राजनीतिक एजेंडों से स्वतंत्र रखने और उनकी संस्थागत स्वायत्तता की रक्षा करने की जरूरत है।

क्योंकि विश्वविद्यालय सिर्फ डिग्री देने की जगह नहीं

विश्वविद्यालय किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सिर्फ डिग्री और नौकरी की तैयारी कराने वाली संस्था नहीं होता।

वह वह जगह है जहां सवाल पूछे जाते हैं, स्थापित धारणाओं को चुनौती दी जाती है, शोध होता है, असहमति सुनी जाती है और सत्ता सहित हर संस्था की आलोचनात्मक जांच की जाती है।

‘Free to Think 2026’ ने भारत के सामने इसी बुनियादी सवाल को फिर खड़ा किया है— क्या हमारी यूनिवर्सिटियां आने वाली पीढ़ी को सिर्फ सही जवाब याद कराएंगी, या उन्हें अपने सवाल पूछने की आज़ादी भी देंगी?

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