ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 जून 2026
अगर 19 जून को प्रस्तावित अमेरिका-ईरान समझौता अपने मौजूदा स्वरूप में लागू हो जाता है, तो यह केवल एक युद्धविराम या परमाणु विवाद का समाधान नहीं होगा। यह 21वीं सदी के सबसे बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रमों में से एक माना जाएगा। और इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस ईरान को पिछले चार दशकों से दुनिया का सबसे बड़ा “अलग-थलग” देश बताया जाता रहा, वही आज अमेरिका के साथ बराबरी की मेज पर बैठकर शर्तें तय करता दिखाई दे रहा है।
समझौते के संभावित बिंदुओं पर नजर डालें तो तस्वीर साफ होती है। ईरान के लगभग 125 बिलियन डॉलर के जमे हुए विदेशी फंड जारी होने की बात है। अमेरिकी प्रतिबंधों में राहत का रास्ता खुल रहा है। ईरानी तेल निर्यात पर लगे अवरोध हट सकते हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य फिर से खुलने की दिशा में बढ़ रहा है। अमेरिका 300 बिलियन डॉलर तक के पुनर्निर्माण पैकेज की बात कर रहा है। और सबसे महत्वपूर्ण, ईरान का शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं किया जा रहा बल्कि आगे की बातचीत के लिए सुरक्षित रखा जा रहा है।
यानी चार महीने के युद्ध, दशकों के प्रतिबंध और भारी सैन्य दबाव के बाद भी अमेरिका को वही करना पड़ रहा है जिससे वह वर्षों तक बचता रहा—ईरान से बातचीत।
सबसे बड़ा राजनीतिक झटका शायद इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए है। पिछले लगभग 30 वर्षों से नेतन्याहू अमेरिकी राष्ट्रपतियों को यह समझाने की कोशिश करते रहे कि ईरान को केवल सैन्य ताकत से रोका जा सकता है। उन्होंने बराक ओबामा से लेकर जो बाइडेन और डोनाल्ड ट्रंप तक लगभग हर प्रशासन पर दबाव बनाया। लेकिन आज परिणाम यह है कि युद्ध के बाद भी ईरान सत्ता में है, उसका राजनीतिक ढांचा कायम है, उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ और वह नई आर्थिक राहत के साथ आगे बढ़ने की स्थिति में दिखाई दे रहा है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि समझौते की शर्तें इसी रूप में लागू होती हैं तो तेहरान इसे अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश करेगा। ईरानी नेतृत्व वर्षों से अपने नागरिकों से कहता रहा कि “प्रतिरोध” का रास्ता कठिन है लेकिन अंततः लाभ देगा। अब वे दावा कर सकेंगे कि प्रतिबंधों, अलगाव और युद्ध के बावजूद उन्होंने अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता नहीं छोड़ी।
इस पूरी कहानी का एक और बड़ा पात्र पाकिस्तान है। यदि वास्तव में इस समझौते में इस्लामाबाद की मध्यस्थता निर्णायक रही है, तो यह पाकिस्तान की कूटनीतिक छवि के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। पिछले एक दशक में आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद के आरोपों के कारण पाकिस्तान वैश्विक मंच पर रक्षात्मक स्थिति में था। लेकिन यदि अमेरिका और ईरान जैसे कट्टर विरोधी देशों के बीच पुल बनाने का श्रेय उसे मिलता है, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय उपयोगिता और रणनीतिक अहमियत फिर से बढ़ सकती है।
यहीं भारत को लेकर सवाल उठने शुरू होते हैं।
नरेंद्र मोदी सरकार पिछले एक दशक से भारत को “वैश्विक मध्यस्थ”, “विश्वगुरु” और “वैश्विक दक्षिण की आवाज़” के रूप में प्रस्तुत करती रही है। भारत ने G20 की अध्यक्षता की, क्वाड में अपनी भूमिका बढ़ाई, अमेरिका से संबंध मजबूत किए और पश्चिम एशिया में इज़राइल, सऊदी अरब, यूएई तथा ईरान—सभी के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखने की कोशिश की। लेकिन यदि सदी के सबसे बड़े शांति समझौतों में से एक में भारत कहीं दिखाई नहीं देता और मध्यस्थ की भूमिका पाकिस्तान निभाता है, तो स्वाभाविक रूप से विदेश नीति को लेकर प्रश्न उठेंगे।
हालांकि यह भी सच है कि हर बड़े समझौते में हर बड़ी शक्ति की भूमिका नहीं होती। कई बार देशों की रणनीति जानबूझकर पर्दे के पीछे रहने की होती है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत पूरी तरह अप्रासंगिक था। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक बड़ा अवसर जरूर मिल गया है।
दूसरी ओर अमेरिका और इज़राइल की घरेलू राजनीति भी इस समझौते की बड़ी वजह मानी जा रही है। इज़राइल में अक्टूबर में चुनाव होने हैं और कई सर्वेक्षणों में नेतन्याहू तथा उनकी लिकुड पार्टी दबाव में दिखाई दे रही है। लगातार युद्ध और आर्थिक बोझ ने जनता में असंतोष बढ़ाया है। अमेरिका में भी नवंबर के मध्यावधि चुनाव ट्रंप प्रशासन के लिए चुनौती बन सकते हैं। बढ़ती तेल कीमतें, युद्ध की थकान और घरेलू राजनीतिक दबाव ने व्हाइट हाउस को भी समझौते की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि किसने घुटने टेके और किसने जीत हासिल की। असली सवाल यह है कि बदलती दुनिया में शक्ति का अर्थ क्या है? क्या सैन्य ताकत ही अंतिम शक्ति है, या आर्थिक स्थिरता, कूटनीति और राजनीतिक धैर्य उससे भी बड़ी ताकत बन चुके हैं?
यदि यह समझौता सफल होता है, तो इतिहास शायद इसे उस क्षण के रूप में याद रखेगा जब पश्चिम एशिया की राजनीति का नया अध्याय शुरू हुआ। एक ऐसा अध्याय जिसमें ईरान अलग-थलग राष्ट्र नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरा; पाकिस्तान ने अप्रत्याशित कूटनीतिक भूमिका निभाई; और भारत को यह सोचने का अवसर मिला कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में उसकी भूमिका केवल दर्शक की होगी या निर्णायक खिलाड़ी की।
क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में खाली जगह कभी खाली नहीं रहती। जो जगह एक देश छोड़ता है, उसे कोई दूसरा भर देता है। और यही इस पूरे समझौते का सबसे बड़ा सबक है।




