अंतरराष्ट्रीय/ पश्चिम एशिया | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 अक्टूबर 2026
इजरायल में बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता पर संकट गहराने का सवाल केवल एक प्रधानमंत्री की कुर्सी तक सीमित नहीं है। इसके साथ एक बड़ा सवाल जुड़ा है—क्या नेतन्याहू की राजनीतिक हार ईरान के खिलाफ जारी युद्ध की दिशा बदल सकती है, या फिर चेहरा बदलने के बावजूद युद्ध की मशीन चलती रहेगी? दुनिया की निगाहें इजरायल की राजनीति, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर टिकी हैं।
इजरायल का यह चुनाव 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान तथा ईरान से जुड़े सैन्य संघर्षों के बाद बेहद अहम राजनीतिक परीक्षा बन गया है। नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ कठोर सैन्य नीति को अपनी सुरक्षा रणनीति का प्रमुख हिस्सा बनाया है। लेकिन अब सवाल है कि क्या इस नीति को इजरायल की जनता का समर्थन मिलता रहेगा?
नेतन्याहू गए तो क्या युद्ध भी जाएगा?
यह मान लेना बड़ी भूल होगी कि नेतन्याहू की हार होते ही ईरान के खिलाफ युद्ध रुक जाएगा। इजरायल की सुरक्षा नीति केवल एक व्यक्ति के फैसलों पर निर्भर नहीं करती। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, उसकी क्षेत्रीय भूमिका और इजरायल की सुरक्षा चिंताएं वहां की राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं।
विपक्षी नेता गादी आइज़ेनकोट के सत्ता में आने की स्थिति में भी ईरान के प्रति नीति में तत्काल और बुनियादी बदलाव की गारंटी नहीं है। किसी नए नेतृत्व को यह तय करना होगा कि सैन्य कार्रवाई जारी रखनी है, रणनीति बदलनी है या बातचीत के रास्ते तलाशने हैं। इसलिए नेतन्याहू की संभावित हार राजनीतिक बदलाव तो ला सकती है, लेकिन अपने आप शांति नहीं ला सकती।
ट्रंप का फैसला: समझौता या फिर बमबारी?
इस पूरे संघर्ष में सबसे बड़ा सवाल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति का है। नेतन्याहू ने अपने चुनाव अभियान में ट्रंप के समर्थन को अपनी ताकत के रूप में पेश किया है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति का अपना राजनीतिक एजेंडा और सैन्य आकलन भी है। द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच प्रतिबंधों, तेल निर्यात और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर टकराव जारी है। बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई का विकल्प भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
यानी नेतन्याहू के चुनाव हारने के बाद भी युद्ध का फैसला वॉशिंगटन में हो सकता है। अगर ट्रंप सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू करने का निर्णय लेते हैं, तो इजरायल में नया नेतृत्व आने भर से संघर्ष नहीं रुकेगा। दूसरी ओर, यदि अमेरिका बातचीत और समझौते का रास्ता चुनता है, तो इजरायल की नई सरकार को कूटनीतिक पहल के लिए अधिक गुंजाइश मिल सकती है।
गादी आइज़ेनकोट आए तो क्या बदलेगी रणनीति?
नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गादी आइज़ेनकोट पूर्व सैन्य प्रमुख हैं। उन्होंने नेतन्याहू के नेतृत्व और सुरक्षा नीति के संचालन की आलोचना की है, लेकिन ईरान को लेकर उनका रुख पूरी तरह नरम होने के संकेत नहीं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आइज़ेनकोट भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य क्षमताओं को इजरायल के लिए गंभीर सुरक्षा चुनौती मानते हैं।
इसलिए सत्ता परिवर्तन का सबसे बड़ा असर युद्ध के तरीके, समय और राजनीतिक प्रबंधन पर पड़ सकता है—जरूरी नहीं कि इजरायल की मूल सुरक्षा नीति ही बदल जाए। नई सरकार को गठबंधन बनाने के लिए भी राजनीतिक दलों के साथ बातचीत करनी होगी। गठबंधन की शर्तें तय करेंगी कि वह युद्ध और शांति के मामले में कितनी स्वतंत्रता से फैसले ले सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: युद्ध का असर दुनिया की जेब पर
ईरान-अमेरिका टकराव का असर तेल, व्यापार और समुद्री सुरक्षा पर पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण मार्ग है। यहां तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों, माल ढुलाई और कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के अधिकारियों की ईरान के साथ तनाव कम करने की कोशिशों का भी उल्लेख है। कतर भी मध्यस्थता में शामिल रहा है।
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर खोलने की पेशकश को अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की शर्त से जोड़ा है। दोनों पक्षों के बीच बातचीत की शर्तों पर मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में युद्ध का असर केवल सैन्य मोर्चे पर नहीं, बल्कि ऊर्जा बाजार और आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है।
सत्ता बदले या न बदले, युद्ध का अंत जरूरी
नेतन्याहू की संभावित हार से तत्काल सैन्य तनाव कम करने का अवसर पैदा हो सकता है, लेकिन इसे शांति की गारंटी मानना गलत होगा। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, अमेरिकी प्रतिबंधों, समुद्री नाकेबंदी और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बुनियादी मतभेद अब भी मौजूद हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रंप और इजरायल का अगला नेतृत्व सैन्य ताकत के प्रदर्शन से आगे बढ़कर किसी टिकाऊ समझौते की दिशा में कदम उठाएंगे? या फिर सत्ता की राजनीति और सुरक्षा के नाम पर पश्चिम एशिया को एक और लंबे संघर्ष की ओर धकेला जाएगा?
नेतन्याहू की हार युद्ध की दिशा बदल सकती है, लेकिन युद्ध रोकने का फैसला कई पक्षों को लेना होगा। इजरायल का चुनाव, ट्रंप की रणनीति और ईरान की प्रतिक्रिया मिलकर तय करेंगे कि क्षेत्र को कूटनीति का अवसर मिलता है या टकराव का एक और दौर।



