[the_ad id="179"]
Home » National » दल-बदल पर कपिल सिब्बल का बड़ा हमला: ‘जनादेश बेचने का अधिकार किसी सांसद को नहीं’

दल-बदल पर कपिल सिब्बल का बड़ा हमला: ‘जनादेश बेचने का अधिकार किसी सांसद को नहीं’

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 जून 2026

महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (UBT) के सांसदों के संभावित दल-बदल की अटकलों के बीच राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दल-बदल की राजनीति पर तीखा हमला बोला है। सिब्बल ने कहा कि संविधान का कोई भी सिद्धांत निर्वाचित प्रतिनिधियों को जनता के जनादेश के साथ विश्वासघात करने की अनुमति नहीं देता। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई सांसद या विधायक किसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीतकर संसद या विधानसभा पहुंचता है, तो बाद में दूसरी पार्टी में शामिल होना नैतिक, कानूनी और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।

कपिल सिब्बल ने कहा कि आज भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जनता जिस पार्टी और विचारधारा के नाम पर वोट देती है, कई बार निर्वाचित प्रतिनिधि बाद में उसी जनादेश को छोड़कर दूसरी राजनीतिक दिशा में चले जाते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी नेता को दूसरी पार्टी में जाना ही था तो उसने उसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव क्यों नहीं लड़ा। जनता ने वोट व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस पार्टी और उसके चुनावी वादों को ध्यान में रखकर दिया होता है।

सिब्बल ने अपने बयान में कहा, “फिर चुनाव क्यों नहीं कराए जाएं? यदि किसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर आप सांसद पहुंचे हैं तो आप उसे छोड़कर किसी दूसरे चुनाव चिह्न वाले दल में कैसे शामिल हो सकते हैं? आप उस चुनाव चिह्न पर निर्वाचित नहीं हुए हैं।” उनका कहना था कि जनप्रतिनिधि यदि अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलना चाहते हैं तो सबसे पहले उन्हें जनता के पास दोबारा जाना चाहिए और नया जनादेश हासिल करना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि “संवैधानिक कानून का कोई भी सिद्धांत इसकी अनुमति नहीं देता। यह अनैतिक, अवैध और असंवैधानिक है। अब मामला अदालत के हाथ में है।” सिब्बल का संकेत उन राजनीतिक घटनाक्रमों की ओर माना जा रहा है जिनमें निर्वाचित सांसद और विधायक चुनाव जीतने के बाद दल बदलते रहे हैं और अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा है।

सिब्बल की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब शिवसेना (UBT) के भीतर संभावित टूट और सांसदों के दूसरे खेमे में जाने की अटकलें तेज हैं। पार्टी पहले ही लोकसभा अध्यक्ष को कैविएट पत्र देकर यह अनुरोध कर चुकी है कि यदि कोई दूसरा गुट मान्यता की मांग लेकर आता है तो पहले शिवसेना (UBT) को सुना जाए। पार्टी नेतृत्व का आरोप है कि लोकतांत्रिक जनादेश को कमजोर करने के लिए राजनीतिक दबाव और प्रलोभनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कपिल सिब्बल का बयान केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में हुई राजनीतिक उठापटक पर भी टिप्पणी है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गोवा और अन्य राज्यों में दल-बदल और सरकारों के बदलने को लेकर लगातार विवाद होते रहे हैं। ऐसे मामलों में अक्सर दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून की व्याख्या और उसकी सीमाओं पर बहस होती रही है।

विपक्षी दलों का तर्क है कि जनादेश किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होता, बल्कि मतदाताओं का विश्वास होता है। वहीं दूसरी ओर दल-बदल करने वाले नेताओं का कहना होता है कि राजनीतिक परिस्थितियों और वैचारिक मतभेदों के कारण उन्हें नया रास्ता चुनना पड़ता है। लेकिन कपिल सिब्बल का मानना है कि ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक और नैतिक रास्ता यही है कि जनता के बीच जाकर दोबारा चुनाव लड़ा जाए।

महाराष्ट्र में जारी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच सिब्बल का यह बयान नई बहस को जन्म दे रहा है। अब नजर अदालतों, लोकसभा अध्यक्ष और आने वाले राजनीतिक घटनाक्रमों पर टिकी है कि दल-बदल और जनादेश की इस लड़ाई का अगला अध्याय किस दिशा में आगे बढ़ता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *