[the_ad id="179"]
Home » National » राजस्थान की नदियों में प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार से मांगा ‘20-पॉइंट समाधान प्लान’

राजस्थान की नदियों में प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार से मांगा ‘20-पॉइंट समाधान प्लान’

जोजरी, बांडी और लूनी नदियों में औद्योगिक प्रदूषण का मामला; सुप्रीम कोर्ट ने कहा—सिर्फ तात्कालिक उपाय नहीं, स्थायी समाधान खोजिए; पाली में नदी किनारे बसे औद्योगिक क्षेत्र को भविष्य में स्थानांतरित करने पर भी करना पड़ सकता है विचार

राष्ट्रीय / पर्यावरण | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अगस्त 2026

तीन नदियों के प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी चिंता

राजस्थान की जोजरी, बांडी और लूनी नदियों में बढ़ते प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने को कहा है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने राजस्थान सरकार को एक व्यापक 20-पॉइंट रिजॉल्यूशन प्लान तैयार करने का सुझाव दिया। अदालत का जोर इस बात पर रहा कि समस्या को केवल अस्थायी कार्रवाई, निरीक्षण या जुर्माने के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि ऐसा दीर्घकालिक मॉडल बनाना होगा जिससे नदियों में प्रदूषण पहुंचने की जड़ पर ही रोक लग सके।

जोधपुर से बालोतरा तक जुड़ी है प्रदूषण की पूरी कड़ी

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये तीनों नदियां अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों से गुजरते हुए एक-दूसरे से जुड़ती हैं। जोजरी नदी जोधपुर से गुजरती है, बांडी नदी पाली से होकर बहती है, जबकि लूनी नदी बालोतरा क्षेत्र से गुजरती है। बांडी और जोजरी आगे चलकर बालोतरा के पास लूनी नदी में मिलती हैं। इसका अर्थ यह है कि किसी एक क्षेत्र में छोड़ा गया प्रदूषित पानी केवल स्थानीय समस्या बनकर नहीं रहता, बल्कि नदी तंत्र के जरिए दूसरे इलाकों तक भी पहुंच सकता है।

पाली के उद्योगों पर अदालत की खास नजर

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाली के औद्योगिक क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति पर विशेष ध्यान दिया। अदालत ने कहा कि पाली का पूरा औद्योगिक क्षेत्र नदी के किनारे स्थित है। ऐसे में लंबे समय के समाधान के लिए राज्य सरकार और संबंधित प्राधिकरणों को भविष्य में उद्योगों को नदी से दूर स्थानांतरित करने जैसे बड़े विकल्प पर भी विचार करना पड़ सकता है।

यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट समस्या को केवल प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगाने तक सीमित करके नहीं देख रहा। अदालत नदी और उद्योगों के बीच मौजूद संरचनात्मक समस्या का समाधान चाहती है।

‘इलाज’ नहीं, प्रदूषण की जड़ खत्म करने पर जोर

पीठ की टिप्पणी का मूल संदेश यही है कि हर बार नदी प्रदूषित होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय ऐसी व्यवस्था तैयार की जाए जिससे प्रदूषण नदी तक पहुंचे ही नहीं। राजस्थान के कई औद्योगिक इलाकों में कपड़ा प्रसंस्करण, रंगाई और दूसरे उद्योग लंबे समय से जल प्रदूषण को लेकर पर्यावरणीय निगरानी के दायरे में रहे हैं। औद्योगिक अपशिष्ट यदि पर्याप्त शोधन के बिना प्राकृतिक जल स्रोतों तक पहुंचता है तो उसका असर केवल नदी के पानी पर नहीं, आसपास की जमीन, भूजल, कृषि और स्थानीय आबादी पर भी पड़ सकता है।

20 सूत्रीय योजना में क्या होगा, अब सरकार पर नजर

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को 20-बिंदु समाधान योजना बनाने का सुझाव दिया है। अब महत्वपूर्ण यह होगा कि राजस्थान सरकार इसमें किन उपायों को शामिल करती है। औद्योगिक अपशिष्ट के उपचार, प्रदूषण नियंत्रण संयंत्रों की क्षमता, नियमित निगरानी, नियम तोड़ने वाले उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई, नदी में सीधे अपशिष्ट छोड़े जाने पर रोक और दीर्घकाल में औद्योगिक इकाइयों की लोकेशन जैसे मुद्दे इस व्यापक समाधान के केंद्र में आ सकते हैं।

अदालत की अपेक्षा स्पष्ट है—कागजी कार्ययोजना नहीं, जमीन पर लागू होने वाला स्थायी समाधान चाहिए।

नदी केवल पानी नहीं, आसपास की पूरी अर्थव्यवस्था का सवाल

जोजरी, बांडी और लूनी के प्रदूषण को केवल पर्यावरण का मुद्दा मानना भी अधूरी तस्वीर होगी। नदी का प्रदूषित पानी कृषि भूमि और भूजल तक पहुंचने पर किसानों और ग्रामीण समुदायों की आजीविका प्रभावित कर सकता है। पानी की गुणवत्ता खराब होने का सीधा संबंध स्वास्थ्य और पशुधन से भी जुड़ जाता है।

इसलिए अदालत की चिंता का दायरा उद्योग बनाम पर्यावरण की सामान्य बहस से कहीं बड़ा है। सवाल यह है कि औद्योगिक विकास की कीमत आखिर नदी और उसके आसपास रहने वाले लोगों को क्यों चुकानी पड़े?

उद्योग जरूरी हैं, लेकिन नदी को नाला बनाने की कीमत पर नहीं

राजस्थान के औद्योगिक क्षेत्रों ने रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। ऐसे में उद्योगों को अचानक बंद करना या बड़े पैमाने पर स्थानांतरित करना भी आसान समाधान नहीं है। इससे रोजगार, निवेश और स्थानीय व्यापार प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी तत्काल स्थानांतरण का आदेश देने के बजाय इसे दीर्घकालिक विचार के रूप में सामने रखा है।

मगर दूसरी तरफ औद्योगिक विकास का अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि उत्पादन की लागत कम रखने के लिए पर्यावरणीय कीमत समाज चुकाए। प्रदूषण नियंत्रण उद्योग चलाने की अतिरिक्त सुविधा नहीं, उसकी बुनियादी जिम्मेदारी है।

सुप्रीम कोर्ट का संदेश—हर सुनवाई में वही समस्या लेकर मत आइए

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अदालत का स्थायी समाधान पर जोर है। पर्यावरण से जुड़े अनेक मामलों में समस्या तब गंभीर होती है जब प्रशासन प्रदूषण होने के बाद नोटिस, निरीक्षण, जुर्माना और अस्थायी बंदी जैसे कदम उठाता है, लेकिन प्रदूषण पैदा करने वाली मूल संरचना जस की तस बनी रहती है।

सुप्रीम कोर्ट का 20-पॉइंट प्लान वाला सुझाव इसी चक्र को तोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। यदि जोजरी, बांडी और लूनी को वास्तव में बचाना है तो सरकार, उद्योग, प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें नदी तक जहरीला या अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट पहुंचने की गुंजाइश ही न्यूनतम हो।

राजस्थान सरकार के सामने अब चुनौती केवल अदालत में जवाब दाखिल करने की नहीं है। चुनौती यह साबित करने की है कि औद्योगिक विकास और नदियों का अस्तित्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

क्योंकि किसी प्रदेश की औद्योगिक प्रगति का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि वहां कितनी फैक्ट्रियां लगीं—यह भी देखना होगा कि उन फैक्ट्रियों के बीच उसकी नदियां कितनी जीवित बचीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *