राष्ट्रीय/केरल/राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | 9 अगस्त 2026
तिरुवनंतपुरम। स्वतंत्रता दिवस समारोह में ‘वंदे मातरम्’ के पूरे गीत के गायन को लेकर केरल की कांग्रेस नेतृत्व वाली UDF सरकार राजनीतिक विवाद में घिर गई है। राज्य के मुख्य सचिव विश्वनाथ सिन्हा की ओर से 6 अगस्त को जारी निर्देश में केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुरूप स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान सरकारी विभागों को ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण रूप से गायन सुनिश्चित करने को कहा गया है। आदेश सामने आने के बाद विपक्षी LDF ने UDF सरकार पर RSS की विचारधारा के सामने झुकने का आरोप लगाया है। विवाद की स्थिति यह है कि सरकार के कुछ मंत्री भी इस निर्देश को लेकर स्पष्ट जवाब देते नजर नहीं आए।
मुख्य सचिव के निर्देश ने खड़ा किया विवाद
मुख्य सचिव की ओर से जारी निर्देश में सरकारी विभागों को स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के पूरे गीत का गायन सुनिश्चित करने को कहा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक यह निर्देश केंद्र सरकार की ओर से जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर दिया गया। इसी को लेकर केरल में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। LDF ने इसे केवल एक प्रशासनिक निर्देश मानने के बजाय वैचारिक झुकाव से जोड़ते हुए UDF सरकार पर निशाना साधा है।
विपक्ष का आरोप है कि जिस UDF सरकार से धर्मनिरपेक्ष राजनीति और संवैधानिक मूल्यों की अपेक्षा की जाती है, वह ऐसे फैसलों के जरिए संघ परिवार की राजनीतिक-सांस्कृतिक लाइन के करीब जाती दिखाई दे रही है। खास बात यह है कि सत्तारूढ़ गठबंधन में IUML भी शामिल है और उसके नेताओं के लिए इस विवाद का राजनीतिक महत्व और बढ़ जाता है।
सरकार के भीतर भी स्पष्टता का अभाव
विवाद बढ़ने के बाद सरकार के मंत्रियों के बयानों ने स्थिति को और उलझा दिया है। गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने कहा कि उन्हें इस निर्देश की जानकारी नहीं थी। वहीं स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने कहा कि राज्य सरकार के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल दो अंतरे ही गाए जाएंगे। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि मुख्य सचिव का निर्देश और मंत्रियों का बयान आपस में किस तरह मेल खाते हैं।
सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि स्वतंत्रता दिवस समारोहों के लिए वास्तविक दिशा-निर्देश क्या हैं और क्या राज्य सरकार केंद्र के निर्देश को उसी रूप में लागू कर रही है या उसमें कोई बदलाव किया गया है। प्रशासनिक आदेश और राजनीतिक नेतृत्व के बयान में अंतर से पैदा हुआ भ्रम सरकार की स्थिति को कमजोर करता है।
LDF का UDF पर सीधा हमला
विपक्षी LDF ने UDF सरकार पर RSS के एजेंडे के सामने पूरी तरह समर्पण करने का आरोप लगाया है। वाम दलों का कहना है कि शिक्षा और सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़े मुद्दों के बाद अब सरकारी समारोहों में राष्ट्रगीत-संबंधी निर्देशों को भी वैचारिक राजनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है।
LDF का तर्क है कि देशभक्ति किसी एक गीत, नारे या संगठन की वैचारिक व्याख्या तक सीमित नहीं हो सकती। भारत की स्वतंत्रता और राष्ट्र निर्माण की विरासत विविध विचारों, भाषाओं, संस्कृतियों और आंदोलनों से बनी है। इसलिए सरकारी समारोहों में किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक को लेकर निर्णय संवैधानिक भावना और व्यापक सहमति के आधार पर होना चाहिए, न कि राजनीतिक ध्रुवीकरण के जरिए।
‘वंदे मातरम्’ पर विवाद से बड़ा सवाल
‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। लेकिन स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों और उनके इस्तेमाल को लेकर संवेदनशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किसी गीत के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करना एक बात है और उसे राजनीतिक पहचान का प्रतीक बनाकर पेश करना दूसरी।
सरकारों की जिम्मेदारी है कि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसरों को राजनीतिक विवाद का मंच न बनने दें। देशभक्ति को लेकर किसी नागरिक या समुदाय पर संदेह पैदा करने के बजाय ऐसे आयोजनों को साझा राष्ट्रीय भावना और संवैधानिक मूल्यों का अवसर बनाया जाना चाहिए।
केंद्र के निर्देश बनाम राज्यों की राजनीतिक संवेदनशीलता
इस विवाद का एक पहलू केंद्र और राज्य के बीच प्रशासनिक समन्वय से भी जुड़ा है। यदि केंद्र ने स्वतंत्रता दिवस समारोहों के लिए कोई निर्देश जारी किया है और राज्य सरकार उसे लागू कर रही है, तो उसे स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करना चाहिए। वहीं राज्य की अपनी प्रशासनिक और राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए किसी भी निर्देश के क्रियान्वयन में पारदर्शिता जरूरी है।
केरल में यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि राज्य की राजनीति में RSS और BJP की विचारधारा को लेकर कांग्रेस और वाम दलों के बीच लंबे समय से तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रही है। ऐसे में प्रशासनिक आदेश भी आसानी से वैचारिक विवाद का रूप ले लेते हैं।
UDF के सामने दोहरी चुनौती
UDF सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे केंद्र के निर्देशों के अनुपालन को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी, दूसरी ओर अपने गठबंधन के भीतर मौजूद अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक धाराओं को भी साथ रखना होगा। खासकर ऐसे समय में जब सरकार पहले ही शिक्षा से जुड़े एक अन्य विवाद को लेकर विपक्ष के निशाने पर है, ‘वंदे मातरम्’ का मुद्दा उसके लिए राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
आखिरकार सवाल केवल ‘वंदे मातरम्’ के गायन का नहीं है। सवाल यह है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर सरकारें ऐसी नीति कैसे बनाएं जो देशभक्ति को मजबूत करे, लेकिन उसे किसी राजनीतिक विचारधारा की पहचान न बनने दे। स्वतंत्रता दिवस पूरे देश का पर्व है—इसे किसी दल, संगठन या वैचारिक खेमे की राजनीतिक लड़ाई में बदलना लोकतांत्रिक भावना के अनुकूल नहीं होगा।




