अंतरराष्ट्रीय/ विशेष रिपोर्ट | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 अक्टूबर 2026
क्या जीवन का मकसद सिर्फ पैसा कमाना, परिवार बसाना और अपनी इच्छाएं पूरी करना है? या इंसान के जीवन में कोई ऐसा लक्ष्य भी है, जिसके लिए वह अपनी सुख-सुविधाएं छोड़कर दूसरों की सेवा में लग जाए? भूटान के बौद्ध भिक्षु पेमा वांगेल की जिंदगी इन सवालों के जवाब तलाशने की एक दिलचस्प कोशिश है। महज 17 साल की उम्र में उन्होंने भिक्षु बनने का फैसला किया। करीब 20 साल से वह बौद्ध मठ में रहकर अध्ययन, साधना और अनुशासन का जीवन जी रहे हैं। लेकिन इतने लंबे समय के बाद भी वह खुद को ज्ञान की अंतिम मंजिल पर पहुंचा हुआ नहीं मानते।
पेमा वांगेल की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि वह संन्यास को किसी चमत्कारी शक्ति या हर समस्या का समाधान नहीं मानते। उनका कहना है कि भिक्षु भी आम इंसानों की तरह होते हैं। उनके पास हर सवाल का जवाब नहीं होता और न ही वे हर व्यक्ति की परेशानी दूर कर सकते हैं। फर्क इतना है कि उन्होंने जीवन जीने का एक अलग रास्ता चुना है और लगातार सीखने की कोशिश कर रहे हैं।
बचपन में भिक्षुओं को सुपरहीरो मानते थे
भूटान के पूर्वी इलाके में एक दूरदराज के गांव में पले-बढ़े पेमा ने बचपन से भिक्षुओं को लोगों की मदद करते देखा। गांव में जब किसी परिवार पर मुसीबत आती, कोई आपदा होती या किसी को सहायता की जरूरत पड़ती, तो लोग मठ पहुंचते थे। भिक्षु दिन हो या रात, मदद के लिए निकल पड़ते थे।
सबसे खास बात यह थी कि वे सेवा के बदले पैसे की मांग नहीं करते थे। लोग भोजन, चाय या कुछ पैसे देते, तो कई बार भिक्षु जरूरतमंद परिवार की स्थिति देखकर पैसे वापस कर देते थे। पेमा के मन पर इसका गहरा असर पड़ा।
उन्हें लगा कि यदि जीवन में कुछ अच्छा करना है, तो ऐसे लोगों के साथ जुड़ना चाहिए जो अपना समय दूसरों की मदद में लगाते हैं। इसी भावना ने उन्हें भिक्षु बनने के लिए प्रेरित किया।
17 साल की उम्र में भी मन में था संदेह
पेमा जब 17 साल के थे, तब उन्हें 70 से 80 प्रतिशत भरोसा था कि वह भिक्षु बनना चाहते हैं। लेकिन वह पूरी तरह निश्चित नहीं थे। इसकी वजह थी परिवार की उम्मीदें। वह अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे। परिवार चाहता तो उनसे आगे पढ़ने, नौकरी करने और घर की जिम्मेदारियां संभालने की उम्मीद कर सकता था।
इसी दौरान उनके गांव के एक वरिष्ठ बौद्ध गुरु ने उन्हें मठ में प्रवेश लेने की सलाह दी। गुरु की बात से पेमा को अपने परिवार के सामने इच्छा रखने का अवसर मिला। उनकी दादी ने भी दूसरे परिजनों तक यह बात पहुंचाने में मदद की। परिवार के लगभग सभी लोगों ने उनके फैसले का समर्थन किया। कुछ रिश्तेदार चाहते थे कि वह पहले कॉलेज या विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी कर लें, लेकिन अंततः पेमा ने मठ का रास्ता चुना।
भिक्षु होना मतलब हर समय जिम्मेदारी
करीब दो दशक से भिक्षु का जीवन जी रहे पेमा कहते हैं कि लोग अक्सर उनसे बहुत ज्यादा उम्मीदें रखते हैं। जब किसी व्यक्ति को पता चलता है कि सामने वाला 20 साल से भिक्षु है, तो वह मान लेता है कि उसे जीवन की हर समस्या का समाधान पता होगा।
पेमा इस सोच से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि भिक्षु कोई अलौकिक शक्ति रखने वाले व्यक्ति नहीं होते। वे भी इंसान हैं, उनकी भी सीमाएं हैं और वे भी गलतियां कर सकते हैं।
हालांकि, भिक्षु बनने के बाद उनकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उन्हें अपनी बातों, व्यवहार और फैसलों के प्रति अधिक सावधान रहना पड़ता है, क्योंकि उनके आचरण से लोग केवल उन्हें ही नहीं, बल्कि उनके गुरु, मठ और बौद्ध परंपरा को भी परखते हैं।
बौद्ध धर्म का मतलब केवल ध्यान लगाना नहीं
आम तौर पर बौद्ध धर्म का नाम सुनते ही ध्यान और शांति की तस्वीर सामने आती है। लेकिन पेमा के मुताबिक, बौद्ध धर्म केवल ध्यान लगाने तक सीमित नहीं है। यह जीवन जीने का एक तरीका है, जो इंसान को अपने व्यवहार, इच्छाओं और दुखों को समझने की दिशा देता है।
उन्होंने भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ी कथाओं का उल्लेख करते हुए करुणा और दूसरों की रक्षा करने के महत्व को समझाया। एक प्रसिद्ध बौद्ध कथा में राजकुमार सिद्धार्थ एक घायल पक्षी की रक्षा करते हैं। जहां उनके चचेरे भाई देवदत्त पक्षी पर अपना अधिकार जताते हैं, वहीं सिद्धार्थ का तर्क है कि जीवन बचाने वाले का दावा अधिक महत्वपूर्ण है।
इस कथा का संदेश स्पष्ट है—किसी जीव को नुकसान पहुंचाने के बजाय उसकी रक्षा करना करुणा का उदाहरण है।
पिछले जन्म पर सवाल, अगले जीवन की तैयारी क्यों?
बातचीत में एक दिलचस्प सवाल यह भी उठा कि यदि इंसान को अपने पिछले जन्म याद नहीं रहते, तो वह अगले जन्म के लिए पुण्य कमाने और साधना करने में अपना जीवन क्यों लगाए?
पेमा ने बौद्ध मान्यता के आधार पर जवाब दिया कि स्मृति में किसी घटना का न होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह घटना कभी हुई ही नहीं। उन्होंने उदाहरण दिया कि इंसान कई दिन पहले क्या खाया था, यह भूल सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उसने भोजन नहीं किया था।
बौद्ध परंपरा में पुनर्जन्म और कर्म को महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, ये धार्मिक और दार्शनिक मान्यताएं हैं; इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।
पेमा के अनुसार, साधना का अंतिम लक्ष्य केवल पुण्य कमाना नहीं, बल्कि दुख से मुक्ति, स्थायी शांति और दूसरे जीवों की सेवा है।
ज्ञान की मंजिल कब मिलेगी, इसका जवाब नहीं
करीब 20 साल तक भिक्षु रहने के बाद भी पेमा यह दावा नहीं करते कि वह ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं। वह मानते हैं कि उन्होंने अब तक बहुत कुछ सीखा है, लेकिन अभ्यास में हमेशा पूरी तरह समर्पित नहीं रह पाए। मठ की जिम्मेदारियां, अध्ययन और दूसरे काम भी उनके जीवन का हिस्सा हैं।
उनकी बातों से एक महत्वपूर्ण संदेश निकलता है—किसी रास्ते को चुन लेना मंजिल तक पहुंच जाने के बराबर नहीं है। सीखने, अपने भीतर झांकने और अपनी कमियों को स्वीकार करने की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
पेमा की कहानी यह भी याद दिलाती है कि जीवन में दिशा खोजने के लिए केवल दूसरों की बातें सुनना पर्याप्त नहीं। उनके मुताबिक, इंसान को ज्यादा सीखना चाहिए, ध्यान से सुनना चाहिए और अपने आसपास की दुनिया को गौर से देखना चाहिए।
शायद यही इस पूरी बातचीत का सबसे मानवीय संदेश है: सच्ची समझ का मतलब हर सवाल का जवाब जानना नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं को पहचानते हुए सीखते रहने का साहस रखना है।



