राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 जुलाई 2026
मध्य प्रदेश की एक महिला न्यायाधीश को सोशल मीडिया पर मिल रही धमकियों और अभद्र टिप्पणियों ने देश में न्यायपालिका की सुरक्षा को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब न्यायाधीशों को दबाव, धमकी और हिंसा से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में 2021 से लंबित स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) मामला कई महीनों से आगे नहीं बढ़ पाया है।
मध्य प्रदेश की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान ने 12 जून 2026 को 2022 में ट्रक चालक शेख लाला नज़ीर अहमद की मॉब लिंचिंग के मामले में स्वयंभू गौरक्षकों के एक समूह को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। फैसले के बाद से उन्हें सोशल मीडिया पर लगातार निशाना बनाया जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें अपमानजनक टिप्पणियों, धमकियों और संगठित ऑनलाइन अभियान का सामना करना पड़ रहा है।
इस घटनाक्रम पर सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने भी चिंता जताई है। एसोसिएशन ने कहा कि किसी न्यायाधीश को उसके न्यायिक फैसले के कारण डराने, धमकाने या सार्वजनिक रूप से निशाना बनाना न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा है। संस्था ने न्यायाधीशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया है।
दरअसल, न्यायाधीशों की सुरक्षा का मुद्दा नया नहीं है। जुलाई 2021 में झारखंड के धनबाद के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश उत्तम आनंद की संदिग्ध परिस्थितियों में वाहन की टक्कर से मौत के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए देशभर के न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर सुनवाई शुरू की थी। उस समय आशंका जताई गई थी कि उन्होंने कुछ कुख्यात अपराधियों की जमानत याचिकाएं खारिज की थीं, जिसके बाद उनकी मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने उस समय केंद्र और राज्यों से न्यायाधीशों की सुरक्षा व्यवस्था, अदालत परिसरों की सुरक्षा और न्यायिक अधिकारियों पर बढ़ते दबाव को लेकर व्यापक योजना प्रस्तुत करने को कहा था। लेकिन यह महत्वपूर्ण मामला अब लंबे समय से लंबित पड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस सुओ मोटू मामले की पिछली सुनवाई मार्च 2025 में सूचीबद्ध हुई थी, जिसके बाद इसमें कोई विशेष प्रगति नहीं हुई।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि न्यायाधीश अपने फैसलों के कारण धमकियों, भीड़ के दबाव या सोशल मीडिया अभियानों का सामना करेंगे, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायाधीशों का निष्पक्ष और निर्भीक होकर निर्णय देना कानून के शासन की बुनियादी शर्त है।
हालांकि, किसी भी न्यायिक फैसले से असहमति व्यक्त करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन धमकी, डराने की कोशिश या व्यक्तिगत हमले कानून के दायरे में आते हैं। ऐसे मामलों में सुरक्षा एजेंसियों और संबंधित प्रशासन की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि न्यायिक अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।
तबस्सुम खान से जुड़ा मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या भारत में न्यायाधीशों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत और प्रभावी राष्ट्रीय व्यवस्था की जरूरत है। अब कानूनी समुदाय की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि न्यायाधीशों की सुरक्षा से जुड़े लंबित सुओ मोटू मामले में सुनवाई कब आगे बढ़ती है और न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।



