राष्ट्रीय | असम | ABC NATIONAL NEWS | गुवाहाटी | 3 जुलाई 2026
असम में नागरिकता से जुड़े मामलों पर एक बार फिर महत्वपूर्ण न्यायिक फैसला सामने आया है। गौहाटी हाईकोर्ट ने 38 वर्षीय दिहाड़ी मजदूर अमीनुल हक को भारतीय नागरिक मानने से इनकार करते हुए विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल) के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि अमीनुल हक द्वारा प्रस्तुत किए गए 15 दस्तावेज़ भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय नहीं हैं, क्योंकि उनमें कई महत्वपूर्ण विसंगतियां पाई गईं।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब कुछ दिन पहले ही विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि पासपोर्ट अपने आप में भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। अब हाईकोर्ट के इस फैसले ने नागरिकता संबंधी दस्तावेजों की विश्वसनीयता और कानूनी जांच के महत्व को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
30 जून को न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना और न्यायमूर्ति शमीमा जहां की खंडपीठ ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि अमीनुल हक अपने दावों को विश्वसनीय दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर साबित करने में असफल रहे। अदालत ने माना कि रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजों के बीच कई विरोधाभास और असंगतियां थीं, जिनके कारण नागरिकता का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अमीनुल हक ने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कुल 15 दस्तावेज़ अदालत के सामने पेश किए थे। इनमें 1973 की भूमि खरीद का दस्तावेज़, स्कूल प्रमाणपत्र, 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की प्रति, मतदाता सूची से जुड़े रिकॉर्ड तथा अन्य सरकारी दस्तावेज शामिल थे। उनका दावा था कि ये सभी दस्तावेज़ उनके परिवार की भारत में लंबे समय से मौजूदगी और नागरिकता को प्रमाणित करते हैं।
हालांकि, अदालत ने पाया कि इन दस्तावेजों के बीच नाम, पारिवारिक संबंध, पहचान और अन्य विवरणों में ऐसी विसंगतियां थीं, जिन्हें संतोषजनक ढंग से स्पष्ट नहीं किया जा सका। न्यायालय ने कहा कि केवल बड़ी संख्या में दस्तावेज़ प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका आपस में मेल खाना, उनकी प्रामाणिकता और कानूनी विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
असम में नागरिकता से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं। यदि किसी व्यक्ति को ट्रिब्यूनल विदेशी घोषित करता है, तो उसके पास हाईकोर्ट और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील का अधिकार होता है। इस मामले में भी अमीनुल हक ने ट्रिब्यूनल के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिल सकी।
असम में नागरिकता का मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील रहा है। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल और नागरिकता से जुड़े मामलों पर लगातार कानूनी और राजनीतिक बहस होती रही है। ऐसे मामलों में अदालतें दस्तावेजों की संख्या से अधिक उनकी विश्वसनीयता, निरंतरता और कानूनी प्रमाणिकता को महत्व देती हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनमें नागरिकता का दावा दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि नागरिकता साबित करने के लिए केवल रिकॉर्ड होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि सभी दस्तावेज़ एक-दूसरे से मेल खाते हों और उनमें कोई गंभीर विरोधाभास न हो।
फिलहाल गौहाटी हाईकोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखते हुए अमीनुल हक की याचिका खारिज कर दी है। यदि वह आगे कानूनी लड़ाई जारी रखना चाहते हैं, तो उनके पास सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का विकल्प उपलब्ध है। यह फैसला एक बार फिर बताता है कि नागरिकता से जुड़े मामलों में अदालतें दस्तावेजों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता और कानूनी वैधता को सर्वोच्च प्राथमिकता देती हैं।




