राष्ट्रीय/ राजनीति | प्रशांत टंडन, वरिष्ठ पत्रकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 अक्टूबर 2026
चुनाव आयोग के हलफनामे ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और आयोग की जवाबदेही पर बहस को और तेज कर दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में आयोग ने कहा है कि याचिका एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित है। लेकिन इसी हलफनामे में दर्ज कई दलीलें नए सवाल खड़े करती हैं—विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को मंजूरी कब और कैसे दी गई? तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति का रिकॉर्ड कहां है? और जब आयोग कहता है कि आपात स्थिति में इलेक्ट्रॉनिक तरीके से मंजूरी लेकर बाद में फाइल पर दर्ज किया जा सकता है, तो उस प्रक्रिया का पूरा हिसाब जनता के सामने क्यों न हो?
सबसे बड़ा विवाद फॉर्म-6 को लेकर है। आयोग का कहना है कि फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया और उसमें बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन में दिखाई देने वाली व्यवस्था को संशोधन के रूप में समझा जा सकता था। अब ऑनलाइन आवेदन को फॉर्म-6 और अलग घोषणा-पत्र में बांटने की बात कही गई है, ताकि यह व्यवस्था भौतिक फॉर्म की तरह हो।
यहीं सवाल उठता है: अगर ऑनलाइन व्यवस्था को देखकर लोग उसे फॉर्म-6 में बदलाव समझ सकते थे, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या संवैधानिक संस्था का दायित्व सिर्फ यह कहना है कि आधिकारिक फॉर्म नहीं बदला, या यह भी सुनिश्चित करना है कि ऑनलाइन और कागजी प्रक्रिया में कोई भ्रम न रहे?
सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि उसने फॉर्म-6 के किसी संशोधित संस्करण को मंजूरी नहीं दी। अदालत ने यह भी जानना चाहा था कि बदलाव किसने किया और रिकॉर्ड में इसकी स्थिति क्या है। ऐसे में आयोग का यह कहना कि फॉर्म-6 बदला ही नहीं गया, विवाद को खत्म नहीं करता। सवाल यह है कि ऑनलाइन व्यवस्था में जो बदलाव जैसा दिखाई दिया, उसकी जिम्मेदारी किसकी थी और उसे लागू करने से पहले कानूनी जांच क्यों नहीं हुई?
इलेक्ट्रॉनिक मंजूरी बाद में फाइल पर—आखिर प्रक्रिया क्या है?
आयोग ने हलफनामे में कहा है कि सामान्य तौर पर फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त के पास जाती है। आपात स्थिति में इलेक्ट्रॉनिक तरीके से मंजूरी ली जा सकती है और बाद में उसे फाइल पर दर्ज किया जा सकता है।
लेकिन यही वह बिंदु है, जहां पारदर्शिता की मांग और मजबूत हो जाती है। यदि SIR के तीनों आदेश—24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026—तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए थे, जैसा आयोग का दावा है, तो मंजूरी की तारीख, संबंधित रिकॉर्ड और निर्णय लेने की प्रक्रिया सामने रखने में परेशानी क्या है?
क्या हर इलेक्ट्रॉनिक मंजूरी का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध है? क्या यह दर्ज है कि किस आयुक्त ने कब सहमति दी? क्या किसी बैठक में फैसला हुआ या तत्काल मंजूरी लेकर बाद में फाइल पूरी की गई? इन सवालों के जवाब केवल बयान से नहीं, दस्तावेजों से मिलने चाहिए।
आयुक्तों की आपत्तियां क्या थीं?
विवाद की पृष्ठभूमि में चुनाव आयुक्तों के बीच निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल भी हैं। एक रिपोर्ट में दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से दस महीनों में SIR और चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात कही गई थी। आयोग ने जवाब में कहा है कि किसी आयुक्त की टिप्पणी, सुझाव या सवाल अपने आप में आयोग का अंतिम फैसला नहीं होता।
लेकिन लोकतांत्रिक संस्था में असहमति को महज फाइल पर लिखी टिप्पणी बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह जानना जरूरी है कि आपत्तियां किन मुद्दों पर थीं, उनका निपटारा कैसे हुआ और अंतिम निर्णय तक पहुंचने की प्रक्रिया क्या रही। आयोग सर्वसम्मति का दावा कर रहा है, इसलिए उस दावे की पुष्टि करने वाला रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण है।
पश्चिम बंगाल और गोवा पर भी सवाल
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के खिलाफ दाखिल अपीलों पर आयोग ने कहा है कि ये अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत दायर की थीं और ये मामले आयोग के सामने नहीं लाए गए थे। गोवा के 97 मतदाताओं के मामले में आयोग ने बताया कि 88 पहले ही मतदाता सूची में शामिल हो चुके थे, छह विदेश में थे और तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे।
इन स्पष्टीकरणों की स्वतंत्र जांच और दस्तावेजी पुष्टि जरूरी है। मतदाता सूची का मामला किसी पार्टी के फायदे या नुकसान से बड़ा है। एक भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से छूटना या किसी अपात्र व्यक्ति का नाम जुड़ना गंभीर सवाल खड़ा करता है।
जवाबदेही से ऊपर कोई संवैधानिक पद नहीं
आयोग ने याचिका को सुनवाई योग्य नहीं बताते हुए कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी है। उसने यह भी कहा कि हलफनामा दशहरे की छुट्टियों के कारण संक्षिप्त रखा गया है और विस्तृत जवाब दाखिल करने की अनुमति मांगी गई है।
लेकिन पद की सुरक्षा और संस्था की जवाबदेही दो अलग बातें हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की कठिन संवैधानिक प्रक्रिया का अर्थ यह नहीं कि उनके फैसलों, आयोग की कार्यप्रणाली या मतदाता सूची से जुड़े सवालों की जांच नहीं हो सकती।
चुनाव आयोग का काम केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि यह भरोसा कायम रखना भी है कि हर मतदाता के अधिकार की रक्षा होगी और हर बड़ा फैसला कानून तथा पारदर्शी प्रक्रिया के अनुसार लिया जाएगा।
अब सवाल सीधे हैं: फॉर्म-6 की ऑनलाइन प्रस्तुति में बदलाव जैसा भ्रम क्यों पैदा हुआ? SIR के तीनों आदेशों की मंजूरी का पूरा रिकॉर्ड कहां है? इलेक्ट्रॉनिक सहमति कब ली गई और फाइल पर कब दर्ज हुई? आयुक्तों की आपत्तियों का निपटारा किस आधार पर हुआ?
इन सवालों का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, रिकॉर्ड और स्पष्ट जवाबदेही से मिलना चाहिए। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता किसी हलफनामे में सर्वसम्मति लिख देने से नहीं, बल्कि जनता के सामने प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने से कायम होगी।



