राष्ट्रीय/ न्यायपालिका | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 सितंबर 2026
चीफ इलेक्शन कमिश्नर यानी CEC और Election Commissioners यानी ECs की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में बुधवार को एक अहम टिप्पणी सामने आई। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की जगह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल करने से केंद्र सरकार को प्रभावी रूप से वीटो जैसी स्थिति मिल सकती है। उनके अनुसार, यह व्यवस्था आम जनता की नजर में स्वतंत्रता और निष्पक्षता की कसौटी पर सवाल खड़े करती है।
जस्टिस दत्ता ने अपने अलग फैसले में कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उनका कामकाज स्वतंत्र रहना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए जरूरी है। उन्होंने इसे संविधान के मूल ढांचे से जुड़ा विषय बताया। उनके अनुसार, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता केवल संस्थागत व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में जनता के भरोसे से भी सीधे जुड़ी हुई है।
मामला उस चयन व्यवस्था से जुड़ा है जिसे संसद ने कानून बनाकर तय किया है। मौजूदा व्यवस्था में CEC और ECs की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। इससे पहले इसी प्रक्रिया में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को शामिल करने की व्यवस्था को लेकर बहस हुई थी, लेकिन बाद में संसद द्वारा बनाए गए कानून में उनकी जगह केंद्रीय मंत्री को रखा गया।
जस्टिस दत्ता ने इस बदलाव को केवल कानूनी प्रावधान के तौर पर देखने के बजाय उसकी सार्वजनिक धारणा पर भी ध्यान दिया। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल का सदस्य सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी का हिस्सा होते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के साथ उसी सरकार के एक मंत्री का चयन समिति में होना स्वतंत्र दृष्टिकोण की धारणा को कमजोर कर सकता है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर सवाल उठाया था कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति में एक भी ऐसा सदस्य क्यों नहीं है जिसे पूरी तरह स्वतंत्र माना जा सके। अदालत ने यह चिंता भी जताई थी कि ऐसी व्यवस्था जनता को गलत संकेत दे सकती है। यानी विवाद केवल इस बात पर नहीं है कि कानून क्या कहता है, बल्कि इस बात पर भी है कि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया आम नागरिक को कितनी स्वतंत्र और निष्पक्ष दिखाई देती है।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक विवाद भी तेज है। हाल में आयोग के भीतर दो Election Commissioners, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से अलग-अलग मुद्दों पर लिखित आपत्तियों की खबरें सामने आई हैं। इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची में बदलाव, पश्चिम बंगाल में अपीलों और चुनावी डेटा तक पहुंच जैसे विषय शामिल बताए गए हैं। चुनाव आयोग ने इन मतभेदों को संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा बताया है और कहा है कि अंतिम फैसले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार लिए जाते हैं।
यही वजह है कि CEC और ECs की नियुक्ति की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का महत्व बढ़ जाता है। चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची तैयार करने से लेकर चुनाव कराने तक की संवैधानिक जिम्मेदारी होती है। ऐसे में नियुक्ति की शुरुआत से ही आयोग की स्वतंत्रता को लेकर जनता के मन में भरोसा होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा माना जाता है।
हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि जस्टिस दत्ता की टिप्पणी एक अलग राय का हिस्सा है। इसे सुप्रीम कोर्ट के पूरे फैसले या अंतिम संवैधानिक स्थिति के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। चयन समिति की मौजूदा व्यवस्था संसद द्वारा बनाए गए कानून पर आधारित है और इसके संवैधानिक परीक्षण का सवाल अदालत के सामने है।
पूरे विवाद का मूल सवाल यही है कि देश के चुनाव आयोग की नियुक्ति ऐसी प्रक्रिया से होनी चाहिए जिसमें केवल कानूनी वैधता ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाली स्वतंत्रता और निष्पक्षता भी सुनिश्चित हो। जस्टिस दत्ता की टिप्पणी ने इसी सवाल को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है—चुनाव कराने वाली संस्था कितनी स्वतंत्र होनी चाहिए और उसकी स्वतंत्रता जनता को कितनी साफ दिखाई देनी चाहिए।



