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TMC में ऐतिहासिक विद्रोह! 28 में से 19 लोकसभा सांसद बागी, 12 राज्यसभा सांसदों में 2 ने दिया इस्तीफा, 64 विधायक भी अलग राह पर

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता/नई दिल्ली | 11 जून 2026

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने गठन के बाद के सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। एक समय ममता बनर्जी के नेतृत्व में अपराजेय मानी जाने वाली पार्टी अब अभूतपूर्व राजनीतिक विद्रोह से जूझ रही है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 19 सांसद बागी खेमे में बताए जा रहे हैं। इसके साथ ही राज्यसभा में भी TMC को बड़ा झटका लगा है, जहां उसके 12 सांसदों में से दो सांसदों ने इस्तीफा देकर पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। विधानसभा में भी स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है, जहां 80 विधायकों में से 64 विधायक नेतृत्व से असंतुष्ट माने जा रहे हैं।

लोकसभा में बागी सांसदों की सूची में बारासात की काकोली घोष, कूचबिहार के जगदीश चंद्र बसुनिया, जंगीपुर के खलीलुर रहमान, बहरामपुर के यूसुफ पठान, मुर्शिदाबाद के अबू ताहिर खान, बैरकपुर के पार्थ भौमिक, मथुरापुर के बापी हलदार, जादवपुर की सायोनी घोष, कोलकाता दक्षिण की माला रॉय, आरामबाग की मिताली बाग, घाटाल के दीपक अधिकारी, झाड़ग्राम के कालीपद सोरेन, मेदिनीपुर की जून मालिया, बांकुड़ा के अरूप चक्रवर्ती, वर्धमान पूर्व की डॉ. शर्मिला सरकार, आसनसोल के शत्रुघ्न सिन्हा, बोलपुर के असित कुमार माल, बीरभूम की शताब्दी रॉय और हुगली की रचना बनर्जी जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। इन नेताओं का एक साथ नेतृत्व से दूरी बनाना केवल राजनीतिक असहमति नहीं बल्कि पार्टी संगठन की जड़ों तक पहुंच चुके असंतोष का संकेत माना जा रहा है।

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राज्यसभा में भी तृणमूल कांग्रेस की स्थिति कमजोर होती दिखाई दे रही है। पार्टी के 12 राज्यसभा सांसदों में से दो सांसदों ने इस्तीफा देकर राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। हाल ही में सुष्मिता देव के इस्तीफे ने पार्टी को बड़ा झटका दिया था, जबकि दूसरे इस्तीफे ने यह संकेत दे दिया है कि असंतोष केवल लोकसभा तक सीमित नहीं है बल्कि संसद के दोनों सदनों में फैल चुका है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह सिलसिला जारी रहा तो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति में TMC की भूमिका भी कमजोर पड़ सकती है।

दूसरी ओर ममता बनर्जी के साथ फिलहाल केवल नौ लोकसभा सांसद मजबूती से खड़े दिखाई दे रहे हैं। इनमें महुआ मोइत्रा, सौगात रॉय, प्रतिमा मंडल, अभिषेक बनर्जी, सुदीप बंदोपाध्याय, प्रसून बनर्जी, सजदा अहमद, कल्याण बनर्जी और कीर्ति आजाद शामिल हैं। यही नेता इस समय पार्टी के राजनीतिक और संगठनात्मक बचाव की कमान संभाले हुए हैं। विशेष रूप से अभिषेक बनर्जी लगातार संगठन को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बागी खेमे की बढ़ती ताकत उनके लिए भी बड़ी चुनौती बन चुकी है।

सबसे ज्यादा चिंता विधानसभा की स्थिति को लेकर है। TMC के 80 विधायकों में से 64 विधायकों के बागी खेमे में होने की चर्चा ने राजनीतिक भूचाल ला दिया है। यदि यह संख्या वास्तविक राजनीतिक कार्रवाई में बदलती है तो पश्चिम बंगाल में सत्ता का पूरा गणित बदल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए यह स्थिति बेहद असाधारण है, जहां सांसदों और विधायकों का इतना बड़ा वर्ग नेतृत्व के खिलाफ खड़ा दिखाई दे।

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राजनीतिक जानकारों के अनुसार यह संकट केवल व्यक्तियों का विद्रोह नहीं बल्कि पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रहे असंतोष, नेतृत्व शैली, टिकट वितरण, सत्ता से बाहर होने के बाद बदलते समीकरणों और भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं का परिणाम भी हो सकता है। यही कारण है कि बंगाल की राजनीति अब केवल ममता बनर्जी बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि TMC के भीतर नेतृत्व और भविष्य को लेकर संघर्ष का नया अध्याय शुरू होता दिखाई दे रहा है।

फिलहाल पूरे देश की नजर कोलकाता पर टिकी हुई है। सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक कुशलता से इस सबसे बड़े संकट को संभाल लेंगी या फिर तृणमूल कांग्रेस उस दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां पार्टी के भीतर का विद्रोह बंगाल की राजनीति का नया इतिहास लिखने वाला है।

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