राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 अप्रैल 2026
दिल्ली की राजनीति और न्यायिक गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई जब आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक Arvind Kejriwal ने जस्टिस Swarna Kanta Sharma की अदालत में एक अतिरिक्त हलफनामा दाखिल कर दिया। इस हलफनामे में केजरीवाल ने सीधे तौर पर अदालत की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए जज से खुद को मामले की सुनवाई से अलग (recuse) करने की मांग की है।
केजरीवाल ने अपने हलफनामे में दावा किया है कि जज के दोनों बच्चे केंद्र सरकार के पैनल काउंसल के रूप में काम कर रहे हैं और उन्हें मामलों का आवंटन सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta के जरिए होता है। उनका कहना है कि ऐसे में एक स्वाभाविक टकराव (conflict of interest) की स्थिति बनती है, क्योंकि वही सरकारी तंत्र इस केस में उनके खिलाफ पक्ष रख रहा है।
हलफनामे में यह भी उल्लेख किया गया है कि आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार जज के परिवार के सदस्य केंद्र सरकार के साथ सक्रिय पेशेवर संबंध में हैं और उन्हें सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में पैनल काउंसल के रूप में काम दिया जाता है। केजरीवाल ने इसे “सतत और प्रभावी संबंध” बताते हुए कहा कि यह कोई औपचारिक या नाममात्र का पद नहीं, बल्कि नियमित सरकारी काम और उससे जुड़े लाभों वाला दायित्व है।
केजरीवाल ने अपने पक्ष में केंद्र सरकार की 13 सितंबर 2022 की अधिसूचना और विधि मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध FAQ का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में मामलों का आवंटन सीधे अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल के स्तर से होता है। ऐसे में, उन्होंने तर्क दिया कि जिन अधिकारियों के माध्यम से केस बांटे जाते हैं, वही अधिकारी इस मामले में उनके खिलाफ पेश हो रहे हैं।
हलफनामे में यह भी दावा किया गया है कि RTI से प्राप्त जानकारी के अनुसार जज के परिवार के सदस्य को बड़ी संख्या में सरकारी केस आवंटित किए गए हैं—2023 में 2487, 2024 में 1784 और 2025 में 1633 मामले। केजरीवाल ने इसे “गंभीर और प्रत्यक्ष हितों का टकराव” करार दिया।
उन्होंने यह भी कहा कि यह कोई सामान्य मामला नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुकदमा है, जिसमें वे केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के प्रमुख विरोधी हैं और जांच एजेंसी Central Bureau of Investigation उनके खिलाफ कार्रवाई कर रही है। ऐसे में न्याय न सिर्फ होना चाहिए बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।
केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का भी जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि “perception matters” और जांच एजेंसियों को “caged parrot” जैसी छवि से बाहर निकलना चाहिए।
अब इस मामले में निगाहें अदालत के अगले कदम पर टिकी हैं—क्या जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा खुद को इस केस से अलग करेंगी या फिर इन आरोपों को खारिज करते हुए सुनवाई जारी रखेंगी। यह फैसला न सिर्फ इस केस की दिशा तय करेगा, बल्कि न्यायिक निष्पक्षता पर चल रही बहस को भी नया मोड़ दे सकता है।



