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ओपिनियन: ‘Proof of Life’ कहीं ‘Burden of Proof’ न बन जाए—आखिर नागरिक कितनी बार साबित करे कि वह नागरिक है?

SIR में मतदाता सूची से नाम हटने और पुराने मतदाताओं से दस्तावेज मांगने की बहस के बीच जन्म-मृत्यु पंजीकरण कानून में नया बदलाव चिंता बढ़ाता है; जब वोट, पहचान, शिक्षा, नौकरी और सरकारी योजनाओं तक पहुंच कागजों पर निर्भर होती जाए, तब सवाल फर्जीवाड़ा रोकने का ही नहीं, असली नागरिक को व्यवस्था से बाहर होने से बचाने का भी है

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अगस्त 2026

लोकतंत्र में नागरिक सरकार को चुनता है, या सरकार तय करेगी कि नागरिक कौन है?

भारतीय लोकतंत्र में एक बेहद बुनियादी रिश्ता है—नागरिक वोट देता है और सरकार चुनता है। लेकिन पिछले कुछ समय से नागरिकता और मताधिकार से जुड़ी बहस जैसे उलटी दिशा में चलती दिखाई दे रही है। मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर पहले ही बड़े पैमाने पर नाम हटने, पुराने मतदाताओं के रिकॉर्ड से बाहर होने और दस्तावेजों के आधार पर पात्रता साबित करने की प्रक्रिया पर गंभीर राजनीतिक और कानूनी विवाद चल रहा है। अब इसी वातावरण में Registration of Births and Deaths (Amendment) Bill, 2026 सामने आया है। अलग-अलग कानूनों और प्रक्रियाओं को अकेले देखें तो हर जगह प्रशासन का तर्क लगभग एक जैसा दिखाई देता है—रिकॉर्ड सही होना चाहिए, फर्जीवाड़ा रुकना चाहिए और डेटाबेस विश्वसनीय होना चाहिए। इन उद्देश्यों से शायद ही कोई असहमत होगा। लेकिन इन सारे कागजों को एक साथ रखकर देखिए तो दूसरा सवाल दिखाई देता है—क्या भारत में नागरिक के अधिकार धीरे-धीरे इस बात पर निर्भर होते जा रहे हैं कि वह अपने अस्तित्व और पहचान के कितने पुराने कागज प्रस्तुत कर सकता है?

SIR ने दिखा दिया कि एक सूची से नाम गायब होना सिर्फ ‘डेटा करेक्शन’ नहीं होता

मतदाता सूची कोई साधारण सरकारी रजिस्टर नहीं है। उसमें दर्ज नाम नागरिक के सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार—मतदान—तक पहुंच का दरवाजा है। SIR की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूचियों से बाहर होने को लेकर विपक्ष, नागरिक संगठनों और अदालतों तक चिंता जताई गई है। निर्वाचन आयोग का पक्ष है कि संशोधन प्रक्रिया का उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट अथवा अन्य अपात्र प्रविष्टियों को हटाकर सूची को शुद्ध करना है और पात्र मतदाताओं के लिए दावे-आपत्ति तथा नाम जुड़वाने की प्रक्रिया उपलब्ध रहती है। यह पक्ष दर्ज करना जरूरी है। लेकिन उतना ही जरूरी दूसरा प्रश्न है—जिस व्यक्ति ने पहले चुनावों में वोट दिया, जिसका नाम वर्षों तक मतदाता सूची में था, अगर उसका नाम नई सूची में नहीं आता तो अपनी पात्रता दोबारा साबित करने का व्यावहारिक बोझ आखिर किस पर पड़ता है? कागज पर दावा-आपत्ति की सुविधा होना और गांव-कस्बे के गरीब, बुजुर्ग, प्रवासी या कम पढ़े-लिखे नागरिक का वास्तव में उस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कर पाना दो अलग चीजें हैं।

एक क्लिक से नाम हट सकता है, वापस जुड़वाने में नागरिक महीनों क्यों भटके?

यही हमारे प्रशासनिक ढांचे की पुरानी विडंबना है। किसी डेटाबेस में व्यक्ति का नाम गलत हो जाए, उसकी उम्र बदल जाए, पता मेल न खाए या उसका रिकॉर्ड किसी दूसरी सूची से नहीं मिले तो कंप्यूटर उसे संदिग्ध बना सकता है। लेकिन कंप्यूटर की गलती सुधारने के लिए उसी नागरिक को फॉर्म भरना पड़ता है, प्रमाण जुटाने पड़ते हैं, कार्यालय जाना पड़ता है और कभी-कभी अधिकारियों के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। प्रशासन के लिए वह एक ‘रिकॉर्ड’ है; नागरिक के लिए वही रिकॉर्ड उसका वोट, राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति, नौकरी या पहचान हो सकता है। इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत होना चाहिए—राज्य के डेटाबेस की गलती का दंड नागरिक को नहीं मिलना चाहिए।

अब जन्म प्रमाणपत्र की ताकत बढ़ी तो चिंता भी बढ़नी चाहिए

2023 के संशोधन के बाद जन्म प्रमाणपत्र को स्कूल प्रवेश, मतदाता सूची, पासपोर्ट, आधार, ड्राइविंग लाइसेंस और सरकारी नौकरी जैसी अनेक प्रक्रियाओं में जन्म की तारीख और स्थान के प्रमुख प्रमाण के रूप में अधिक महत्व मिला। अब 2026 का संशोधन कहता है कि दो वर्ष से अधिक पुराने विलंबित जन्म या मृत्यु पंजीकरण में न्यायिक मजिस्ट्रेट सत्यापन करेंगे। सरकार का उद्देश्य फर्जी और संदिग्ध पंजीकरण रोकना हो सकता है और यह चिंता पूरी तरह अनुचित नहीं है। लेकिन कानून बनाते समय भारत की सामाजिक वास्तविकता भी सामने रखनी होगी। आज के डिजिटल अस्पतालों और ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन वाले भारत को 30, 40 या 60 वर्ष पहले के भारत पर लागू नहीं किया जा सकता। उस दौर में करोड़ों लोग गांवों में घरों पर पैदा हुए, बहुत से परिवार अशिक्षित थे और जन्म का तत्काल सरकारी पंजीकरण जीवन की अनिवार्यता नहीं माना जाता था। क्या आज उस पीढ़ी से आधुनिक डिजिटल भारत के मानकों के अनुरूप दस्तावेज मांगना न्यायपूर्ण होगा?

जिसके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं, क्या उसका जन्म नहीं हुआ?

यही सवाल इस कानून की आत्मा से जुड़ा है। मान लीजिए किसी 65 वर्षीय ग्रामीण महिला का जन्म घर पर हुआ था। उसके माता-पिता अब जीवित नहीं हैं। उस समय अस्पताल का रिकॉर्ड नहीं बना, जन्म प्रमाणपत्र नहीं बना। लेकिन उसके पास दशकों पुराने दूसरे सरकारी रिकॉर्ड हो सकते हैं; उसने चुनावों में मतदान किया हो सकता है, उसके बच्चे और पोते-पोतियां हों, वह वर्षों से सरकारी व्यवस्था में दर्ज हो। यदि किसी नई प्रक्रिया में उससे ऐसा मूल दस्तावेज मांगा जाए जो कभी बना ही नहीं था, तो वह कहां से लाएगी? कानून यह मानकर नहीं चल सकता कि कागज का न होना व्यक्ति के अस्तित्व का न होना है।

फर्जीवाड़ा रोकिए, मगर हर गरीब को संभावित फर्जी मत मानिए

यहां बहस को दो अतियों से बचाना होगा। यह कहना गलत होगा कि सरकार को दस्तावेजों की जांच ही नहीं करनी चाहिए। फर्जी जन्म प्रमाणपत्र, डुप्लीकेट मतदाता, गलत पहचान और धोखाधड़ी रोकना सरकार का कर्तव्य है। लेकिन दूसरा अतिवाद भी खतरनाक है—व्यवस्था ऐसी बना दी जाए जिसमें प्रत्येक नागरिक पहले संदिग्ध हो और फिर उसे खुद साबित करना पड़े कि वह वास्तविक है। लोकतांत्रिक राज्य में जांच का सिद्धांत risk-based होना चाहिए, न कि नागरिकों पर व्यापक संदेह आधारित। यदि किसी रिकॉर्ड में वास्तविक विसंगति है तो उसकी जांच कीजिए; लेकिन करोड़ों सामान्य लोगों को केवल इसलिए दस्तावेजों की भूलभुलैया में डाल देना कि कुछ लोग व्यवस्था का दुरुपयोग कर सकते हैं, अनुपातिक शासन नहीं कहा जा सकता।

SIR और जन्म प्रमाणपत्र को जोड़कर देखने पर तस्वीर बड़ी हो जाती है

कानूनी रूप से SIR और जन्म-मृत्यु पंजीकरण संशोधन अलग प्रक्रियाएं हैं और दोनों को एक ही योजना का हिस्सा बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। मगर नागरिक के नजरिए से दोनों एक बड़ी प्रवृत्ति की तरफ ध्यान खींचते हैं—अधिकारों तक पहुंच में दस्तावेजों की बढ़ती केंद्रीयता। एक जगह आपका नाम मतदाता सूची में होना जरूरी है। दूसरी जगह जन्म का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होता जा रहा है। कहीं आधार मांगा जाता है, कहीं निवास प्रमाण, कहीं आय प्रमाण, कहीं जाति प्रमाणपत्र। हर दस्तावेज दूसरे दस्तावेज पर निर्भर होने लगे तो अंततः उस गरीब नागरिक की स्थिति क्या होगी जिसके पास अपनी जिंदगी तो है, मगर जिंदगी का पूरा सरकारी पेपर ट्रेल नहीं है?

भारत की सबसे कमजोर आबादी के पास ही सबसे कमजोर ‘पेपर ट्रेल’ है

कागज आधारित व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है। जिसे अपने अधिकारों की सबसे ज्यादा जरूरत है, अक्सर उसी के दस्तावेज सबसे कमजोर होते हैं। भूमिहीन मजदूर के पास जमीन का रिकॉर्ड नहीं होगा। प्रवासी श्रमिक बार-बार पता बदलता है। बेघर व्यक्ति के लिए स्थायी निवास प्रमाण मुश्किल है। दशकों पहले घर में जन्मे बुजुर्ग के पास अस्पताल का जन्म रिकॉर्ड नहीं होगा। प्राकृतिक आपदाओं, विस्थापन या गरीबी से जूझे परिवारों के पुराने दस्तावेज नष्ट हो सकते हैं। महिलाओं के नाम विवाह के बाद बदल सकते हैं और पुराने तथा नए रिकॉर्ड में अंतर आ सकता है। स्पेलिंग की छोटी गलती भी अलग-अलग सरकारी डेटाबेस में बड़ी समस्या बन सकती है। इसलिए कागजी समानता वास्तविक समानता नहीं होती।

डिजिटल इंडिया में डेटाबेस आपस में बात करें, नागरिक फाइल लेकर दफ्तर-दफ्तर क्यों घूमे?

यदि सरकार के पास मतदाता सूची है, आधार डेटाबेस है, जन्म-मृत्यु रिकॉर्ड हैं, स्कूल रिकॉर्ड हैं और विभिन्न विभागों के दशकों पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, तो आधुनिक शासन का उद्देश्य नागरिक से बार-बार वही जानकारी मांगना नहीं बल्कि कानून और गोपनीयता की सीमाओं के भीतर सरकारी प्रणालियों को बेहतर सत्यापन योग्य बनाना होना चाहिए। सरकार के एक विभाग द्वारा पहले स्वीकार किए गए व्यक्ति को दूसरे विभाग के सामने शून्य से अपना अस्तित्व साबित करने के लिए खड़ा करना प्रशासनिक अक्षमता का आसान समाधान है, सुशासन नहीं।

न्यायिक मजिस्ट्रेट सुरक्षा कवच भी हो सकते हैं, नई बाधा भी

दो साल से ज्यादा पुराने जन्म-मृत्यु पंजीकरण में न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका को केवल नकारात्मक नजरिए से देखना भी उचित नहीं होगा। कार्यपालिका से मामला अलग होकर न्यायिक अधिकारी के पास जाना निष्पक्षता का एक अतिरिक्त स्तर प्रदान कर सकता है। लेकिन इसके लिए प्रक्रिया सरल, समयबद्ध और गरीब के लिए लगभग निःशुल्क होनी चाहिए। अगर गांव के व्यक्ति को जिला मुख्यालय जाना पड़े, वकील करना पड़े, कई तारीखें लेनी पड़ें और गवाह या दशकों पुराने दस्तावेज जुटाने पड़ें, तो जो व्यवस्था फर्जीवाड़ा रोकने के लिए बनाई गई है वही वास्तविक नागरिक के लिए दीवार बन सकती है।

लोकतंत्र में ‘गलत समावेशन’ जितना गंभीर है, ‘गलत बहिष्करण’ भी उतना ही गंभीर है

सरकारी सोच अक्सर पूछती है—कहीं कोई अपात्र व्यक्ति सूची में शामिल तो नहीं हो गया? यह जरूरी प्रश्न है। लेकिन लोकतंत्र को समान गंभीरता से दूसरा प्रश्न भी पूछना चाहिए—कहीं कोई पात्र व्यक्ति सूची से बाहर तो नहीं हो गया? फर्जी मतदाता का वोट लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाता है तो वास्तविक मतदाता को वोट देने से रोकना भी लोकतंत्र को उतना ही नुकसान पहुंचाता है। फर्जी जन्म प्रमाणपत्र गलत है, लेकिन वास्तविक व्यक्ति को जन्म प्रमाणपत्र न मिल पाना भी प्रशासनिक अन्याय है। नीति का उद्देश्य केवल wrongful inclusion रोकना नहीं, wrongful exclusion रोकना भी होना चाहिए।

एक बूढ़े मतदाता से यह मत पूछिए कि वह इस देश में कब पैदा हुआ था—पहले अपनी फाइल देखिए

कल्पना कीजिए उस बुजुर्ग की जिसने 1980, 1990, 2000, 2010 और उसके बाद चुनावों में वोट डाला। सरकारों को बनते-बिगड़ते देखा। चुनाव आयोग ने वर्षों तक उसका नाम स्वीकार किया। सरकारी योजनाओं ने उसकी पहचान स्वीकार की। फिर किसी नई कवायद में उसका नाम गायब हो जाए और व्यवस्था उससे कहे—पहले साबित कीजिए कि आप पात्र हैं। ऐसे में प्रश्न केवल कानूनी नहीं रह जाता, नैतिक भी हो जाता है। अगर राज्य ने किसी व्यक्ति को दशकों तक अपने रिकॉर्ड में स्वीकार किया है, तो उसके रिकॉर्ड को अचानक अस्वीकार करने से पहले प्रमाण देने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य पर भी होनी चाहिए।

‘कागज दिखाओ’ शासन का स्थायी दर्शन नहीं बन सकता

भारत जैसे विशाल और असमान देश में दस्तावेज आवश्यक हैं, लेकिन दस्तावेज मनुष्य से बड़े नहीं हो सकते। संविधान ने अधिकार कागजों को नहीं, व्यक्तियों को दिए हैं। प्रशासन को प्रमाण चाहिए—मगर प्रमाण मांगने की प्रक्रिया ऐसी नहीं हो सकती कि नागरिक अधिकार हासिल करने के बजाय अपना अस्तित्व साबित करने में ही जिंदगी लगा दे।

SIR की बहस हो या जन्म-मृत्यु पंजीकरण का नया कानून, सरकार और संसद को एक स्पष्ट सुरक्षा सिद्धांत स्थापित करना चाहिए—पुराने सरकारी रिकॉर्ड को उचित महत्व मिले; केवल दस्तावेज की कमी के कारण किसी पात्र व्यक्ति को अधिकार से वंचित न किया जाए; वैकल्पिक प्रमाण उपलब्ध हों; रिकॉर्ड में मामूली नाम, उम्र या स्पेलिंग अंतर को धोखाधड़ी न माना जाए; और किसी व्यक्ति का वोट या बुनियादी अधिकार प्रभावित करने से पहले उसे वास्तविक, आसान और प्रभावी सुनवाई का अवसर मिले।

आखिर नागरिक कितनी बार साबित करेगा कि वह इसी देश का है?

यही आज का सबसे बड़ा प्रश्न है। जन्म के समय प्रमाण दीजिए। स्कूल में प्रमाण दीजिए। नौकरी में प्रमाण दीजिए। आधार के लिए पहचान दीजिए। पासपोर्ट में फिर प्रमाण दीजिए। मतदाता सूची के पुनरीक्षण में फिर कागज लेकर खड़े हो जाइए। किसी रिकॉर्ड में अंतर निकल आए तो दोबारा साबित कीजिए कि आप वही व्यक्ति हैं जिसे सरकार पिछले तीस वर्षों से जानती है।

लोकतंत्र नागरिक और राज्य के बीच भरोसे का रिश्ता है। यदि उस रिश्ते की जगह लगातार दस्तावेजी संदेह ले ले तो कागज व्यवस्था सुधारने के बजाय अधिकारों का दरबान बन जाता है।

फर्जीवाड़े पर सरकार जितनी चाहे सख्ती करे। फर्जी वोटर हटाए, फर्जी जन्म प्रमाणपत्र रोके, डुप्लीकेट रिकॉर्ड समाप्त करे—इस पर किसी लोकतांत्रिक समाज को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन व्यवस्था की एक लाल रेखा होनी चाहिए: सौ गलत लोगों को पकड़ने की कोशिश में एक वास्तविक नागरिक का संवैधानिक अधिकार भी न छिने। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे भयावह स्थिति वह होगी जब सामने जीवित नागरिक खड़ा हो और कंप्यूटर कहे—रिकॉर्ड नहीं मिला।
तब ‘Proof of Life’, सचमुच ‘Burden of Proof’ बन जाएगा।

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