शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 जून 2026
NEET-UG 2026 को लेकर देशभर में बढ़ते तनाव के बीच एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। विभिन्न राज्यों से सामने आए आंकड़ों के अनुसार, पिछले 36 दिनों में कम से कम 12 छात्रों ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। इनमें अधिकांश छात्र NEET परीक्षा की तैयारी कर रहे थे या री-एग्जाम, परिणाम और भविष्य को लेकर मानसिक दबाव में बताए जा रहे हैं। इन घटनाओं ने देश की परीक्षा व्यवस्था, कोचिंग संस्कृति और छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दिल्ली और राजस्थान में दो-दो, उत्तर प्रदेश में दो, जबकि गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और उत्तराखंड में एक-एक छात्र की आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। यह सिलसिला 14 मई से शुरू हुआ और 17 जून तक लगातार ऐसी घटनाएं दर्ज होती रहीं।
सबसे पहला मामला गोवा से सामने आया, जहां 17 वर्षीय NEET छात्र ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। इसके बाद उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में 21 वर्षीय छात्र और दिल्ली में 20 वर्षीय छात्रा की मौत की खबर आई। परिवारों का कहना था कि परीक्षा और भविष्य को लेकर तनाव लगातार बढ़ रहा था। राजस्थान के मेड़ता, मध्य प्रदेश के आगर मालवा और महाराष्ट्र के लातूर जैसे प्रमुख शिक्षा केंद्रों से भी इसी तरह के मामले सामने आए।
जून महीने में भी यह सिलसिला नहीं रुका। दिल्ली में 17 वर्षीय छात्रा अपने घर में मृत मिली, जबकि राजस्थान के सीकर में 22 वर्षीय छात्र ने आत्महत्या कर ली। बताया गया कि वह तीसरी बार NEET परीक्षा दे रहा था। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक 17 वर्षीय छात्रा ने फांसी लगाकर जान दे दी। परिवार का कहना था कि वह परीक्षा रद्द होने और री-एग्जाम की अनिश्चितता को लेकर परेशान थी।
उत्तराखंड के देहरादून, तमिलनाडु के कोयंबटूर और गुजरात के अहमदाबाद से भी ऐसे मामले सामने आए, जहां छात्रों के परिवारों ने पढ़ाई और परीक्षा के दबाव को एक प्रमुख कारण बताया। हालांकि हर मामले की जांच अलग-अलग स्तर पर चल रही है और अंतिम कारण पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे।
इन घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश की प्रतिस्पर्धी परीक्षा प्रणाली छात्रों पर असहनीय मानसिक दबाव डाल रही है? शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी परीक्षाओं में सफलता का दबाव इतना अधिक हो गया है कि कई छात्र असफलता या अनिश्चितता को स्वीकार नहीं कर पाते। वहीं, पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, री-एग्जाम और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी जैसी घटनाएं इस तनाव को और बढ़ा देती हैं।
विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को उठाया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में “छात्रों की गूंज” कार्यक्रम में दावा किया कि देश के करोड़ों छात्र एक ऐसी व्यवस्था का सामना कर रहे हैं जिसमें मेहनत के बावजूद उन्हें अनिश्चितता, तनाव और बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना था कि शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं का बोझ अब परिवारों पर अत्यधिक बढ़ चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार ही पर्याप्त नहीं होगा। स्कूलों, कॉलेजों, कोचिंग संस्थानों और परिवारों को भी मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। छात्रों के लिए काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता और तनाव प्रबंधन की व्यवस्था मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि कोई भी परीक्षा किसी युवा की जिंदगी से बड़ी न बन जाए।
NEET-UG 2026 से जुड़े इन 12 मामलों ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि उन सपनों की कहानी है जो प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव के बीच टूट गए। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश की शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था इन घटनाओं से सबक लेकर छात्रों को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और मानवीय माहौल दे पाएगी?



