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11 दिन की गैरहाजिरी पर नौकरी छीनना गलत, सबसे बड़ा मुकदमेबाज कौन?—सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को दोहरा झटका

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अप्रैल 2026

देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि मात्र 11 दिन की गैरहाजिरी के आधार पर किसी कर्मचारी को नौकरी से निकालना न तो न्यायसंगत है और न ही कानून के अनुरूप। अदालत ने Central Industrial Security Force (CISF) के एक कर्मचारी को राहत देते हुए उसकी बर्खास्तगी को गलत ठहराया और केंद्र सरकार को कड़ी फटकार के साथ जुर्माना भी लगाया।

यह मामला CISF के एक जवान से जुड़ा था, जिसे सीमित अवधि की अनुपस्थिति के चलते सेवा से हटा दिया गया था। कर्मचारी ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी, जहां सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि अनुपस्थिति की अवधि बहुत लंबी नहीं थी और इसके पीछे परिस्थितियां भी थीं, जिन्हें विभाग ने नजरअंदाज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी व्यक्ति की आजीविका से जुड़े मामलों में प्रशासन को संतुलन और संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने “प्राकृतिक न्याय” के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि सजा अपराध के अनुपात में होनी चाहिए। केवल गैरहाजिरी के आधार पर इतनी कठोर कार्रवाई करना अनुचित है। कोर्ट ने कर्मचारी को राहत देने और उस पर लगाया गया दंड निरस्त करने के निर्देश दिए।

इसी मामले से जुड़े दूसरे पहलू में अदालत ने केंद्र सरकार के रवैये पर भी तीखी टिप्पणी की। Punjab and Haryana High Court पहले ही कर्मचारी को राहत दे चुका था, इसके बावजूद केंद्र सरकार इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। इस पर जस्टिस B. V. Nagarathna और जस्टिस Ujjal Bhuyan की बेंच ने नाराजगी जताई।

कोर्ट ने टिप्पणी की—“जब हाईकोर्ट ने सजा को अत्यधिक मानते हुए राहत दे दी, तो इस मामले को यहां लाने की क्या जरूरत थी?” इसके साथ ही विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज करते हुए केंद्र सरकार पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी सबसे ज्यादा चर्चा में रही। उन्होंने कहा—“हम बार-बार लंबित मामलों की बात सुनते हैं, लेकिन सबसे बड़ा मुकदमेबाज कौन है?” इस सवाल के जरिए अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि सरकार खुद ही अनावश्यक मुकदमों के जरिए न्यायपालिका पर बोझ बढ़ा रही है।

अदालत ने केंद्र सरकार को नसीहत दी कि हर फैसले को चुनौती देने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जाए और मामलों को सुप्रीम कोर्ट तक लाने से पहले गंभीर कानूनी समीक्षा की जाए। कोर्ट का मानना है कि इस तरह की “रूटीन अपील” न केवल न्यायिक समय की बर्बादी है, बल्कि आम नागरिकों के मामलों में देरी का कारण भी बनती है।

यह फैसला केवल एक कर्मचारी को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सरकारी सिस्टम के लिए एक स्पष्ट संदेश है—कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि न्याय और संतुलन सुनिश्चित करना है।

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